ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों के आंदोलन में किसान नहीं, नेता कर रहे हैं नेतागिरी

रामगोपाल जाट। केंद्र सरकार के द्वारा जून के महीने में बनाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के जीटी करनाल रोड, हरियाणा के टिकरी बॉर्डर और राजस्थान में हरियाणा के शाहजहांपुर बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन जारी है। दो जगह पर आंदोलन की हकीकत जानने के लिए नेशनल दुनिया की टीम मौके पर पहुंची।

शाहजहांपुर से सिंधु बॉर्डर

2 जनवरी को करीब 4:30 बजे हमारी टीम शाहजहांपुर बॉर्डर पहुंची, जहां पर किसान संगठनों के कुछ नेता और कार्यकर्ता क्रमिक अनशन पर बैठे हुए थे। उनसे बातचीत की बातचीत के दौरान निकल कर आया कि अधिकांश को यह पता नहीं है तीन कृषि कानूनों से किसानों को वास्तव में नुकसान क्या हो रहा है।

इसके बाद लंगर में खाना खाते वक्त कुछ और लोगों से बात करने की कोशिश हुई। जिनको भी हकीकत में किसान कानूनों के बारे में ना तो सही तरह से जानकारी है और ना ही उनको यह पता नहीं कि इन कृषि कानूनों का किसानों पर क्या विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

शानदार व्यवस्थाएं

किसान आंदोलन के नाम पर चारों तरफ केवल लाल झंडे लगे हुए थे। लंगर में खाना खिलाने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि वह लोग वर्षों से एनएसीआई से जुड़े हुए हैं और किसान पुत्र होने के कारण उनका भी धर्म है कि इन तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे, उन लोगों का कहना है कि जब से शाहजहांपुर बॉर्डर पर किसान ठहरे हुए हैं, तब से वे लोग खाना खिलाने का काम कर रहे हैं।

पूर्व विधायक कर रहे हैं नेतृत्व

रात को करीब 8:00 बजे खाना खाने के बाद पूर्व विधायक और किसान नेता कॉमरेड अमराराम से बातचीत की गई। कामरेड अमराराम का दर्द यह भी है कि किसान आंदोलन की शाजापुर में अगुवाई वह कर रहे हैं, किंतु जब सुबह अखबार पढ़ते हैं तो अखबारों में नाम किसान नेता रामपाल जाट और सांसद हनुमान बेनीवाल का आता है।

मंझे हुए नेताओं के हाथ में तकदीर

अमराराम किसानों की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। हमने जब नेशनल दुनिया के यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो इंटरव्यू किया तो अमराराम का साफ तौर पर कहना है कि इन तीन कृषि कानूनों के माध्यम से केंद्र के नरेंद्र मोदी सरकार किसानों की जमीन हड़प कर पूरी जमीन गौतम अडानी और मुकेश अंबानी को देना चाहती है।

कांग्रेस सरकार का विरोध क्यों नहीं

National dunia के एक सवाल पर अमराराम ने यह भी बताया कि वह राज्य की कांग्रेस सरकार के द्वारा किसानों के बिजली बिलों के ₹10000 की सब्सिडी खत्म करने और स्टेट टोल फिर से शुरू करने के भी खिलाफ हैं, लेकिन पिछले 9 महीने से कोरोना की वैश्विक आपदा के चलते सरकार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाए हैं। उनका यह भी कहना है कि जैसे ही तीन कृषि कानूनों वाला यह मामला खत्म हो जाएगा, उसके बाद प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ भी आंदोलन करेंगे।

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विरोध ही एकमात्र लक्ष्य

पूर्व विधायक अमराराम से बातचीत करने के बाद हमारी टीम ने तंबुओं के बाहर आग के सहारे गर्मी लेते हुए हुक्के का आनंद उठा रहे कुछ युवाओं और किसान दिखने वाले लोगों से बातचीत की। मजेदार बात यह है कि किसान दिखने वाले दो जने शराब के नशे में थे और दोनों का लक्ष्य केवल मोदी सरकार को गरियाना था। उनको किसान कानूनों के बारे में भी पूर्ण जानकारी नहीं थी और उनका दावा है कि तीन कृषि कानून अंबानी और अडानी के द्वारा बनाए गए हैं केंद्र की सरकार ने केवल उन को संसद में पारित करवाया है।

किसान नेताओं ने भी नहीं पढ़े कानून

रात को 10:00 बजे तक हमारी टीम शाहजहांपुर बॉर्डर पर हुक्के का आनंद लेते अनेक लोगों से बातचीत करने के दौरान भी यह नहीं जान पाई की तीन कशी कानूनों से वास्तव में किसानों को नुकसान क्या है और जो लोग आंदोलन में बैठे हुए हैं, उनको इन कानूनों के बारे में पूर्ण जानकारी क्यों नहीं है?

कृषि कानूनों की नकारात्मक जानकारी

हालांकि इस दरमियान कुछ युवा जो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से पास आउट होने के बाद विभिन्न ने किसान संगठनों के अलावा राजनीतिक दलों से भी जुड़े हुए हैं, वे लोग कृषि कानूनों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं किंतु वह लोग भी इन तीन कृषि कानूनों की केवल नकारात्मक जानकारी ही बता पाते हैं। कानूनों के सकारात्मक पक्ष के बारे में या तो वे लोग जानते नहीं हैं या फिर बताना नहीं चाहते हैं।

रात्रि पड़ाव दर्द भरी सुबह

रात को करीब 10:30 बजे हमारी टीम सिंघु बॉर्डर के लिए रवाना हो गई। रात को 1:30 बजे सिंघु बॉर्डर पहुंचने के बाद टीम के सदस्य रात्रि विश्राम लिए रुक गये। सुबह करीब 8:00 बजे उठने के बाद सीधे आंदोलन स्थल पर पहुंचे, जो करीब एक डेढ़ किलोमीटर दूर था।

चाय नाश्ते से दिन की शुरुआत

करीब 2 किलोमीटर क्षेत्र में नेशनल हाईवे पर किसानों के ट्रैक्टर ट्रॉली और तंबू मानव एक अलग ही शहर की भांति नजर आ रहा है। जहां पर सुबह के नाश्ते में चाय, बिस्किट, सैंडविच, पराठे, चावल, दाल समेत तकरीबन नाश्ते की हर चीज उपलब्ध है।

लंगर में सेवादारों का प्यार

नाश्ते के करीब आधे घंटे बाद ही खाने की भी तैयारी हो गई। 2 किलोमीटर के क्षेत्र में खाना खाने के लिए एक दर्जन से ज्यादा जगह पर लंगर लगे हुए हैं। पंजाब से आए सेवादार बड़े ही प्यार से लोगों को लंगर में खाना खिलाते हैं। पीने के लिए मिनरल वाटर की बढ़िया व्यवस्था है। आंदोलन में शामिल और आंदोलन को देखने आने वाले लोगों को बड़े प्यार से और स्वादिष्ट खाना खिलाया जाता है।

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बरसात ने बिगाड़ा जायका

किसानों के आंदोलन स्तर पर ही स्थल पर ही हमारी टीम के सदस्यों ने भी लंगर में सुबह के भोजन का लुफ्त उठाया। साथ ही, क्योंकि सर्दी काफी तेज थी और बरसात की झड़ी लगी हुई थी। ऐसे में वहां पर कीचड़ काफी हो गया था। कड़ाके की ठंड होने के कारण आंदोलन में शामिल लोग आग के सहारे समय काट रहे थे। हमारी टीम के सदस्यों ने भी जगह जगह पर आग जला कर बैठे हुए लोगों से बातचीत की।

नरेंद्र मोदी सरकार कर रही है षड्यंत्र

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ और अंबानी अडानी के खिलाफ यहां के किसानों में बहुत गुस्सा भरा हुआ है। सभी लोग एक स्वर में कहते हैं कि तीनों कृषि कानून अडानी और अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए गए हैं। इनके जरिए केंद्र सरकार किसानों की जमीन हड़पने का षड्यंत्र कर रही है। किसानों को गुलाम बनाने की साजिश चल रही है। देश की मंडी व्यवस्था को खत्म कर किसानों को कारोबारियों का गुलाम बनाना चाहती हैं।

तीनों कानून वापस लेने पर जोर

किसान इस बात से भी अपनी बात को पुख्ता करते हैं कि अगर इन 3 कानूनों में कोई कमी नहीं होती तो नरेंद्र मोदी सरकार उनकी पांच में से 2 मांगों को नहीं मानती और संशोधन के लिए तैयार नहीं होती। इसका सहारा लेते हुए किसान कहते हैं कि केंद्र की सरकार की यह तीनों कानून काले कानून है और तीनों को जब तक सरकार वापस नहीं लेगी, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा चाहे, कितना भी समय क्यों नहीं हो जाए।

पांच सितारा सुविधाएं

लगभग 4 घंटे तक वहां पर स्थिति का जायजा लेने के दौरान यह भी सामने आया कि किसानों के लिए मौके पर तमाम तरह की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद रहने, खाने, पीने और यहां तक कि कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीनें भी लगी हुई हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो सिंघु बॉर्डर पर किसानों को जब तक यह सारी सुविधाएं मिलती रहेगी, तब तक आंदोलन खत्म करने की कोई आवश्यकता है ही नहीं।

आंदोलन की लंबी व तगड़ी तैयारी

इस आंदोलन में मौजूद पंजाब के ट्रैक्टर ट्रॉली ओं में कई ऐसे परिवार भी हैं जो माता पिता भाई बहन समेत सभी घर छोड़कर आए हुए हैं। इन लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि कई परिवार पहले दिन से ही सिंघु बॉर्डर पर ठहरे हुए हैं। ट्रैक्टर और ट्रॉलीयों के ऊपर धूल जम चुकी है। हालांकि, बरसात होने के कारण ट्रैक्टर ट्रॉलीयों की ऊपर से धूल साफ नहीं हो रही है, किंतु देखकर लगता है कि लंबे समय से यह सारे वाहन यहां खड़े हैं।

पंजाब की संपन्नता का भ्रम दूर हुआ

किसान कानूनों की वास्तविक जानकारी और इससे किसानों के ऊपर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव के बारे में तथ्यात्मक जानकारी नाम मात्र के लोगों के पास है जो किसी ने किसी संगठन से जुड़ी हुई हैं और संगठनों में पदाधिकारी हैं। हालांकि एक और चीज यहां पर देखने को मिली कि अब तक जो भ्रम था कि पंजाब के किसान काफी संपन्न होते हैं, वह भ्रम यहां के लोगों को देखकर पुख्ता हो गया है। तकरीबन प्रत्येक किसान नेता के पास आईफोन का मोबाइल हैंडसेट मौजूद है और शरीर पर ब्रांडेड कपड़े हैं। खाने पीने के बारे में हम आपको ऊपर विस्तार से बता चुके हैं।

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रविवार को दोपहर में करीब 2:00 बजे हमारी टीम वापस जयपुर के लिए रवाना होती है। रास्ते में एक बार फिर शाहजहांपुर बॉर्डर पर पहुंचने के दौरान सामने से कुछ ट्रैक्टर ट्रॉली चालक बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं और पुलिस मूकदर्शक बनकर देख रही है।

दो लाख का दावा, 200 भी नहीं

पता चला कि गंगानगर हनुमानगढ़ और पंजाब से आए हुए किसानों के करीब 300 से ज्यादा ट्रैक्टर ट्रॉली रात को शाजापुर बॉर्डर पहुंचे हैं और उनमें से ही कुछ उग्र युवा किसान पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ रहे हैं और दिल्ली कूच कर रहे हैं। मजेदार बात यह है कि कुछ दिनों पहले ही जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल ने दावा किया था कि वह 200000 लोगों के साथ दिल्ली कूच करेंगे। किंतु पहले दिन शनिवार को 4:30 बजे से लेकर रात को 10:00 बजे तक हमने देखा की हनुमान बेनीवाल के कैंप में मुश्किल से 10 मंदिरा लोग मौजूद हैं और दूसरे दिन जब दोपहर बाद हम वापस आए, तब भी वहां पर खुद हनुमान बेनीवाल के मौजूद होने पर भी 50 से ज्यादा लोग नहीं थे।

श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और पंजाब से आए हुए किसानों के ट्रैक्टरों करेला हनुमान बेनीवाल के कैंप और वामपंथी संगठनों के कैंप के बीच में रुक गया। काफी देर तक हमने मौके का एक बार फिर से जायजा लिया और रात को ही आए किसानों से भी बातचीत कर कृषि कानूनों के बारे में जानने की कोशिश की, किंतु यहां पर भी एक बार फिर से निराशा हाथ लगी।

निष्कर्ष यही निकलता है

करीब 610 किलोमीटर की यात्रा के बाद हमारी टीम रविवार को शाम 7:00 बजे बाद जयपुर पहुंच गई। कुल मिलाकर कहा जाए तो शाहजहांपुर में जहां किसान नगण्य संख्या में मौजूद हैं। जबकि, सिंघु बॉर्डर पर पंजाब के 50 से ज्यादा किसान संगठनों के सहारे कुछ किसानों समेत मंडी के आढ़तियों के साथ कुछ संपन्न किसान बैठे हुए हैं, जिनको शायद खेत में काम करने वाले किसानों से अधिक मतलब नहीं है और उनका लक्ष्य केवल तीनों कृषि कानूनों को वापस करा अपने हित साधने पर पूरा ध्यान है।