यूं बन सकते हैं हनुमान बेनीवाल मुख्यमंत्री, सियासत को खेलना कांग्रेस का चाल-चरित्र रहा है-

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रामगोपाल जाट।

राजस्थान में 153 सीटों के प्रचंड बहुमत के बावजूद एक और पार्टी के नेता जहां कोप भवन में बैठे थे, वहीं एक विधायक ऐसे भी थे, जो जयपुर से दिल्ली तक ताबड़तोड़ बैठ कर करने में व्यस्त थे।

रिश्तेदार होने के कारण कांग्रेस के दिग्गज नेता नाथूराम मिर्धा को मनाने के लिए भेजा गया, लेकिन केवल 10 मिनट के भीतर नाथूराम मिर्धा कोप भवन से बड़बड़ाते हुए बाहर निकले। उन्होंने किसी को भी कुछ बताने से इनकार कर दिया और सीधे दिल्ली चले गए।

दूसरे दिन सूचना आई कि राजस्थान का अगला मुख्यमंत्री सरदारपुरा से विधायक अशोक गहलोत होंगे। पार्टी के आलाकमान सोनिया गांधी ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के लिए हरी झंडी दिखा दी है।

9 दिसंबर 1998 को अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। उनका पूरा मंत्रिमंडल सज कर तैयार था, और राजस्थान विधानसभा का उस कार्यकाल में पहला सेशन शुरू होने जा रहा था।

लेकिन विडंबना यह थी, कि विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर कौन से ऐसे नेता को बिठाया जाए, जो न केवल पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर विधायिका के मान सम्मान को बचाते हुए पूरे 5 साल तक लोकतंत्र के इस मंदिर को चला सके?

सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया की भोपालगढ़ विधायक और राजस्थान में राजनीति के भीष्म पितामह को विधानसभा अध्यक्ष बनाया जाए, लेकिन उनको मनाने के लिए किसी नेता की हिम्मत नहीं हुई।

आखिरकार खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनके पास जाकर विधानसभा अध्यक्ष बनने की अपील की। लंबे समय से अशोक गहलोत अपने सभी राजनीतिक निर्णय लेने से पहले उनके पास जाया करते थे। दिखने में कठोर जरूरत है, लेकिन कोई भी व्यक्ति, कभी उनके दर से खाली हाथ नहीं लौटा।

अशोक गहलोत लौटे विधानसभा का सत्र शुरू हुआ और भोपालगढ़ के विधायक को विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त कर दिया गया। अगले 5 साल तक उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से, बिना किसी लाग लपेट के विधान सभा को बिल्कुल भीष्म पितामह के रूप में चलाया।

ऐसे विधानसभा अध्यक्ष थे भोपालगढ़ के विधायक और कांग्रेस के राजस्थान में दिग्गज नेता परसराम मदेरणा। दूसरी राजस्थान विधानसभा यानी 1957 से लेकर 1998 तक लगातार विधायक बने। कई बार राजस्थान सरकार में मंत्री रहे और विधानसभा अध्यक्ष के रूप में राजस्थान विधानसभा को एक विशेष स्थान दिलाने में कामयाब हुए।

9 दिसंबर 1998 से लेकर 8 दिसंबर 2003 तक परसराम मदेरणा विधानसभा संभाल रहे थे तो उनके ही राजनीतिक शिष्य, यानी अशोक गहलोत प्रदेश की कमान संभाले हुए थे।

1998 में 153 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी 2003 में सिमटकर 56 सीटों पर पहुंच गई, तो दूसरी ओर 33 सीटें हासिल करने वाले भाजपा 120 सीटों के साथ ऐतिहासिक रूप से बहुमत हासिल करते हुए सत्ता में वापसी करने में कामयाब हुई। मुख्यमंत्री बनीं वसुंधरा राजे।

2003 से 2008 तक मुख्यमंत्री रहते हुए वसुंधरा राजे ने राजस्थान में कई ऐतिहासिक काम किए, लेकिन तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर और वसुंधरा राजे के बीच टिकट बंटवारे के विवाद के कारण पार्टी को सत्ता खोनी पड़ी। बीजेपी केवल 78 सीटों पर सिमट कर रह गई। लेकिन कांग्रेस को भी बहुमत नहीं मिला और 96 में सीटों के साथ जोड़ तोड़ करना पड़ा।

बहुजन समाजवादी पार्टी को पहली बार राजस्थान में 6 विधानसभा सीट हासिल हुई थी, लेकिन पहली बार विधानसभा में चुनकर गए नवलगढ़ विधायक राजकुमार शर्मा के द्वारा रास्ता बनाने के कारण खुद शर्मा सहित सभी छह विधायकों ने बसपा छोड़कर कांग्रे जॉइन कर ली।

अब राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के पास 102 विधायक थे। लेकिन उन्होंने निर्दलीय विधायक गोलमा देवी और एक अन्य विधायक का सहारा लेते हुए 104 सीटों के साथ सरकार बना दी।

बीजेपी को अगले 5 साल तक सत्ता से बाहर रहना पड़ा। इसके बाद 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में बनी प्रचंड लहर के सहारे भाजपा ने 163 सीटों के साथ ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया और एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनीं वसुंधरा राजे।

यह राजस्थान विधानसभा राजस्थान की जनता की मानसिक स्तर को दर्शाता है, कि यहां पर जो भी पार्टी काम नहीं करती है, जो भी नेता काम नहीं करता है, उसको मुख्यमंत्री की सीट से उतार दिया जाता है। और जिसमें जनता को पोटेंशियल नजर आता है, उसे सीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया जाता है।

अब 7 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य में बीजेपी ने अब तक 131 उम्मीदवार मैदान में उतार दिया हैं। इस बार बीजेपी साल 2008 वाली गलती करती नजर नहीं आ रही है, लेकिन प्रदेश में बनी एंटी इनकंबेंसी के चलते पार्टी पर नुकसान होने का खतरा मंडराने लगा है।

दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी 2 दिन से लगातार दिल्ली में टिकट बंटवारे को लेकर अपने तीन नेताओं के बीच में फंसी हुई नजर आ रही है। पार्टी अपनी पहली सूची भी जारी नहीं कर पाई है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस की पहली सूची 15 नवंबर को आएगी।

राजस्थान में भाजपा से अलग हुए नेताजी विधायक घनश्याम तिवाड़ी अपने भारत वाहिनी पार्टी बना चुके हैं, तो दूसरी तरफ साल 2008 में भाजपा के विधायक बने हनुमान बेनीवाल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाकर तीसरे मोर्चे की हुंकार भर चुके हैं।

वैसे तो इन दोनों ही नेताओं की महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है, लेकिन दोनों का यह लक्ष्य एक होते हुए भी वर्तमान सरकार की मुख्यमंत्री को किसी भी सूरत में राजस्थान से बाहर भगाने के लिए संकल्पबद्द भी हैं।

राज्य में बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच भाजपा के जैतारण विधायक और जलदाय मंत्री सुरेंद्र गोयल ने पार्टी छोड़ दी है। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है, लेकिन यह बात भी सामने आई है कि गोयल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे।

अब तक राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के साथ साथ भारत वाहिनी पार्टी के रूप में आए दिन चुनाव के बनते बिगड़ते समीकरण कर्नाटक की तरह नजर आ रहे हैं।

इस साल के मध्य में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान 222 सीटों पर मतदान हुआ। जिसमें से 78 सीटों के साथ कांग्रेस पार्टी दूसरे स्थान पर रही। 104 सीट बीजेपी को मिली, लेकिन बहुमत हासिल नहीं कर पाई। ऐसे में 40 सीट पाने वाली एचडी देवेगौड़ा की पार्टी को समर्थन करते हुए कांग्रेस ने उनके बेटे एचडी कुमारास्वामी को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया।

चुनाव से पहले एचडी देवेगौड़ा और कांग्रेस पार्टी के सिद्धारमैया ने एक दूसरे को जमकर गालियां निकाली। सत्ता हासिल करने के लिए दोनों ही दलों के नेताओं ने एक दूसरे पर जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, और अंततः जब दोनों को ही बहुमत हासिल नहीं हुआ तो गले लग गए।

104 सीटों के साथ विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और केवल 40 सीटों के नेता एचडी कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ।

राजस्थान में इन दिनों कांग्रेस पार्टी भाजपा को और भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर गालियां दे रहे हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल और भारत वाहिनी पार्टी के घनश्याम तिवाड़ी भाजपा और कांग्रेस को भ्रष्ट पार्टियां बता रहे हैं।

नागौर, चूरू, सीकर, झुंझुनू, बीकानेर, बाड़मेर, अजमेर, जोधपुर समेत आधे जयपुर में अब तक हनुमान बेनीवाल बड़ी रैलियों के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं। तो दूसरी तरफ घनश्याम तिवाड़ी राजस्थान के कोने कोने में घूमकर भाजपा को घेरते नजर आ रहे हैं।

दोनों ही नेताओं ने दावा किया है, कि राजस्थान में तीसरे मोर्चे का गठन किया जाएगा और सभी 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़कर सत्ता हासिल की जाएगी। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता से समर्थन मांगा है।

वापस लौटते हैं कर्नाटक के चुनाव पर। कर्नाटक में परिणाम आने से पहले कांग्रेस पार्टी एचडी देवेगौड़ा की पार्टी और देवेगौड़ा पिता पुत्रों को जमकर गालियां दे रही थी, लेकिन जैसे ही परिणाम आया और खुद को बहुमत नहीं मिला, तो तुरंत भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए 40 सदस्यों वाली पार्टी को समर्थन देकर उसी के पार्टी के मुखिया को मुख्यमंत्री का पद सोपान दे दिया।

राजस्थान में अगर 2008 वाली स्थिति पैदा होती है, तो ऐसे वक्त में इस बार बसपा मैदान में आ तो रही है, लेकिन उसकी उपस्थिति मात्र ही रहने की संभावना है। जाट, मेघवाल, मीणा, मुसलमान, ब्राह्मणों सहित कई जातियां हनुमान बेनीवाल की पार्टी को समर्थन कर रही है। ऐसे में एक और जहां कांग्रेस को तगड़ा नुकसान होने वाला है, वहीं सत्ता विरोधी लहर के चलते भाजपा को भी परेशानी होने जा रही है।

भले चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी भाजपा को और भाजपा कांग्रेस को गालियां निकाले, भले ही हनुमान बेनीवाल कांग्रेस को कोसे और भाजपा को गालियां निकाले, लेकिन सच्चाई यह है कि परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा कि कौन किसकी गोद में बैठता है, और कौन सरकार बनाने में कामयाब होता है।

मतदान का परिणाम के बाद यदि भाजपा और कांग्रेस में से किसी को भी बहुमत हासिल नहीं होता है, तो ऐसी स्थिति में हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी का तीसरा मोर्चा बिल्कुल वही भूमिका निभाएगा, जो कर्नाटक में एचडी कुमारास्वामी वाली पार्टी ने निभाया था। ऐसे समय में कांग्रेस पार्टी किसी भी सूरत में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

हालांकि, कर्नाटक में चोट खाने के कारण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह किसी भी हाल में राजस्थान में सत्ता से बाहर रहने की भूल नहीं करेंगे। संभावना इस बात की है कि यदि कांटे का मुकाबला हुआ तो हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी को बीजेपी पहले ही साधने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर सकती है।

जोड़-तोड़ कर बनी सरकारें सामान्यतः पूरे 5 साल तक चलने में कामयाब नहीं हो पाती हैं, लेकिन जिस तरह से हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे हैं, उसके लिए केवल एक ही उम्मीद है, और वह कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव जैसा परिणाम।

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