भाजपा और आरएसएस एक नहीं है: भय्याजी जोशी

-संघ प्रमुख भागवत व संघ के महासचिव भैयाजी जोशी हाल ही में अपने भाषणों से यह तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं कि भाजपा का विरोध हिंदुत्व का विरोध नहीं है।

नई दिल्ली।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कल कहा कि भाजपा की हार को हिंदुत्व की हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके बयान हर मुद्दे की बारीकी से पड़ताल करने वाले राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है तथा वे पूछ रहे हैं कि क्या यह कोई नया रहस्योद्घाटन है या फिर भाजपा के बुरे वक्त में स्वयं को उससे दूर करने के लिए चली गई कोई राजनैतिक चाल मात्र है।

भागवत जो कल यहां लेखकों तथा कॉलम लिखने वाले पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, ने भाजपा के चुनावी राजनीति तथा हिंदुत्व के बीच के अंतर को रेखांकित करने की कोशिश की तथा उन्होंने हिंदुत्व को एक आध्यात्मिक ऊंचाई पर प्रदर्शित करने का प्रयास किया भागवत ने कथित तौर पर कहा कि सरकारें आती-जाती रहती है लेकिन असली ध्यान समाज परिवर्तन पर केंद्रित होना चाहिए।

अगर भागवत की इस टिप्पणी को आर एस एस के महासचिव भैयाजी जोशी के हाली की एक बयान की पृष्ठभूमि से देखा और समझा जाए तो यह टिप्पणी कोई अनौपचारिक टिप्पणी नहीं है।

भैयाजी जोशी ने कहा था कि भाजपा का विरोध करना तथा हिंदुत्व का विरोध एक चीज नहीं है। पणजी में 10 फरवरी को “विश्व गुरु भारत” विषय पर व्याख्यान देते हुए जोशी ने कहा था कि “हमें भाजपा के विरोध को हिंदुओं के विरोध के रूप में नहीं लेना चाहिए। यह (चुनाव) तो एक राजनीतिक लड़ाई है जो चलती रहेगी। इसे हिंदुओं के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें :  8 नक्सली ढ़ेर, 2 जवान शहीद

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की एक पराजय तथा इससे पूर्व महाराष्ट्र, हरियाणा तथा झारखंड राज्य में चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन ने RSS के शीर्ष नेतृत्व को पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है। आर एस एस नेतृत्व में एक खास पैटर्न दिखाई दे रहा है।

भाजपा नेताओं द्वारा अपनाई गई द्वेष एवं नफरत की राजनीति से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की स्वीकृति एवं अनुमोदन प्राप्त है, हिंदुत्व को बदनाम कर रही है, उसे कलंकित कर रही है, ज्ञातव्य है कि आर एस एस 1925 में अपने जन्म से ही हिंदुत्व को आगे बढ़ाने में लगी हुई है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह पराजय तथा और राज्यों में होने वाले चुनाव में भाजपा की संभावित पराजय, अंततः 2024 में मोदी सरकार की विदाई का संकेत देने वाली मानी जा रही है तथा भागवत एवं जोशी के बयानों के पीछे यही कारण खड़ा दिखाई दे रहा है।

उनके बयान, इन हारों को भाजपा के मत्थे मढ़ते हुए अपनी छवि को अक्षुण्य बनाये रखने की खातिर चली गई राजनीतिक चाल का हिस्सा हैं।

संघ के शीर्ष नेताओं के द्वारा वर्तमान रुख अपनाने का यह एक मुख्य कारण है कि r.s.s. व भाजपा को एक सिक्के के दो पहलू के रूप में देखा जा रहा है और यह बात तब से ज्यादा साकार हुई है, जब से मई 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने हैं।

इसके परिणाम स्वरूप सरकार के प्रत्येक खराब निर्णय अथवा हर सरकारी कार्यवाही के बारे में व्यापक रूप से यह धारणा बन गई है कि इसे आर एस एस का आशीर्वाद प्राप्त है और यह बात संघ की सार्वजनिक छवि के लिए अच्छी नहीं है।

यह भी पढ़ें :  सचिन पायलट उतरे मैदान में तो अशोक गहलोत नहीं आ पाए!

इसका मतलब ऐसा नहीं है कि यह महज संयोग हो कि r.s.s. ने इन चुनाव में भाजपा के लिए काम नहीं किया है। भागवत, जोशी व अन्य नेतागण ऐसी औपचारिक एवं अनौपचारिक रूप से ऐसी कोशिश इसलिए करते रहे हैं कि ताकि वैचारिक युद्ध को जीता जा सके ताकि सर्व स्वीकार्य बना रह सके। यह एक प्रकार से छवि को बनाए रखने की जरूरी कवायद है।

जनता में व्यापक भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाली पुरानी तकनीक का उपयोग करते हुए यद्यपि मीडिया से संवाद में r.s.s. नेतागण यह प्रचार करते हुए कहते हैं कि भाजपा एक अलग संगठन है जबकि r.s.s. केवल हिंदुत्व के लिए कार्य करता है। इसका सीधा संबंध सिर्फ आध्यात्मिक समाज से है।

एक मौखिक संदेश संघ के शीर्ष नेताओं से इसकी विस्तृत प्रचारकों की सेना में यह चलता है कि जनता को इस के कार्यकर्ताओं को वार्तालाप के दौरान हिंदुत्व भाजपा के अंतर को समझाएं।