विश्लेषण: किसानों पर water cannon से बौछार कितनी सही, कितनी खतरनाक?

रामगोपाल जाट

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (pm narendra modi govt) द्वारा दो माह पहले संसद में पारित किए गए तीन कृषि कानून (three Farmer act) के खिलाफ किसानों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। दो दिन पहले पंजाब के किसानों ने रेल की पटरियों को छोड़कर दिल्ली कूच करने की घोषणा की थी।

इसके बाद गुरुवार को किसानों पर दिल्ली कूच करने के दौरान हरियाणा सरकार द्वारा दिल्ली जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग (new Delhi NCR highway) रोक दिया गया, जहां पर किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने पानी की बौछारों (water cannon) का प्रयोग किया।

सैंकड़ों किसान इस आंदोलन में दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, आंदोलन में शामिल किसानों, आढ़तियों और मंडी कारोबारियों का दावा है कि किसान आंदोलन में लाखों लोग दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं।

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उल्लेखनीय है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा 2 महीने पहले तीन कृषि विधायकों को संसद में पारित करवाकर कानून बनाया गया था। इनमें सबसे पहला कानून किसानों के लिए अपना उत्पादन मंडियों में भेजने की अनिवार्यता खत्म की गई है।

सरकार ने नए कानून में प्रावधान किए हैं कि मंडी के कारोबारी अब किसान के घर पर जाकर उसकी मांग व दोनों की बीच बनी सहमति के मूल्य पर फसलों का उत्पादन खरीद सकेंगे।

इस बिल को लेकर किसानों का कहना है कि केंद्र की सरकार कृषि मंडियों को खत्म करने का सिलसिला शुरू कर चुकी है। हालांकि, इसके खिलाफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और भाजपा के दर्जनों नेता बयान देकर साफ कर चुके हैं कि मंडियों को खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं है।

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दूसरे कानून में बताया गया है कि कॉरपोरेट कंपनियां किसानों से सीधा संपर्क करके उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट करें उनके उत्पादन को खरीद सकेंगी। इसके लिए किसानों और कंपनियों के बीच 11 महीने का फसल उत्पादन एग्रीमेंट होगा।

किसान आंदोलन से जुड़े हुए लोगों का कहना है कि केंद्र की सरकार इस बिल के माध्यम से किसानों की जमीन कॉर्पोरेट कंपनियों के हवाले करना चाहती है।

केंद्र सरकार के द्वारा इसको लेकर भी स्पष्ट रूप से कहा जा चुका है कि किसानों और कंपनियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट केवल 11 महीने का होगा और वह भी फसलों के लिए होगा जमीन के लिए नहीं होगा।

तीसरे बिल में कारोबारियों के द्वारा की जाने वाली फसल उत्पादन के स्टॉक की लिमिट को खत्म कर दिया गया है। हालांकि आपातकाल की स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारें फिर से स्टॉक लिमिट लागू कर सकती है।

तीसरे बेल के कारण किसानों के बजाय कारोबारियों में ज्यादा हड़कंप मचा हुआ है। कारोबारियों का मानना है कि इसके चलते फसल खरीद करने वाले आढ़तियों के द्वारा बड़े पैमाने पर स्टॉक किया जाएगा और इससे महंगाई बढ़ेगी।

केंद्र सरकार का कहना है कि कोल्ड स्टोरेज की कमी होने के कारण कोई भी कंपनियां अभी तक इस सेक्टर में कदम नहीं बढ़ा पा रही थी। स्टॉक लिमिट खत्म करने के कारण किसानों की फसलों के उत्पादन के कारोबारियों के द्वारा स्टोरेज की व्यवस्था ज्यादा की जाएगी।

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केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि स्टॉक लिमिट भले ही खत्म कर दी गई हो, लेकिन किसी भी तरह की आपात स्थिति में किसी भी कारोबारी को स्टॉक लिमिट का पालन करना अनिवार्य होगा इसलिए महंगाई को तुरंत काबू पाया जा सकेगा।

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किसानों और केंद्र सरकार के बीच में टकराव का जो सबसे बड़ा कारण है वह मंडियों की अनिवार्यता को लेकर है। हालांकि, माना जा रहा है कि इस कानून की वजह से किसानों को कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन मंडी में बैठकर जो आढ़तिये किसानों की फसलों को औने-पौने दामों पर खरीदते हैं, उनके लिए अब किसान के घर पर जाकर फसल खरीदने की मजबूरी हो जाएगी।

केंद्र सरकार का कहना है कि अगर फसल खरीद से संबंधित कारोबारी किसान के पास घर पर जाकर उत्पादन को खरीदने लगेंगे तो इसके चलते कारोबारियों के बजाय किसान अपनी फसलों का मूल्य तय करने लगेंगे और इससे किसान को निश्चित रूप से फायदा होगा।

इस पूरे मामले में जिस एक प्रावधान को लेकर किसानों में सबसे ज्यादा रोष है वह मंडियों को लेकर ही है। केंद्र सरकार का कहना है कि मंडी खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है, जबकि किसान आंदोलन से जुड़े हुए किसानों और किसानों के नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे मंडी को खत्म कर देगी।