RLP के मुखिया बेनीवाल की जीत राजस्थान में जाट राजनीति को देगी यह दिशा-

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जयपुर।

राजस्थान में विधानसभा का 1952 में सबसे पहला चुनाव हुआ था। तब राज्य की अधिकांश विधानसभा सीटों पर राज परिवार और ठिकानों से आए हुए लोगों का ही कब्जा था।

1957 में राजस्थान में दूसरा विधानसभा चुनाव हुआ इस चुनाव में जोधपुर से परसराम मदेरणा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े।

उसके बाद 1998 तक मदेरणा ने एक भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे। दूसरी विधानसभा से लेकर लगातार 11वीं विधानसभा तक परसराम मदेरणा विधायक रहे।

परसराम मदेरणा को ना केवल राजस्थान में, बल्कि देश भर की राजनीति में एक किसान नेता के रूप में पहचान मिली।

साल 2011-12 के दौरान उनके बेटे और तत्कालीन जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा पर भंवरी देवी अपहरण और हत्या कांड से पहले तक मदेरणा परिवार प्रदेश की राजनीति में एक अहम स्थान रखता था।

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मदेरणा के समकालीन रामनिवास मिर्धा और उनके भाई नाथूराम मिर्धा नागौर, बाड़मेर, चूरू, अजमेर समेत आसपास के जिलों में अपना अहम कद रखते थे।

मिर्धा परिवार लोगों के अटूट विश्वास का आलम यह था किग 1977 में आपातकाल के बाद जहां पूरे देश में कांग्रेस पार्टी सफाई की तरफ थी, वही विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने मारवाड़ की 42 में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की।

नाथूराम मिर्धा रामनिवास मिर्धा के पिता बलदेव राम मिर्धा आजादी से पहले मारवाड़ क्षेत्र में अपना अहम कद रखते थे।

इधर, झुंझुनू में शीशराम ओला भी राज्य की जात सियासत में अपना खास स्थान रखते थे। ओला न केवल केंद्रीय मंत्री बने, बल्कि राजस्थान में भी मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार रहे।

2014 में लोकसभा चुनाव के पहले केंद्रीय मंत्री रहते ही शीशराम ओला की मृत्यु हो गई।

उनकी जगह उनके बेटे बृजेंद्र ओला को कांग्रेस पार्टी ने 2013 में विधानसभा का चुनाव लड़ाया और वह झुंझुनू विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने।

जोधपुर संभाग में परसराम मदेरणा की जगह उनके बेटे महिपाल मदेरणा नागौर और आसपास के जिलों में नाथूराम मिर्धा के बेटे हरेंद्र मिर्धा व रामनिवास मिर्धा की बेटी ज्योति मिर्धा ने भी सियासत में अहम स्थान पाया।

इसके साथ ही झुंझुनू में शीश राम ओला के बेटे बृजेंद्र ओला ने अपने अपने नेताओं की राजनीतिक विरासत संभालने का प्रयास किया।

हालांकि, महिपाल मदेरणा एक नर्स भंवरी देवी के अपहरण और हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं, तो दूसरी तरफ नाथूराम मिर्धा और रामनिवास मिर्धा का निधन हो चुका है।

बृजेंद्र ओला वर्तमान में कांग्रेस की विधायक हैं, लेकिन उनका दबदबा अपने पिता शीशराम ओला की तरह नहीं है।

यही वह दौर था, जब राज्य में अपनी रियासतें गवा चुके राजपूत बिरादरी जाट समाज के सीधे निशाने पर आ गई थी।

दरअसल, राज्य में लोकतांत्रिक प्रणाली लागू होने के बाद भी पॉवर में रहने के लिए पूर्व राजपरिवारों के सदस्य चुनाव लड़ा करते थे।

ये लोग अपने दबदबे को कायम रखने के लिए एससी-एसटी और और दलित समुदाय के मतदाताओं को मतदान प्रक्रिया से दूर रखने के लिए डराया-धमकाया करते थे।

कहा जाता है कि राज्य में जाट मार्शल कम होने के कारण राजपूतों से सीधी टक्कर लेते थे। इन दबे कुचले समाजों को मुख्यधारा में लाने के लिए उनकी राजपूत समाज से कई लड़ाइयां हुई थीं।

तब से लेकर अब तक राज्य में जाट और राजपूत समाज के बीच अलग अलग समय, अलग अलग तरीके से सियासी झड़प चलती रही है।

ऐसे कहा जा सकता है यह साल 2010 के बाद राजस्थान में जाट राजनीति ढलान की तरफ आ गई है।

जाट राजनीति में नेतृत्व करता हूं की कमी होने के कारण यह स्थान रिक्त होता नजर आ रहा है।

लेकिन 2009 से लेकर अब 2018 तक इस क्षेत्र में विधायक हनुमान बेनीवाल एक मुखर राजनेता के रूप में स्थापित होते नजर आ रहे हैं।

2006 में जीवन राम गोदारा हत्याकांड के बाद हनुमान बेनीवाल ने कुख्यात बदमाश आनंदपाल को लेकर राज्य की इस दौरान बनी दोनों सरकारों को खूब घेरा है।

करीब डेढ़ साल पहले आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद राजपूत समाज में न केवल राज्य सरकार के प्रति रोष है, बल्कि हनुमान बेनीवाल को भी राजपूत समाज का दुश्मन माना जाता है।

किसानों और युवाओं की समस्याओं को लेकर हनुमान बेनीवाल राज्य सरकार को लगातार अपने निशाने पर रखते हैं।

हनुमान बेनीवाल के उग्र व्यवहार के चलते पश्चिमी राजस्थान खासकर जाट समाज के युवा व किसान उनको नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परसराम मदेरणा और शीशराम ओला के रूप में देखते हैं।

किसानों की समस्याओं को लेकर हनुमान बेनीवाल सरकार के खिलाफ खासतौर से पिछले 5 साल में हर मोर्चे पर लड़ते आ रहे हैं।

ऐसे में बेनीवाल ने केवल जाट समाज में युवाओं के आदर्श नेता बनते जा रहे हैं, बल्कि दूसरी तरफ किसानों के लिए एक नई उम्मीद जगाते हैं।

बीते 2 साल में नागौर, बीकानेर, बाड़मेर, सीकर और 29 अक्टूबर को जयपुर में एक लाख लोगों से अधिक की भीड़ जुटाकर हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान की किसान और युवा सियासत को एक नई दिशा देने का काम किया है।

उन्होंने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नाम से खुद का राजनीतिक दल गठन कर लिया है।

बीजेपी से अलग होकर भारत वाहिनी पार्टी बना चुके वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी के साथ गठबंधन कर प्रदेश से बीजेपी और कांग्रेस को हराने का दावा कर रहे हैं।

बीते 5 साल के दौरान हनुमान बेनीवाल के साथ प्रदेश में किसानों और युवाओं की समस्याओं को लेकर कंधे से कंधा मिलाते हुए मीणा समाज के दिग्गज विधायक किरोड़ी लाल मीणा भी उनके साथ नजर आते थे।

लेकिन इस साल के मध्य में राज्य सभा चुनाव के दौरान किरोड़ी लाल मीणा 9 साल बाद फिर से भाजपा के पाले में चले गए।

अब, जबकि किरोड़ी लाल मीणा बीजेपी में जा चुके हैं, तब हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी मिलकर राजस्थान में सभी 200 विधानसभा सीटों पर गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं।

राज्य में रिक्त हुई जाट सियासत को फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए हनुमान बेनीवाल प्रयास रहते हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और भाजपा के शासन से आजिज आ चुकी जनता के उग्र रूप भी दोनों नेता भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।

नई पार्टी बनाने के साथ ही हनुमान बेनीवाल को जाट समाज से अपार जनसमर्थन मिला है, बल्कि सत्ता आने पर किसानों की संपूर्ण कर्ज माफी को लेकर किसान वर्ग को भी बेनीवाल ने अपने पक्ष में करने का पूरा इंतजाम कर दिया है।

साथ ही साथ युवाओं को आकर्षित करने के लिए बेनीवाल ने वादा किया है कि प्रत्येक बेरोजगार युवा को उनकी सरकार बनती है तो हर माह 10 हज़ार रुपए न्यूनतम भत्ता देगी।

बेनीवाल का दावा है कि पिछले 25 साल के दौरान भाजपा कांग्रेस एक एक बार कर रही है, राज बावजूद इसके आज तक राजस्थान में बड़े मुद्दों का समाधान नहीं हो पाया है।

किसानों की दृष्टि मुख्य मुद्दा किसानों की कर्ज माफी और सिंचाई के पानी का पर्याप्त इंतजाम हैं।

आपको बता दें कि राजस्थान में, खासकर पश्चिमी राजस्थान में किसानों के लिए कर्जमाफी, समय पर बिजली और सिंचाई के लिए पानी का इंतजाम सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

बेनीवाल बीते 5 साल से इन्हीं मुद्दों को टारगेट कर अपनी राजनीति आगे बढ़ा रहे हैं।

उनका कहना है: ‘जिस राज्य की 65% जनता खेती और किसानी पर निर्भर हो और वहां पर किसान कर्जे तले आकर आत्महत्या कर लें, बिजली के लिए तरसते रहे हैं।

छोटे-छोटे बिजली के बिल जमा नहीं कराने पर किसानों के बिजली कनेक्शन काट दिए जाएं, तो ऐसे राज्य में सरकार किसके लिए काम करती है, यह समझ से परे है?’

उनका दावा है कि अगर उनकी सरकार बनती है, तो किसानों से संबंधित इन सभी मुद्दों को सबसे पहले निपटाया जाएगा।

जाट समाज की राजनीतिक विरासत संभालने के सवाल पर हनुमान बेनीवाल कहते हैं कि ‘वह केवल जाट समाज के नेता नहीं है, बल्कि सभी 36 कौम की नेतागिरी कर रहे हैं और सभी की समस्याओं को लेकर सरकार से लड़ रहे हैं।’

मिर्धा मदेरणा और उड़ा नेताओं की राजनीतिक विरासत संभालने के सवाल पर बेनीवाल खास प्रतिक्रिया नहीं देते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं, कि इन्हीं नेताओं की वजह से राज्य में किसानों के ऊपर सरकारों का पूरा फोकस रहता था।

लेकिन अब कोई बड़े कद का किसान नेता नहीं होने के कारण आज राज्य में किसानों की नेतागिरी हाशिए पर चली गई है।

आपको बताते चलें कि राजस्थान में इन तीन परिवारों के नेताओं के निधन के बाद प्रदेश में जाट राजनीति मृत प्राय हो चुकी थी, जिसको बेनीवाल संभालने का प्रयास कर रहे हैं।

जाट महासभा द्वारा हनुमान बेनीवाल को समर्थन दिए जाने के बारे में राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील का कहना है कि उन्होंने कभी भी नहीं कहा की जाट महासभा बेनीवाल या उनकी पार्टी को समर्थन दे रही है।

लेकिन आदर्श जाट महासभा राज्य में करीब एक माह पहले अपने नए अध्यक्ष सूबे सिंह चौधरी की नियुक्ति के वक्त हनुमान बेनीवाल को समर्थन देने का ऐलान कर चुकी है।

सुबे सिंह चौधरी का कहना है कि राज्य में किसानों का हित देखने वाले जाट नेता का हम खुलकर समर्थन करते हैं और इसके लिए हमें किसी की राय लेने की आवश्यकता नहीं है।

आपको बता दें कि राजस्थान में 1993 के विधानसभा चुनाव के वक्त पूर्ण बहुमत में नहीं होने के बावजूद भाजपा के नेता भैरों सिंह शेखावत ने सरकार बनाई थी।

1998 में परसराम मदेरणा को आगे करके कांग्रेस पार्टी ने जाट मुख्यमंत्री के नाम पर सत्ता हासिल की, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी अशोक गहलोत की हुई।

2003 में बीजेपी की तरफ से राजस्थान आईं वसुंधरा राजे 120 सीटों के साथ सरकार बनाने में कामयाब रहीं।

2008 में एक बार फिर 96 सीट होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया।

2013 में नरेंद्र मोदी लहर में भाजपा ने 163 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया।

साल 2013 में हनुमान बेनीवाल की तरह मीणा विधायक किरोड़ी लाल मीणा ने भी सरकार के खिलाफ बिगुल बजाते हुए प्रदेश में कई जगह विशाल सभाएं की थी।

हेलीकॉप्टर लेकर मीणा ने राज्य में सत्ता नहीं होते हुए भी सत्ता की चाबी अपने पास होने का दावा किया था, लेकिन परिणाम जब आया तो मीणा की पार्टी राजपा को केवल 4 सीटों पर जीत हासिल हुई।

2 साल के दौरान हनुमान बेनीवाल भी राजस्थान में 4 विशाल सभाएं कर चुके हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि राजस्थान में 2013 के दौरान जयपुर में हुई नरेंद्र मोदी की सभा के मुकाबले हनुमान बेनीवाल की यह चार सभाएं हुई है।

लेकिन सवाल यह है कि 2013 में किरोड़ी लाल मीणा के द्वारा की गई विशाल सभाएं उनको सत्ता नहीं दिला सकी, तो क्या यह भीड़ हनुमान बेनीवाल को वोटर्स के रूप में हासिल हो पाएगी?

थर्ड फ्रंट के राजस्थान में सियासी वजूद को लेकर कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है कि राज्य में हमेशा ही भाजपा और कांग्रेस दो ही पार्टियों का शासन रहा है और प्रदेश की जनता इन दोनों पार्टियों को ही सत्ता की चाबी सौंपती है।

ऐसे में तीसरे मोर्चे की संभावना कहीं नहीं है यह केवल दिखावा है। कुछ इसी तरह का बयान देते हुए बीजेपी के नेता राजेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि यह यह ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ हैं जो हनुमान बेनीवाल देख रहे हैं, ऐसा ही सपना 2013 के दौरान किरोड़ी लाल मीणा देख चुके हैं।

राजस्थान में 7 दिसंबर को होने वाले मतदान के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां सत्ता में आने का दावा कर रही है, लेकिन दोनों ही पार्टियों अपनी अपनी समस्याएं हैं।

जिनको लेकर पार्टियां अंदरूनी और बाहरी तौर पर जूझ रही हैं। भारतीय जनता पार्टी जहां सत्ता विरोधी लहर से मुकाबला करने के लिए लड़ रही है।

वहीं पर कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर लाल डूडी के बीच में शीत युद्ध चल रहा है।

हालांकि, राजस्थान में बीते 25 साल के दौरान तीसरे मोर्चे या निर्दलीय विधायकों का खास दबदबा नहीं रहा।

लेकिन फिर भी 1957 से लेकर 1993 के कालखंड के दौरान दूसरी छोटी पार्टियां और निर्दलीय विधायकों ने सरकारों में अहम भूमिका निभाई है।

तब प्रदेश में नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परसराम मदेरणा और शीशराम ओला सरीखे नेता कांग्रेस पार्टी के कर्णधार हुआ करते थे।

जिस तरह के सियासी समीकरण नजर आ रहे हैं, उससे फिलहाल प्रदेश में न केवल सत्तारूढ़ भाजपा, बल्कि कांग्रेस पार्टी भी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता प्राप्त करती नजर नहीं आ रही है।

ऐसे में हनुमान बेनीवाल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनी पार्टी मिलकर कितनी विधानसभा सीटें जीत पाती है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।