—चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने 40 दिन पहले दिए आदेश को अधिकारियों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया, अब मंत्री भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

jaipur
राजस्थान सरकार में केवल मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के रूप में दो धुरी ही नहीं है, बल्कि सरकार के मंत्रियों का उनके अधिकारी भी कहना नहीं मान रहे हैं।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट में बंटी सरकार को अफसरों ने रीड़विहीन समझ लिया है, इ​सिलिए मंत्रियों द्वारा तमाम कोशिशें करने के बाद भी दोषी अधि​कारियों पर कार्यवाही नहीं कर पा रहे हैं।

पहला मामला तब का है, जब एसएमएस अस्पताल की लाइफ लाइन में 9 मई को आग लगी। उस आग में अस्पताल के ही दो डॉक्टरों ने 5 करोड़ से अधिक के दवा खरीद के घोटाले को जलाकर राख कर दिया गया।

इस आग के अगले ही दिन चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा ने निर्देश दिए कि अस्पताल के अधीक्षक डॉ. डीएस मीणा को एपीओ कर दिया जाए, और उनकी जगह अगले आदेश तक डॉ. एसएम शर्मा को अधीक्षक लगाया जाए।

किंतु सरकार में बैठे अधिकारियों ने मंत्री की एक नही सुनी। आचार संहिता का बहाना बनाकर आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। मजेदार बात यह है कि अब आचार संहिता नहीं है, फिर भी दोषियों पर कार्यवाही नहीं हो रही है।

इसके बाद इसी आग की जांच करवाई गई। अधीक्षक ने अपने स्तर पर जांच करवाई और मंत्री अपने अपने लेवल पर। दोनों जांच में उपाधीक्षक डॉ. एसएस राणावत और डॉ. प्रभात सराफ को दोषी पाया गया, किंतु उनका बाल भी बांका नहीं हुआ।

दोनों डॉक्टर आज भी मजे से नौकरी कर रहे हैं और मंत्री की सभी कोशिशों के बाद भी करोड़ों डकारने वाले दोषियों पर एफआईआर दर्ज नहीं हो पाई है।

दूसरा मामला है खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग का। जहां पर विभाग के मंत्री रमेश मीणा ने खुले मंच से स्वीकार किया है कि अधिकारी सरकार के मंत्रियों का कहना नहीं मान रहे हैं।

अब सरकार के मंत्रियों की इससे ज्यादा फजीहत क्या होगी, जिसमें उनके अंतर्गत काम करने वाले सरकारी अधिकारी ही उनका कहना नहीं मानते हों।

तीसरा मामला शुक्रवार को खुला है। यह प्रकरण भी चिकित्सा विभाग का ही है। सबसे ईमानदारी माने जाने वाले अधिकारी डॉ. समित शर्मा ने अपने स्तर पर ही 2500 पदों पर हैल्थ अफसरों की भर्ती निकाल दी और मंत्री—एसीएस को पता भी नहीं।

मामला तब खुला जब शुक्रवार को इसकी जानकारी कई विधायकों के माध्यम से चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा तक पहुंची। मंत्री शर्मा ने विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव रोहित सिंह से पूछा तो उनको भी पता नहीं था।

बाद में उन्होंने नेशनल हैल्थ मिशन के निदेशक डॉ. समित शर्मा से इसकी जानकारी ली गई, जिन्होंने भर्ती निकाली थी, उन्होंने इस बात को स्वीकार किया और सफाई के तौर पर माफी भी मांग ली।

मामले में वरिष्ठ सहायक अशोक भंड़ारी और एचआर की टीम को निलंबित किया गया है, किंतु असली गुनहगार बने डॉ. समित शर्मा पर अभी तक कोई एक्शन नहीं लिया गया है।

इस भर्ती में 30 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं और आज ही इसकी परीक्षा होनी थी, किंतु मामला खुलने के बाद इसको यकायक शुक्रवार देर शाम रद्द कर दिया गया।

इस योजना में केंद्र सरकार 60 फीसदी पैसा देती है, जबकि 40 प्रतिशत पैसा राज्य सरकार देती है। जिसकी अनुमति केंद्र—राज्य सरकार से ली ही नहीं गई।

इन सभी मामलों के सामने आने से साफ हो गया है कि प्रदेश में केवल 6 माह पहले गठित हुई राज्य की सरकार पूरी तरह से विफल हो गई है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी कुर्सी बचाने के लिए जहां बार बार दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं, वहीं उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं, तो सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार की मलाई चाट रहे हैं।