hanuman beniwal narayan beniwal
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जयपुर।
नागौर की खींवसर सीट पर रालोपा और भाजपा के संयुक्त उम्मीदवार नारायण बेनीवाल की बेहद कम अंतर की जीत से एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी खुद को अच्छा प्रदर्शन करते हुये जीत की हकदार बता रही है, वहीं लोकतांत्रिक जीत के बाद नारायण बेनीवाल विधानसभा का टिकट कटवा चुके हैं।

जीत के बाद सांसद हनुमान बेनीवाल ने नारायण बेनीवाल के साथ सोशल मीडिया पर सामने आकर जहां खींवसर की जनता को धन्यवाद दिया, वहीं ट्वीटर और फेसबुक पर पोस्ट लिखने के बाद भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह को पत्र लिखकर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व पूर्व मंत्री यूनुस खान पर दगा देने का आरोप लगाकर सख्त एक्शन की मांग की है।

खींवसर में हनुमान बेनीवाल ने बीते 10 माह के दौरान यह तीसरी जीत दर्ज की है। हालांकि, जीत का अंतराल कम ज्यादा होता रहा है। दिसंबर के चुनाव में जहां खुद हनुमान विधायक के तौर पर 16 हजार से अधिक वोटों से जीते, वहीं मई के लोकसभा चुनाव में उन्होंने सांसद का चुनाव लड़ते हुये खींवसर से 55 हजार की लीड ली।

लेकिन अब, जबकि नारायण बेनीवाल चुनाव मैदान में उतरे तो उनको केवल 4633 वोट से जीत मिली। इन 10 महीनों के दौरान खींवसर की जनता ने बेनीवाल परिवार को तीन तरह से आंकलन कर चुना, शायद यही लोकतंत्र की खासियत है।

जीत के कारणों की बात की जाये तो राज्य सरकार में किसानों का रोष, जवानों का गुस्सा और दो धड़ों में बंटने के कारण लगातार बढ़ती नकारात्मकता ने भी खास नुकसान किया है।

दूसरी ओर हनुमान बेनीवाल का एक्टिव रहना, भाजपा को प्रचार के लिये जुटना और सतीश पूनिया के तौर पर नये अध्यक्ष का होना भी पॉजिटिव माहौल बनाने का काम करने में कामयाब रहा।

सचिन पायलट तो फिर भी खींवसर में चुनाव को लेकर सतर्क रहे, लेकिन अशोक गहलोत का खींवसर के नजदीक भी नहीं जाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि उनको हनुमान बेनीवाल पर दूर से ही नजर रखने का मन बना रखा था।

सतीश पूनिया की भाजपा के कई सदस्य अनमने मन से ही सही, पर हनुमान बेनीवाल के साथ जुटे रहे। गजेंद्र सिंह खींवसर, उनके बेटे, राजेंद्र राठौड़, अरूण चतुर्वेदी समेत कई नेता, जो हनुमान बेनीवाल को पंसद नहीं करते, लेकिन गठबंधन के कारण बेनीवाल का गुणगान करते हुये दिखे।

अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और पूर्व मंत्री यूनुस खान ने खुलकर बेनीवाल का विरोध कर कांग्रेस का सपोर्ट किया? तो वोटों के अंतर को देखते हुये इस बात को सही भी माना जा सकता है, किंतु क्या इन दोनों नेताओं को खींवसर में इतना प्रभाव है कि वोटों को प्रभावित कर सकें?

एक तरह जहां बेनीवाल इस चुनाव को सरकार और गहलोत के खिलाफ अकेले खुद की लड़ाई ​बता रहे थे, वहीं गहलोत का खींवसर नहीं जाना कहीं न कहीं हरेंद्र मिर्धा के लिये लाभकारी ही रहा है।

इन चुनाव के दौरान ही आरसीए कांड़ के चलते अशोक गहलोत की जाट विरोधी छवि में इजाफा हुआ ही, साथ ही यह छवि कहीं न कहीं हरेंद्र मिर्धा की जीत में भी बाधक बनी।

जबकि एक बार भी सीधे तौर पर सचिन पायलट का हनुमान बेनीवाल के खिलाफ नहीं बोलना कांग्रेस में दो फूट होने का स्पष्ट इशारा रहा है। अशोक गहलोत नहीं चाहते थे कि खींवसर में जाकर वह प्रचार करे, जिससे बेनीवाल को ही फायदा मिले, शायद इसलिये उन्होंने चुनाव प्रचार से दूरी बनाये रखी।

चर्चा है कि खींवसर में हरेंद्र मिर्धा और मंड़ावा में रीटा चौधरी ने सीएम अशोक गहलोत को बुलाया ही नहीं, अपितु इन क्षेत्रों में आने के लिये मना भी कर दिया। क्योंकि दोनों ही सीट जाट बहुल्य थी और ऐसे वक्त में गहलोत का प्रचार के ​लिये जाना घातक हो सकता था।

अब बचते हैं हनुमान बेनीवाल और नारायण बेनीवाल? हनुमान बेनीवाल की छवि एक युद्धक लड़ाके की है, जबकि नारायण बेनीवाल की सोम्य छवि के चलते लोग उनसे जुड़े हुये रहते हैं। कहा जाता है कि जब हनुमान बाहर होते हैं तो सभी शादी—ब्याह जैसे कार्यक्रमों में नारायण ही जाते हैं। इसके चलते उनकी हर जगह पकड़ है।

ऐसे में स्पष्ट तौर पर कहना बेहद कठिन है, लेकिन फिर भी इस पूरी कहानी को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि इस जीत का असली हकदार कौन है? यह भी जान सकते हैं कि जो हारे हैं, उनकी हार का जिम्मेदार कौन है?