ashok gehlot congress
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जयपुर।
लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में लगातार दो बार बुरी तरह से हारने के बाद अब कांग्रेस में अंतर्कलह खुलकर सतह पर आ गई है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा अशोक गहलोत, कमलनाथ और पी चितंबरम पर की गई टिप्पणी ने तीनों नेताओं कीश् सियासी हवा निकाल दी है।

बताया जा रहा है कि राहुल गांधी ने सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में नाम लेकर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ और पूर्व मंत्री पी चितंबरम पर अपने—अपने बेटों को जिताने के लिए पार्टी को दरकिनार करने की बात कही है।

खुद इस्तीफा देने की पेशकश करने वाले राहुल गांधी द्वारा तीनों नेताओं पर हमला करना पार्टी की अंदरुनी हालात को बयां कर रहा है। उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राज बब्बर, महाराष्ट्र के कांग्रेस अध्यक्ष अशोक च्वाहण समेत कई नेताओं ने अपना इस्तीफा दे दिया है।

इस बीच अब राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्य​मंत्रियों पर राहुल गांधी द्वारा निशाना साधने और उनके बेटों को जिताने के लिए पार्टी को तिलांजली देने की बात कहने से साफ हो गया है कि इन राज्यों में मुखिया को बदला जा सकता है।

मतगणना से पहले एक अखबार द्वारा लिए गए इंटरव्यू में बात करते हुए सचिन पायलट ने कहा था कि जोधपुर की 8 में से 6 सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं, इसलिए यह सीट तो जीतेंगे ही दूसरी भी जीतेंगे, किंतु हुआ उलट।

हालांकि, सचिन पायलट के उस बयान को लोगों ने सीधा समझा, लेकिन जो राजनीतिक लोगों के बयानों को अच्छे से समझते हैं, उनका मानना था कि यह सीधे तौर पर अशोक गहलोत पर हमला था।

अब जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार हार चुके हैं, तो पीसीसी चीफ के बजाए प्रदेश की बागड़ोर संभालने वाले के नाते अशोक गहलोत पर ज्यादा जिम्मेदारी है कि वह कांग्रेस प्रत्याशियों की हार का जिम्मा खुद पर लें और नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा दें।

किंतु अभी तक इसकी संभावना नजर नहीं आ रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट खुद आलाकमान के इशारे का इंतजार कर रहे हैं और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी सीट बचाने में पुरजोर तरीके से लगे हुए हैं।

दोनों नेताओं के बीच बीते तीन साल से जारी रस्साकशी का खेल फिर से सामने आ सकता है। कमलनाथ को लेकर कहा जा रहा है कि वहां पर कांग्रेस के पास विकल्प नहीं होने के कारण पार्टी कोई बदलाव नहीं करेगी, बल्कि वहां पर कांग्रेस भाजपा के पासे में उलझ सकती है।

पी चितंबरम पर कार्यवाही करने की जरुरत है ही नहीं। ऐसे में उनके साथ पार्टी का रिश्ता तो बना रहेगा, लेकिन मोदी सरकार—2 अब कीर्ति चितंबरम को लेकर कुछ कठोर कदम उठा सकती है।