अमित चौधरी/मोहित चौधरी।

हमारे देश में गायों को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आ रही है। खासकर पिछले चार-पांच साल के दौरान गायों की तस्करी करने वाले तस्करों की भीड़ के द्वारा कथित तौर से मारने-पीटने के बाद प्रशासन सवालों के घेरे में है।

ऐसे वक्त में कुछ उदाहरण हैं, जो बता रहे हैं कि जो लोग गे को दूध नहीं देने पर खुली छोड़ देते हैं, उनके लिए न केवल आंखें खोलने वाले हैं, बल्कि उनके लिए कमाई का जरिया भी बन सकती हैं।

कम दूध देने वाली या दूध नहीं देने वाली देशी नस्ल की गायों से कमाई करने वाले लोग बता रहे हैं कि खुली (सूनी) गाय, जो दूध नहीं देती है, उनको किस तरह उपयोगी किया जा सकता है, बल्कि हर माह हजारों रुपए की कमाई भी की जा सकती है।

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सड़क पर खुली हुई गायों और सांडों के कारण कई बार जाम लग जाता है, तो एक्सीडेंट होना बेहद आम बात हो चुकी है। जो गाय दूध देना बंद कर देती है, उसको पशुपालक खुली छोड़ देते हैं।

ऐसे में बेचारे और पानी के जुगाड़ के लिए सड़कों पर विचरण करने लगती है। इनको कई बार तस्कर पकड़ कर ले जाते हैं, जो काटी जाती है, या बीच रास्ते में पकड़े जाते हैं तो धार्मिक विवाद का कारण बनते हैं।

देश में खासतौर से राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब राज्य में गायों की तादात है, जो कि विशेष तौर से देसी गायें हैं। उनकी संख्या बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है।

इन देशी नस्ल की गायों को होलिस्टन नस्ल की गायों के बजाय कम दूध देने वाली माना जाता है। (हालांकि, इसके कोई पुख्ता तथ्य नहीं है) जिसके कारण दूध का उत्पादन करने वाले पशुपालक भी इनको खरीदना और रखना कम पसंद करते हैं।

लेकिन, आपको जानकर आश्चर्य होगा, कि जो गाय दूध नहीं देती है, वह भी आपको हर महीने हजारों रुपए की कमाई दे सकती है। हम आपको ऐसे ही कुछ पशुपालक किसानों से मिलवा रहे हैं, जो बरसों से देसी गाय, जिनमें दूध नहीं देने वाली भी शामिल हैं को पालते हैं और हर माह आय अर्जित कर रहे हैं-

दूध नहीं देने वाली गायें भी देती हर माह हज़ारों की आय, कैसे कमाएं पढ़िए यह लेख- 1

कजोड़ मल चौधरी (जयपुर के पास)-

कजोड़ मल बीते 11 साल से देशी नस्ल की ही गायें पाल रहे हैं। चौधरी दूध देने वाली के साथ ही ऐसी गायों को भी पालने में विश्वास करते हैं, जो भविष्य में भी दूध नहीं देने वाली होती हैं, लेकिन चलने-फिरने में सक्षम हैं। हालांकि, जब गाय चलने-फिरने योग्य नहीं होती है, तब भी चौधरी उनको खुली नहीं छोड़ते हैं।

चौधरी बताते हैं कि उनके पास हमेशा 13 से लेकर 18 गायें ही रही है, लेकिन कभी भी उनको इनके पालन-पोषण को लेकर चिंता नहीं रही, बल्कि अच्छी आय भी अर्जित कर रहे हैं।

चौधरी के मुताबिक गाय के दूध के अलावा उसके गोबर से बायोगैस बनाते हैं। जिससे उनके घर में सिलेंडर लाने की आवश्यकता नहीं होती है। बायोगैस बनाने के बाद गोबर को खेतों में डालते हैं।

बीते 10 साल में उन्होंने कभी भी खेती के लिए रासायनिक खाद य कीटनाशक का उपयोग नहीं किया है। इसके साथ ही गाय के मूत्र से जैविक कीटनाशक बनाते हैं और उसका फसल पर छिड़काव करते हैं।

हेतराम (सीकर)-

पिछले 7 बरस से गाय पालन का काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने हमेशा जैविक खेती को तहरीर दी है। जिसके चलते कभी भी उन्हें बाजार से रासायनिक खाद या जहरीले कीटनाशक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

हेतराम बताते हैं कि उनके घर में आज की तारीख में सात गाय हैं। जिनसे उनकी 3 एकड़ जमीन में बड़े आराम से जैविक खेती हो रही है। गाय के गोबर से बायोगैस बनाते हैं और उसके बाद उसे खेतों में डाल देते हैं।

इसके अलावा गाय के मूत्र से कीटनाशक तैयार करते हैं और उसे फसलों पर छिड़काव करते हैं। उनके उनके मुताबिक इन 7 वर्षों में कभी भी उनको बाजार से रासायनिक खाद या रासायनिक कीटनाशक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ी, अलबत्ता उनके अनाज की वैल्यू पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गई और डिमांड एडवांस बुकिंग पर पहुंच चुके है।

देशी गाय पालने के कई फायदे हैं, (कजोड़मल और हेतराम के मुताबिक)-

पहला-

उनको बाजार से रासायनिक कीटनाशक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जो कि काफी महंगा है।

दूसरा-

घर में गाय होने के कारण उनको कभी भी खाते खरीदने की नौबत नहीं आई। गाय का गोबर होने के कारण उससे उपले बनाकर हवन कराने वाले लोगों को भी बेच देते हैं, उससे भी काफी अच्छी आई होती है।

तीसरा-

गाय के मूत्र से जैविक कीटनाशक तो बनाती ही हैं, साथ ही साथ गाय के गोबर से बने उपयोग के साथ हवन के लिए काम में लिए जाने हेतु गाय का मूत्र भी बेचने के काम आता है।

चौथा-

गाय का दूध, जो कि देसी गाय के नाम से बिकता है, उसकी खरीद भैंस के दूध से भी महंगी होती है। लोग घर बैठे ₹60 लीटर तक गाय का दूध खरीद कर ले जाते हैं। इसके साथ ही गाय का शुद्ध घी भी बड़े आराम से घर से ही बिक जाता है।

पांचवा-

घर में गाय होने के कारण गोबर और कीटनाशक के लिए गाय का मूत्र काम में लेते हैं। इसके चलते बीते एक दशक में उन्होंने कभी भी रासायनिक खेती नहीं की। जैविक खेती होने के कारण उनके कृषि उत्पाद खरीदने के लिए लोग एडवांस में आर्डर देते हैं।

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