नई दिल्ली।

राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, यानी नेशनल एलिजिबल एंट्रेंस टेस्ट (NEET 2019) के परिणाम में किए गए बड़े बदलाव के चलते देश में 40000 करोड रुपए के नीट (NEET) घोटाले का मामला सामने आया है।

परीक्षा परिणाम को इस बार परसेंटेज के बजाय परसेंटाइल फॉर्मूला में जारी करने के कारण यह घोटाला हुआ है। इसमें कई उच्च अधिकारियों के नाम सामने आ रहे हैं, और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है।

जानकारों का मानना है कि जिम्मेदार अधिकारियों के द्वारा जानबूझकर इस घोटाले को अंजाम दिया गया है, ताकि देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को 40 हज़ार सीटों पर मनमानी से एडमिशन हो सके और उसके द्वारा रुपयों की उगाही की जा सके।

चांदी कूटने वाले प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के एक गिरोह के द्वारा यह सारा खेल करवाया गया है, जबकि देश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में केवल 30 हज़ार एमबीबीएस सीटें हैं।

आसानी से समझ में आता है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 30 हज़ार और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 40 हज़ार एमबीबीएस सीटों पर होने वाले एडमिशन के लिए इस बार नीट रिजल्ट परसेंटेज के बजाय परसेंटाइल फार्मूले में जारी क्यों किया गया है।

आपको बता दें कि इस बार नीट की परीक्षा देने वाले 14 लाख से अधिक परीक्षार्थी थे, जिनमें से परसेंटाइल फार्मूले के आधार पर आठ लाख विद्यार्थियों को क्वालीफाई कर दिया गया।

यानी जो छात्र 500 अंक लाया है, वह और जो 137 अंक ला पाया है, वह निजी कॉलेज की नज़र में समान है। जबकि पूरे देश में सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की सीटों को मिलाकर 70 हज़ार संख्या है।

अब ऐसे में जो छात्र 500 अंक लाने में कामयाब हुआ है, वह और जो छात्र 137 अंक लाकर परसेंटाइल के हिसाब से क्वालीफाई करने में कामयाब हो गया है, वह निजी कॉलेज की नज़र में बराबर मानकर एडमिशन लेने में कामयाब हो जाएगा।

इसका मतलब यह हुआ कि 30 हज़ार सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीटों के बाद बची हुई 40 हज़ार प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस सीटों पर एडमिशन के लिए मनमाफ़िक उगाही से जमकर चांदी कूटी जाएगी।

गौरतलब यह है कि कई प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के द्वारा एक करोड़ से लेकर डेढ़ करोड़ तक रुपए लेकर एडमिशन देने के मामले सामने आते रहते हैं, जबकि सरकारी निर्धारण फीस के अनुसार इन मेडिकल कॉलेजों की फीस करीब 15 लाख रुपए है।

इस घालमेल से सहज ही समझ में आता है कि 8 लाख विद्यार्थियों को क्यों क्वालीफाई किया गया है, जबकि पूरे देश में केवल एमबीबीएस की केवल 70 हज़ार सीटें हैं।

ऐसे में जिन छात्रों के पास पैसे हैं, वह कम नंबर होने के बावजूद प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने में कामयाब हो जाएंगे, जबकि अधिक अंकों वाले गरीब छात्र इससे महरूम रहेंगे।

उल्लेखनीय बात यह भी है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के द्वारा हर साल सीटें बेची जाती है, इस बात का पता मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) को भी है, लेकिन सारा पैसा दो नंबर में लिए जाने के कारण कोई अधिकारी इन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों लोकसभा में नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल जयपुर शहर की दो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भारी अनियमितताओं का मामला उठाते हुए कहा था।

बेनीवाल ने कहा था कि एमसीआई के अधिकारियों के साथ इन मेडिकल कॉलेजों संबंध होने के कारण बरसों से सारी अनियमितताएं हो रही है, किंतु न तो सरकार इन पर हाथ डालने की हिम्मत करती है और ना ही अधिकारियों के द्वारा कोई कार्रवाई की जाती है।

आपको बता दें कि राजधानी के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज उदयपुर के मेडिकल कॉलेज इस बात के लिए कुख्यात हो चुके हैं कि छात्रों को एडमिशन देने के लिए करोड़ों रुपए की उगाही करते हैं।

40 हजार करोड़ से अधिक के इस महा घोटाले को लेकर केंद्र सरकार से भी शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अभी तक किसी तरह का एक्शन नहीं होना सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े करता है।

बिल्कुल साफ है कि जिन निजी मेडिकल कॉलेजों में करोड़ों रुपए लेकर छात्रों को एडमिशन दिया जाएगा, वह कमजोर छात्र एमबीबीएस करने के बाद डॉक्टर बनकर जनता की सेवा किस तरह से करेंगे और देश के प्रति उनकी निष्ठा कैसी होगी, यह बात भी आसानी से समझी जा सकती है।

एक बात और उल्लेखनीय है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमसीआई के द्वारा सीटें बढ़ाने में काफी देरी की जाती है, जबकि तय मापदंड पूरे नहीं होने पर भी निजी मेडिकल कॉलेजों की इंस्पेक्शन करके उनको मनमाफिक संख्या में सीटें अलॉट कर दी जाती है।

राजधानी जयपुर की ही बात की जाए तो यहां पर सबसे पुराने सरकारी मेडिकल कॉलेज (एसएमएस) और जयपुर के एक कुख्यात हो चुके प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की सीटें बराबर हैं, जबकि एसएमएस मेडिकल कॉलेज को पूरे 72 साल हो चुके हैं और इस प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को केवल 10 साल पहले शुरू किया गया था।