crude oil narendra modi
crude oil narendra modi

—नरेन्द्र मोदी सरकार जब केंद्र की सत्ता में आई थी, तब कच्चा तेल 100 डालर प्रति बैरल पर था। अब ब्रेंट क्रूड 60 डालर के स्तर पर है। इससे सत्ता पक्ष को भारी राहत मिली है। मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में देखें तो आम चुनाव के दौरान किस्मत एक बार फिर मोदी के पक्ष में दिखाई पड़ रही।

राजीव सिंह

आम चुनाव के दौरान कई बार छोटे से छोटे मुद्दे हवा का रुख बदल देते हैं। वर्ष 2014 के आम चुनाव में महंगाई मुख्य चुनावी मुद्दा थी।

सत्तारूढ़ यूपीए की हार में ईधन की ऊंची कीमतों की निर्णायक भूमिका रही थी। वर्ष 2011 से 2014 के बीच कच्चे तेल का औसत भाव 108 डालर प्रति बैरल रहा था जिससे रोजमर्रा की वस्तुएं काफी महंगी हो गई।

सत्ता विरोधी लहर के कारण आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को प्रचंड बहुत मिला। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की यह खुशकिस्मती रही कि कच्चे तेल के दाम लगातार गिरते गए।

इससे एनडीए सरकार को राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने में भारी मदद मिली। यदि पिछले साल की तेजी को छोड़ दें तो कच्चे तेल के दाम मोदी सरकार के लिए वरदान साबित हुए।

भारतीय बास्केट में इसके भाव मई 2014 में 113 डालर प्रति बैरल से लुढ़क कर जनवरी 2015 में 50 डालर के स्तर पर आ गए।

इसके बाद लंबे समय तक इसी दायरे में बने रहे। कुछ भूराजनितक कारणों से नवम्बर 2018 में तेल के दाम अप्रत्याशित उछाल के साथ 80 डालर प्रति बैरल के पार पहुंच गए।

दरअसल, किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास में कच्चे तेल के दाम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के आर्थिक विकास की कहानी इसके आयात के इर्दगिर्द ही घूमती है।

कुल घरेलू आयात बिल में इसका करीब 30 फीसद हिस्सा है। भारत के वृहद आर्थिक कारकों जैसे मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा और चालू खाते के घाटे में पिछले कुछ वर्षो में काफी सुधार आया है।

इसकी प्रमुख वजह कच्चे तेल की कीमत में गिरावट ही रही है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है।

पिछले कुछ समय से यह काफी अस्थिर है। वर्ष 2014 के मध्य में कच्चे तेल की कीमत 115 डालर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंची थीं।

जनवरी 2016 में यह 28 बैरल पर लुढ़क गया। अब यह 69 डालर प्रति बैरल के स्तर पर है। हालिंक पिछले तीन वर्षो में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का भारतीय उपभोक्ताओं को इसका पूरा लाभ नहीं मिला है।

हालांकि इस दौरान इसकी कीमतों में 50 फीसद तक की गिरावट आई लेकिन पेट्रोल व डीजल की कीमतों में बड़ी कटौती देखने को नहीं मिली।

जून 2014 के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का रुख हुआ तो सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाना शुरू कर दिया। इसके विपरीत अधिकांश विकसित देशों की सरकारों ने इस गिरावट का फायदा उपभोक्ताओं को पहुंचाया।

फिलहाल सत्ता की दूसरी पारी की कवायद में जुटे नरेन्द्र मोदी की किस्मत एक बार फिर उनके साथ खड़ी दिख रही है।

करीब चार माह पहले अप्रैल में संभावित आम चुनावों के समय कच्चे तेल के भाव का अनुमान 100 डालर प्रति बैरल रहने का अनुमान था।

हालांकि बाजार के विशेषज्ञों ने इससे भयभीत नहीं होने की सलाह दी थी, लेकिन सरकार ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में कटौती करके आम जनता को कुछ राहत देने की कोशिश की।

अब ब्रेंट क्रूड 68 डालर प्रति बैरल से नीचे फिसल गया है जो इस साल के उच्चतम स्तर से भारी गिरावट को दर्शाता है।

भारत दुनिया का बड़ा आयातक देश है, ऐसे में ओपेक के लिए मोदी की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। उत्पादन घटाने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ेगा।

चुनाव के दौरान यह ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण एनडीए के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधारों से व्यापार और शहरी वर्ग के लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

सही मायने में देखा जाए तो यही भाजपा के वोट बैंक भी हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रीय दल गठबंधन करके मोदी को घेरने की कोशिश में हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी के भाग्य का पहिया उनकी ओर मुड़ने का पुराना इतिहास रहा है।

बहरहाल, आम चुनाव के बाद किसकी सरकार बनेगी, इस बारे में अभी फैसला करना जल्दबाजी होगा लेकिन इतना तय है कि ईधन की कीमतों में गिरावट का मोदी सरकार को फायदा जरूर मिलेगा।

(लेखक कार्वी स्टाक ब्रोकिंग के सीईओ हैं)

अधिक खबरों के लिए हमारी वेबसाइट www.nationaldunia.com पर विजिट करें। Facebook,Twitter पे फॉलो करें।