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प्राचीन और कलात्मक यादगार को गुलाबी पुतवाया, जयपुर के गुलाबी रंग से नहीं खा रहा नया रंग मेल
‘धरम सैनी’

सरकार एक तरफ तो शहर की जनता को वर्ल्ड हैरिटेज सिटी के सपने दिखा रही है, वहीं खुद ही शहर के विरासत के साथ छेड़छाड़ करने से बाज नहीं आ रही है।

विरासत से छेड़छाड़ का ताजा मामला शहर की प्राचीन और कलात्मक इमारत ‘किंग एडवर्ड मेमोरियल’ यादगार में सामने आया है। हाल ही में इस इमारत का रंग मनमानी से बदल दिया गया है।

निर्माण से लेकर आज तक इस इमारत की ऊपरी मंजिल रामरज रंग की थी, लेकिन अब इसे गुलाबी कर दिया गया है। इमारत पर गुलाबी रंग भी ऐसा किया गया है, जो शहर के गुलाबी रंग से बिलकुल मेल नहीं खाता है।

पुलिस विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बिरला हॉस्पिटल की ओर से सीएसआर एक्टिविटि के तहत यादगार में रंग-रोगन और मरम्मत का कार्य कराया जा रहा है।

अस्पताल की ओर से ही इस प्राचीन इमारत पर गुलाबी रंग पोत कर इसके मूल स्वरूप के साथ खिलवाड़ किया गया है।

अस्पताल को इस प्राचीन और कलात्मक इमारत में काम कराने से पूर्व किसी इतिहासकार या फिर पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों से राय मशविरा करना चाहिए था, लेकिन लगता है कि उन्होंने किसी से राय लिए बिना मनमानी से इमारत का मूल स्वरूप बिगाड़ डाला।

यह होगा असर
सरकार की ओर से पूरे परकोटा शहर को वर्ल्ड हैरिटेज सिटी घोषित कराने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं।

किंग एडवर्ड मेमोरियल भी शहर की प्राचीन इमारत है और खास बात यह है कि यह इमारत हैरिटेज सिटी के बफर जोन में आती है।

यूनेस्को की गाइडलाइन के अनुसार बफर जोन में भी प्राचीन इमारतों के मूल स्वरूप में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

अभी जयपुर को वर्ल्ड हैरिटेज सिटी का दर्जा मिला भी नहीं है, उससे पहले यह बदलाव शहर को नया दर्जा दिलाने में बाधक साबित हो सकता है, क्योंकि यूनेस्को को सौंपे गए डोजियरों में शहर की प्राचीन इमारतों की तस्वीरें शामिल है।

बफर जोन में होने, प्राचीन और कलात्मक इमारत होने के कारण यादगार का फोटो भी यूनेस्को के डोजियर में है। ऐसे में इस इमारत के मूल स्वरूप में बदलाव का नतीज गलत हो सकता है।

क्या है इतिहास
इतिहासकारों का कहना है कि 1876 से 78 के बीच जयपुर शहर के रंग को बदला गया। इसके पीछे कहानी यह है कि इस काल में जयपुर के महाराजा राम सिंह लखनऊ गए थे।

वहां उन्होंने पीले और गुलाबी रंग की इमारतें देखी तो उन्हें यह रंग पसंद आया। उस समय पूरे जयपुर शहर की इमारतें सफेद रंग की हुआ करती थी।

लखनऊ से लौटने के बाद रामसिंह ने जयपुर में रह रहे अंग्रेस हैल्थ अधिकारी टी.एच. हैंडले से इस संबंध में चर्चा की और कहा कि वह शहर का रंग बदलना चाहते हैं।

रंग ऐसा हो जो कि आंखों को नहीं चुभे। इस पर सबसे पहले चांदपोल बाजार की कुछ इमारतों पर हरा रंग कराकर देखा गया, लेकिन यह रंग रामसिंह को पसंद नहीं आया।

इसके बाद कुछ इमारतों पर पीला रंग कराया गया। उसके बाद भी कई रंग बदल कर देखे गए। अंत में हिरमिच और सफेदी से बने गुलाबी रंग को फाइनल किया गया।

दीपावली से पहले पूरे शहर में ढोल बजाकर मुनादी कराई गई कि शहर के लोग अपने निजी भवनों पर गुलाबी रंग करवा लें।

इस मुनादी के बाद परकोटे के सभी निजी भवनों और परकोटे पर गुलाबी रंग कर दिया गया। राज महल और सरकारी इमारतों को भिन्न दिखाने के लिए इन पर रियासत की ओर से रामरज रंग कराया गया था।

सफेदी में पीली मिट्टभ् मिलाकर जो गाढ़ा क्रीम कलर तैयार हुआ, उसे रामरज रंग का नाम दिया गया। किंग एडवर्ड मेमोरियल पर भी यही परंपरा आज तक चलती आई थी और रामरज रंग होता आया था, क्योंकि यह सरकारी इमारत थी।

महाराजा राम सिंह ने जयपुर के लिए हिरमिच से बना रंग पसंद किया था। यादगार पर किया गया रंग जयपुर के रंग से मेल नहीं खाता है।

ऐसा काम कराने वाले और अधिकारी जयपुर के इतिहास, विरासत और संस्कृति से परिचित नहीं है।

इसलिए विरासत को बिगाड़ रहे हैं। अधिकारियों को रंग कराने से पहले मैचिंग तो देखनी चाहिए थी, पीले-सफेद पत्थरों से बनी इमारत पर गुलाबी रंग किसी भी तहर से मैच नहीं होता है। इस पर रामरज रंग ही मैच होता है।

डॉ. आनंद शर्मा, इतिहासकार

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