-जेएनवीयू की पीएचडी डिग्रियां अवैध और फर्जी!

जोधपुर/जयपुर।

करीब 150 लोगों पर भर्ती घोटाले का दंश झेल रहा जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय अब एक और घोटाले को अंजाम देने के प्रयास में है।

बताया जा रहा है कि विवि फ़र्ज़ी पीएचडी डिग्री बांटने का काम कर रहा है, जो न तो यूजीसी के नियमानुसार है, बल्कि सीधे तौर पर राजभवन के आदेशों की भी धज्जियां उड़ा रहा है।

बता दें कि भारत के गज़ट में 5 जुलाई 2016 को प्रकाशित यूजीसी रेगुलेशन-2016 तथा राज्य सरकार व कुलपति समन्वय समिति की सलाह से राजभवन द्वारा जारी आदेश (पीएचडी गाइडलाइन), 21 अप्रैल 2017 के बाद, इनके प्रावधानों का उल्लंघन करके यदि किसी विश्वविद्यालय द्वारा किसी भी शोधार्थी को पीएचडी की डिग्री प्रदान की गई हैं, तो ऐसी पीएचडी डिग्री अवैधानिक तथा फर्जी साबित होगी। ऐसे शोधार्थियों को भविष्य में नौकरी भी नहीं मिलेगी।

जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर (JNVU) इन नियमों को नहीं मानता है और मनमर्जी के नियमों से पीएचडी (PhD) की डिग्रियों की बन्दरबांट कर रहा है।

ज्ञातव्य हैं कि इसी विवि ने यूजीसी नियमों को नहीं मानकर वर्ष 2012-13 में, उच्च शिक्षा में देश का सबसे बड़ा ’शिक्षक भर्ती महाघोटाला’ किया था। जिसमें कई लोगों को जेल भेजा गया था। कई शिक्षक बर्खास्त हुए थे। कई एफआईआर दर्ज हुई।

एसीबी ने तकरीबन 150 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया है। इसमें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की जांच अभी तक जारी है। सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में भी कई मुकदमें वर्तमान में विचाराधीन हैं।

इसी महाघोटाले की तर्ज पर जेएनवीयू एक बार फिर से अवैध तथा फर्जी पीएचडी डिग्रियां बाँटकर ’पीएचडी डिग्री घोटाला’ करने पर आमादा हैं।

विवि ऐसी फर्जी डिग्रियां बाँटकर शोधकर्ताओं को मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित करते हुए, उनके भविष्य से भी खिलवाड़ तथा धोखाधड़ी कर रहा है।

’क्या है मामला’
जानकारी के अनुसार यूजीसी रेगुलेशन-2016 के बिंदु संख्या 4.2, 4.3 व 4.4 तथा राजभवन के पत्र दिनाँक 21 अप्रैल 2017 के बिन्दु 3 (i) (ii) व (iii) की पालना नहीं करके जेएनवीयू द्वारा अवैध व फर्जी पीएचडी डिग्रियां बांटी जा रही है।

‘क्या कहते हैं यूजीसी रेगुलेशन-2016 के नियम’
भारत के राजपत्र में प्रकाशित (5 जुलाई 2016), यूजीसी की अधिसूचना (पीएचडी संबंधित), 5 मई 2016 के अनुसार (क) बिन्दु संख्या 4.2 के अनुसार पीएचडी पाठ्यक्रम की अवधि कम से कम 3 वर्ष तथा अधिकतम 6 वर्ष (Without Extension) होगी।

(ख) बिन्दु संख्या 4.3 के अनुसार उपर्युक्त सीमा (6 वर्ष) के अतिरिक्त, समय विस्तारण (Extension) को उन सापेक्ष धाराओं द्वारा अभिशांसित किया जायेगा, जो कि संबंधित संस्थान की सांविधि/अध्यादेश में विनिर्धारित हैं।

(ग) बिन्दु संख्या 4.4 के अनुसार महिला अभ्यर्थी तथा निःशक्त व्यक्ति को पीएचडी के लिये अधिकतम दो वर्ष की छूट दी जायेगी। (अर्थात् इनको पीएचडी हेतु अधिकतम 8 वर्ष का समय, Without Extension मिलेगा)

’क्या कहते हैं राजभवन के आदेश’

राज्य सरकार तथा कुलपति समन्वय समिति की सलाह से जारी राजभवन का आदेश (डीओ) क्रमांक – एफ. 1(46) (सी) आरबी/2015/3281, दिनांक 21 अप्रैल 2017 के मुताबिक –

(अ) बिन्दु संख्या 3 (i) के अनुसार पीएचडी पाठ्यक्रम की अवधि कम से कम 3 वर्ष तथा अधिकतम 6 वर्ष (Without Extension) होगी।

(ब) बिन्दु संख्या 3 (ii) के अनुसार उपर्युक्त सीमा (6 वर्ष, महिला व निःशक्त व्यक्ति के मामले में 8 वर्ष) के अतिरिक्त, समय विस्तारण (Extension) एक वर्ष का होगा।

इस अवधि के बाद कोई समय विस्तारण (Extension) नहीं दिया जायेगा तथा इस अवधि के बाद अभ्यर्थी को नए सिरे से पुनः पंजीकरण (Re-Register afresh) करवाने की आवश्यकता होगी।

(स) बिन्दु संख्या 3 (iii) के अनुसार महिला अभ्यर्थी तथा निःशक्त व्यक्ति को पीएचडी के लिये अधिकतम दो वर्ष की छूट दी जायेगी। (अर्थात् इनको पीएचडी हेतु अधिकतम 8 वर्ष का समय, Without Extension मिलेगा)

’क्या अवैधानिक कर रहा हैं जेएनवीयू’
UGC रेगुलेशन-2016 लागू होने के 3 साल बाद तथा राजभवन के आदेश जारी होने के ढ़ाई साल बाद भी जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा पीएचडी हेतु अपनायी जाने वाली पुरानी अवैधानिक प्रक्रिया इस प्रकार हैं –

  1. जेएनवीयू में पीएचडी पाठ्यक्रम की अवधि अधिकतम 4 वर्ष (Without Extension) हैं। जबकि नियमानुसार 6 वर्ष (Without Extension) होनी चाहिये।

  2. जेएनवीयू उपर्युक्त समयावधि (4 वर्ष) के बाद, समय विस्तारण (Extension) दो बार, एक-एक वर्ष के लिये बढ़ाता हैं। (इस प्रकार दो Extension सहित 4+1+1= कुल 6 वर्ष)।

जबकि नियमानुसार 6 वर्ष से पहले कोई समय विस्तारण (Extension) नहीं होता हैं। तथा 6 वर्ष के बाद केवल 1 वर्ष का समय विस्तारण (Extension) बढ़ाया जाता हैं।

  1. जेएनवीयू इस अवधि (6 वर्ष) के बाद अभ्यर्थी का पुनः पंजीकरण (Re-Registeration) 02 वर्ष के लिये करता हैं।

जबकि नियमानुसार 6 वर्ष के बाद पुनः पंजीकरण (Re-Registeration) नहीं होता हैं, बल्कि केवल 1 वर्ष का समय विस्तारण (Extension) बढ़ाया जाता हैं।

नियमानुसार 7 वर्ष बाद ही नये सिरे से पुनः पंजीकरण (Re-Registeration) किया जा सकता हैं। जिसमें नयी तिथि से पंजीकरण मान्य होगा, ना कि पुरानी तिथि से।

  1. जेएनवीयू पीएचडी में पुनः पंजीकरण (Re-Registeration) के लिये 6 वर्ष बाद सभी शोधार्थियों से राशि 5000+200=5200 (पांच हजार दौ सौ रूपये) अवैध रूप से लेता हैं। जबकि नियमानुसार पुनः पंजीकरण (Re-Registeration) 7 वर्ष बाद नये सिरे से करना चाहिये।

  2. इस प्रकार शोधार्थियों से समय पूर्व पुनः पंजीकरण के रूप में अवैध रूप से राशि लेकर जानबूझकर उनको आर्थिक हानि पहुँचायी जा रही हैं।

  3. जेएनवीयू के ये अवैधानिक पीएचडी नियम सामान्य, महिला व निःशक्त अभ्यर्थी सभी वर्गों के लिए एक समान रूप से लागू हैं। जबकि नियमानुसार सामान्य तथा महिला व निःशक्त अभ्यर्थी के लिये ये नियम अलग-अलग लागू होते हैं।

क्या हैं समस्या’
1. महिला व निःशक्त अभ्यर्थियों के साथ अवैधानिक पीएचडी नियमों के द्वारा जेएनवीयू जानबूझकर भेदभाव करते हुए उनको मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रहा हैं।

क्योंकि नियमानुसार इनका पुनः पंजीकरण 8 वर्ष के बाद ही हो सकता हैं। इसके अलावा सामान्य शोधार्थियों का पुनः पंजीकरण 7 वर्ष बाद ही हो सकता हैं।

जबकि इन सभी को विवि 6 वर्ष बाद ही पुनः पंजीकरण करवाने को बाध्य कर रहा हैं और वो भी पुरानी तिथि से।

  1. जबकि नियमानुसार पुनः पंजीकरण नई तिथि से नये सिरे से ही होना चाहिए।

  2. इसी प्रकार जेएनवीयू द्वारा यूजीसी के नियमों तथा राजभवन के आदेशों का उल्लंघन करके अवैधानिक पीएचडी की डिग्रियां प्रदान की जा रही हैं।

इस अवैधानिक व फर्जी पीएचडी डिग्री से शोधार्थी को भविष्य में नौकरी नहीं मिलने वाली हैं। यह शोधार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ तथा धोखाधड़ी हैं।

अनहोनी की आशंका से भी इन्कार नहीं’
कई सालों तक मेहनत करने के बाद जेएनवीयू इस प्रकार की अवैध व फर्जी डिग्री देता हैं, कि उससे शोधार्थी को नौकरी भी नहीं मिल सकती हैं।

शोधार्थियों के मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित होने एवं उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ तथा धोखाधड़ी होने के कारण, यदि कोई निराश शोधार्थी हताशा में ‘‘अनहोनी’’ जैसा घृणित कदम उठा लेता हैं, तो उसके लिये कौन जिम्मेदार होगा? क्या जेएनवीयू प्रशासन जिम्मेदारी लेगा?

संघर्ष समिति ने भेजा पत्र’
इस संबंध में जेएनवीयू शिक्षक भर्ती संघर्ष समिति के अध्यक्ष ओमप्रकाश भाटी ने राजभवन, मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा विभाग, विवि के कार्यवाहक कुलपति डाॅ. विष्णु शर्मा, कुलसचिव अयूब खान को पत्र भेजकर शोधार्थियों के भविष्य के साथ किये जा रहे खिलवाड़, धोखाधड़ी को रोकने, जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त कर आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाकर उचित कार्यवाही की मांग की हैं।

‘क्या कहता है विश्वविद्यालय प्रशासन
जेएनवीयू प्रशासन का कहना है कि हमने पीएचडी अध्यादेश की अनुमति के लिए राजभवन को लिखा है, परन्तु अभी तक राजभवन से स्वीकृति नहीं आई हैं।

जेएनवीयू पर प्रश्नचिन्ह’
यूजीसी के नियम देश के सभी विश्वविद्यालयों को मानना अनिवार्य (Mandatory) हैं।

राज्य सरकार व कुलपति समन्वय समिति की सलाह से राजभवन ने आदेश जारी करके सभी विश्वविद्यालयों को नये पीएचडी नियम लागू करने के लिए कहा है।

तो फिर जेएनवीयू ढाई-तीन साल से अनुमति के फेर में शोधकर्ताओं के भविष्य से क्यों खिलवाड़ कर रहा है।

जब राजभवन ने नियमों को लागू करने के लिए आदेश जारी कर दिया है, तो फिर एक बार फिर से राजभवन के आदेशों पर राजभवन से ही अनुमति माँगने का क्या औचित्य हैं?

जेएनवीयू रिसर्च बोर्ड ने भी कई बार सीमा से बाहर जाकर पीएचडी के नियम बना लिए, परन्तु उनकी आज तक राजभवन से कोई अनुमति नहीं मांगी गई। जेएनवीयू यह दोहरा रवैया क्यों अपना रहा है?