Ram Kishan Gurjar@Jaipur.

विधानसभा चुनाव के चलते सूबे का सियासी पारा उफान पर है। टिकट पाने से लेकर मुख्यमंत्री बनने की चाह तक तकरार है।

ऐसे में रोज बनते बिगडते समीकरणों में हर कोई अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहता है। लिहाजा हर नेता अपनी जैसे-तैसे तिकड़म बिठाने की जुगत में है।

इसी राजनैतिक जुगाड़ और जुगलबंदी के चक्कर में कभी संगठन के सितारे रहे अच्छे भले नेताजी सत्ता के ध्रुव तारे से ना जाने कब उल्कापिंड बनकर हाशिये पर चले जाते हैं। ऐसे ही कांग्रेस और भाजपा में हैं, जो सत्ता को हिलाने और अपनी पार्टी को अंदर तक चेतना पैदा करने का काम ये दोनों करते रहते हैं।

बेशक दोनों नेताओं की राजनैतिक पार्टियां अलग हो, पर सियासी सफर कमोबेश एक सा ही है। दोनों ही दिग्गज प्रदेश में स्वर्ण वोट बैंक पर खासी पकड़ रखते है।

यह सर्वविदित है कि राजस्थान में सरकार बनाने में स्वर्ण वोट का अपना विशेष महत्व है। ऐसे में ब्राह्मण समाज के दो सीनियर नेताओं को किनारे करना दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को मंहगा पड सकता है।

बहरहाल, छात्र राजनीति से करियर की शुरुआत करके संगठन में कई अहम पदों पर रहे कांग्रेस के सीपी जोशी हाशिये पर चले गए हैं। पहले विधायक बनें, फिर मंत्री रहे और कभी नंबर एक व नंबर दो की पोजिशन पर रहे जोशी अभी कांग्रेस के नैफ़्तय में चल रहे हैं। कई बार नंबर एक बनने की जद्दोजहद की, लेकिन इसी चक्कर में अपने दल से बगावत भी कर ली।

इधर, बीजेपी के घनश्याम अब भाजपा को तिलांजलि देकर भारत वाहिनी पार्टी के पालनहार बन चुके हैं। तिवाडी की एक जमाने में बीजेपी में भैरोसिंह शेखावत के बाद नम्बर 2 पर तूती बोलती थी।

लेकिन एक जमाना अब है, जिसमें तकरीबन पांच साल रुष्ठ रहने के बाद भी तिवाड़ी को बीजेपी से कोई मनाने नहीं आया। बीते आधे दशक से पार्टी की लगातार खिलाफत के कारण तिवाड़ी भी हाशिये पर चले गए। अततः उन्होंने बगावत कर भारत वाहिनी पार्टी के रुप में नई सियासी पारी का ऐलान कर दिया है।

ठीक इसी नक्शे-कदम पर कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी बताए जा रहे हैं। जोशी ने छात्र राजनीति से शुरूआत की, फिर अध्यापन का कार्य किया और विधायकी के साथ पार्टी संगठन में कई अहम पदों पर रहे।

एक समय ऐसा आया जब जोशी नम्बर एक कि पोजिशन पर पहुंच गए और प्रदेशाध्यक्ष पद पर भी रहे। उसी समय, जब सीएम की रेस में सबसे आगे थे, तभी 2008 में जोशी महज एक वोट से विधानसभा चुनाव हार गए।

उन दिनों सियासी हलकों में खूब जबरदस्त चर्चा थी, कि अगर जोशी जीतते तो कांग्रेस में नंबर एक, यानी सीएम बनते, लेकिन फिर भीलवाडा से लोकसभा का चुनाव लडा और मनमोहन सरकार में मंत्री बने।

जोशी अगला लोकसभा चुनाव हारे, लेकिन फिर आरसीए का चुनाव जीत गए। कानूनी दांव-पेच में फंसकर जोशी को यहां भी अपनी कुर्सी गंवानी पडी। अब उनको पिछले दिनों कांग्रेस वर्किंग कमेटी से बाहर कर दिया गया।

जोशी के पास उस कारण इन दिनों कोई बडी जिम्मेदारी नहीं है, जबकि प्रदेश में चुनाव है। जोशी किसी जमाने में राजस्थान कांग्रेस के पोस्टर आईकन होते थे।

राजनैतिक जानकारों की मानें तो सीपी जोशी का लगातार हाशिये पर जाना राजनैतिक मंहत्वकाक्षा की चाह में किसी प्रतिद्वंद्वी का षड्यंत्र है।

अब सीपी जोशी के हालात भी कमोबेश घनश्याम तिवाडी के जैसे ही नजर आ रहे है। सुनने में आया है कि सीपी जोशी भी बगावत का झण्डा बुंलद कर सकते हैं। जोशी उचित मौके की तलाश में हैं।

कांग्रेस आलाकमान को वक्त रहते इनके कद का सम्मान और ब्राह्मण समाज के चेहरे का फायदा उठाना चाहिए, वरना जोशी के सब्र का बांध टूट जाए। ऐसा न हो उनका मौन सियासी मौका बन जाए।

(नोट-यह लेखक के निजी विचार हैं)