सुप्रीम कोर्ट और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की सोच में भारी अंतर है

नई दिल्ली।

भारतीय सैन्य व्यवस्था में पुरुषों के वर्चस्व पर निर्णायक प्रहार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि थल सेना में शामिल महिला अधिकारी पुलिस अधिकारियों के समान कमांड के पद ले सकती हैं।

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इसके विरुद्ध सरकार के तर्क भेदभाव करने वाले परेशान करने वाले तथा रूढ़िवादी धारणा पर आधारित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी महिलाओं उनकी सेवा वर्षों पर विचार किए जाने बिना ही स्थाई कमीशन उपलब्ध होगा।

3 माह में लागू किए जाने वाले इस निर्णय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है, जिन्होंने 16 फरवरी को अहमदाबाद में कहा था कि शिक्षित और संपन्न परिवारों में तलाक अधिक पाए जाते हैं, क्योंकि शिक्षा और धन की अधिकता अहंकार लाती है।

इसके परिणामस्वरूप परिवार बिखर जाते हैं। जहां एक और सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के लिए अवसर सूचित करता है जो जाहिर है कि प्रगति के सोपान चढ़ने के लिए पर्याप्त शिक्षित हैं। भागवत और संगठन के प्रमुख हैं, जो प्रधानमंत्री सहित भाजपा और उसके नेताओं का मार्गदर्शक है, वह महिलाओं की शिक्षा के विरुद्ध बोलते हैं। यह जगजाहिर है कि संपन्नता प्राप्त करने में शिक्षा का बड़ा योगदान होता है।

गौरतलब है कि वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय से कहा था कि भारतीय थल सेना में कमांडिंग भूमिकाओं के लिए महिलाएं उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि पुरुष सैनिक महिला अधिकारियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

सुनवाई के दौरान केंद्र ने कहा कि पुरुष और महिला अधिकारियों से पदस्थापन की बात करने पर उन्हें समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि शारीरिक मापदंड भिन्न है। महिलाओं पर परिवार की ज्यादा जिम्मेदारियां हैं, इसके अलावा उन्हें युद्धबंदी बनाए जाने का खतरा अधिक है, और युद्ध की स्थिति में महिलाओं का सामना ज्यादा होने पर आपत्तियां हैं।

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केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील बालासुब्रमण्यम तथा वकील नीला गोखले ने कहा कि अधिकारी संरचना तथा उनके मुख्य ग्रामीण पृष्ठभूमि होने के कारण प्रचलित सामाजिक मानदंडों के साथ फौजी अभी महिला अधिकारियों को कमान में स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं।

सीधे तौर पर कहा जाए तो कोई भी महिला मेरिट के आधार पर पुरुषों की तरह कर्नल तथा उससे भी ऊंचे पदों तक पहुंच सकती हैं। कर्नल के पद पर पहुंचे अधिकारी के पास बहुत सारे तथा महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं तथा उसे स्वतंत्र जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं।

कर्नल के अधिकार में एक बटालियन होती है, जिसमें 850 जवान और अधिकारी होते हैं। कोई भी महिला अधिकारी, जिसने अपने पदों का दायित्व निर्वहन सफलतापूर्वक किया हो, तकनीकी रूप से सेना में उच्च पद तक पहुंच सकती है।

हालांकि, इस समय महिलाओं को युद्ध के लिए तत्पर रहने वाले सेनाओं जैसे इन्वेंटरी, आर्टिलरी या आर्म्ड क्रॉप्स में नहीं लिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी महिलाएं, जिन्होंने सेना में शार्ट सर्विस कमीशन में 14 साल से अधिक समय तक सेवाएं दी है, स्थाई कमीशन प्राप्त कर सकती हैं।

अदालत ने कहा कि 14 वर्ष से कम समय तक सेवा देने वाली महिलाओं को स्थाई कमीशन दिए जाने पर विचार करने की केंद्र की नीति में ही मूलभूत दोष है।

सालों तक खुले पक्षपात को रद्द करते हुए कहा कि सेना पुरुष एवं महिलाओं के बीच भेदभाव नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि लिंगभेद पर जोर देने देते रहना उनकी तथा देश की गरिमा के प्रति दृढ़ता है, समय आ गया है जब महिलाएं समान पदों पर कार्यरत पुरुषों से कमतर नहीं हैं।

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सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं की शारीरिक सीमाओं तथा सामाजिक मानदंडों से संबंधित केंद्र की दलीलों को भी अस्वीकार कर दिया जो महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन ने दिए जाने के पक्ष में दी गई थी।

अदालत ने भेदभाव को अशुद्ध कर देने वाला बताया। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड तथा अजय रस्तोगी ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा महिलाओं की शारीरिक संरचना से उनके अधिकारों का कोई संबंध नहीं है, सोच बदलनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने उन महिलाओं के अनुसार देश की गौरवान्वित किया है, का उल्लेख करते हुए कहा महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। केंद्र का कथन लैंगिक भेदभाव तथा रूढ़िवादी धारणा है, महिला सैन्य अधिकारियों ने देश के लिए उपलब्धियां अर्जित किए हैं।

भारतीय सेना भारतीय सेना महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन प्रदान करती है तथा दोनों ने महिलाओं के लिए युद्ध संबंधी भूमिकाएं खुले हैं। वायुसेना तथा नौ सेना महिला अधिकारियों को तथा ग्राउंड देती है। आईएएस के शार्ट सर्विस कमीशन अधिकारी हेलीकॉप्टर, यहां तक कि अब तो लड़ाकू जेट तक उड़ाने देती है।

नौसेना में एसएससी के माध्यम से आई महिला अधिकारी लॉजिस्टिक, लॉ ऑब्जर्वर, एयर ट्रेफिक कंट्रोल, मैरिटाइम टेक्नेशन पायलेट्स तथा नेवल परमानेंट इंस्पेक्टरेट अकेडमी जा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तथा मोहन भागवत का प्रेक्षण उन परस्पर विरोधी ताकतों को रेखांकित करता है, जिनके अंतर्गत भारतीय समाज तथा लोकतंत्र संचालित है। इसमें एक उन्हें आगे बढ़ने से लगा है तो दूसरे ने पीछे धकेलने को तुला हुआ है।

उल्लेखनीय है कि साल 2010 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं को स्थाई कमीशन नहीं दिए जाने के लिए अपील की थी, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया है।

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