हनुमान बेनीवाल वसुंधरा राजे
हनुमान बेनीवाल वसुंधरा राजे

जयपुर।
नागौर से सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल ने भाजपा के साथ गठबंधन कर बड़ा फायदा उठाया, लेकिन अब जबकि निकाय चुनाव में बीजेपी को बेनीवाल की जरुरत है, तब वो पीछे हट गये हैं। नतीजा यह हो रहा है कि जिस कांग्रेस को बेनीवाल लंबे समय से पानी पी—पीकर कोस रहे थे, उसी कांग्रेस और उसके नेता अशोक गहलोत को बड़ा फायदा मिल जायेगा।

दरअसल, भाजपा के द्वारा रालोपा से निकाय चुनाव में गठबंधन नहीं करने की बात कहने पर पहले तो हनुमान बेनीवाल ने गठबंधन करने के लिये खूब प्रयास किये, किंतु भाजपा ने बेनीवाल की रालोपा के साथ अलाइंस करने से साफ मना कर दिया, तो उन्होंने चुनाव से हाथ पीछे खींच लिये।

हनुमान बेनीवाल ने ऐलान किया कि रालोपा खुद न तो चुनाव लड़ेगी और न ही किसी उम्मीदवार को रालोपा का सिंबल देगी। इतना ही नहीं, भाजपा को समर्थन देने की भी घोषणा नहीं की। बल्कि उन्होंने कहा कि जो उम्मीदवार मजबूत होगा और पार्टी की कोर कमेटी निर्णय करेगी, तब ही समर्थन दिया जायेगा।

सियासी गलियारों में बेनीवाल के इस फैसले को बड़ा खेल बताया जा रहा है। एक तरफ हनुमान बेनीवाल जहां भाजपा को सहयोग नहीं दे रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा के उम्मीदवारों के खिलाफ खड़े होने वाले प्रत्याशियों को मजबूती के नाम पर सहयोग कर भाजपा को ही हराने का ऐलान भी कर चुके हैं।

इस फैसले का क्या असर होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, किंतु जिन अशोक गहलोत को सबक सिखाने के लिये बेनीवाल पानी पी पीकर दावे करते नहीं थकते थे, उनको ही इस निर्णय का लाभ होने वाला है।

असल में भाजपा और रालोपा के समर्थक और वोटर आज की तारीख में एक ही हो गये हैं। अगर ऐसे समय में भाजपा का रालोपा ने साथ नहीं दिया, तो भाजपा का वोट कटेगा। और जब वोट कटेगा तो निश्चित तौर पर इसका कांग्रेस को फायदा मिलने वाला है।

भाजपा और रालोपा के समर्थन से अगर अलग—अलग उम्मीदवार आमने—सामने होंगे तो पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि तीसरे उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस के प्रत्याशी को जीत मिल सकती है।

अब राजनीतिक जानकारों का कहना है कि रालोपा और भाजपा का गठबंधन नहीं होकर भी रालोपा ने भाजपा को नुकसान पहुंचा दिया है। जबकि वह साइलेंट होकर भाजपा के समर्थन में रहने का काम भी कर सकती थी। अब चूंकि रालोपा के कई कार्यकर्ता निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ेंगे। जो कहीं न कहीं भाजपा को नुकसान और कांग्रेस को फायदा पहुंचाने का काम करेंगे।

बीते सात माह के दौरान दो बार गठबंधन कर भाजपा के सहयोग से एक लोकसभा और एक विधानसभा सीट जीतने में कामयाब रहे बेनीवाल ने इस बार भाजपा के बजाए कांग्रेस को फायदा करने का काम कर दिया है।

सवाल यह उठता है कि भाजपा द्वारा इनकार किये जाने के कारण बेनीवाल ने सबक सिखाने के लिये यह कदम उठाया है? अगर यह बात सच साबित हुई और भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा तो 2023 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच गठबंधन होना खतरे में पड़ जायेगा।