जयपुर।
कौशल विकास एवं आजीविका मिशन के प्रबंध निदेशक और श्रम विभाग के आयुक्त आईएएस डॉ. समित शर्मा को 27 जून 2019 को ही इस पद पर लगाया गया है। इससे पहले डॉ. शर्मा का तबादला कर 19 दिसंबर 2018 को एनएचएम के निदेशक के पद पर भेजा गया था, जहां पर वह 4 जनवरी 2011 से लेकर 8 जनवरी 2014 तक रह चुके थे।

यहां रहते हुये डॉ. शर्मा ने विश्व की एकमात्र मुफ्त दवा और फ्री जांच योजना शुरू कर अपना और प्रदेश का एक अलग मुकाम बनाया था। उन्होंने 2011 में राज्य सरकारी अस्पतालों में 450 से ज्यादा प्रकार की दवाइयां और तकरीबन सभी तरह की फ्री जांचें करने की स्कीम शुरू कर इतिहास रचा था।

2004 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. समित शर्मा खुद एक ‘चाइल्ड स्पेशलिस्ट’ रह चुके हैं। स्वयं डॉक्टर होने के नाते उनको मरीजों की समस्याओं को समझने का अनुभव था। साथ ही वह रोगियों और उनके परिजनों पर उपचार कराने के कारण पड़ने वाले आर्थिक बोझ के भारी संकट को भी जानते थे।

IAS डॉ. समित शर्मा मंत्री डॉ. रघु शर्मा की आंख में इसलिये खटके 1

यही कारण था के साल 2009 से 2011 तक नागौर के ​जिला कलेक्टर रहते हुये उन्होंने जिले में फ्री दवा योजना को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया था, जो जबरदस्त सफल रहा।

इस योजना और इसके फायदों के बारे में जब डॉ. शर्मा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बताया तो उन्होंने इसको पूरे राज्य में लागू करने की अनुमति दे दी। साथ ही तत्काल प्रभाव से उनको एनएचएम का निदेशक भी बना दिया।

2 अक्टूबर 2011 से फ्री दवा योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया गया। इसके बाद मुफ्त जांच योजना भी शुरू की गई। इन योजनाओं के कारण अशोक गहलोत सरकार की वाहवाही पूरे देश में हुई। कई अन्य राज्यों ने भी कमोबेश इसी तरह की योजनाएं शुरू कीं।

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यहां तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये नरेंद्र मोदी ने भी अपने प्रदेश में मरीजों के लिये इस योजना से प्रेरणा लेकर जनता के लिये फ्री स्वास्थ्य स्कीम शुरू की थी। योजना की सफलता को देखने के लिये विदेशों से भी विशेषज्ञ आये और स्कीम के संचालन का अध्ययन करके गये, जिसे विश्वभर में सराहा गया।

2013 में वसुंधरा राजे की सरकार बनी तो 9 जनवरी 2014 को डॉ. समित शर्मा का ट्रांसफर कर दिया गया। दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुफ्त दवा योजना को जहर की गोलियां बोलकर प्रचारित किया, लेकिन इसके बाद भी इस योजना को पूरे पांच साल तक जारी रखा गया।

भाजपा का दावा है कि इस दौरान योजना पर गहलोत की 2008 से 2013 वाली सरकार के बजाए तीन गुणा अधिक पैसा खर्च किया गया। हालांकि, यह बात अलग है कि दवा काउंटर्स पर जरूरी 10 के मुकाबले केवल 2 ही दवा मिलती थी, जिसे वसुंधरा सरकार ने स्वीकार नहीं किया गया।

इस योजना को दबाने और मरीजों को अधिक फायदा पहुंचाने के लिये वसुंधरा राजे सरकार ने 2015 में ‘भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना’ शुरू की। जिसमें 30 हजार से लेकर 3 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर है। इस योजना पर राज्य सरकार ने करीब साढ़े तीन साल में लगभग 2200 करोड़ रुपये खर्च किये।

भाजपा की भांति ही कांग्रेस ने भी दिसंबर 2018 के चुनाव में ‘भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना’ को बेकार बताया और वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने ही एक जनसभा में कहा कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही ‘भामाशाह कार्ड’ तोड़कर फैंक दिया जायेगा, किंतु ऐसा आजतक नहीं हो पाया है।

अब राज्य सरकार ने विधानसभा में कहा है कि एक मंत्री समूह ‘भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना’ में कथित तौर पर हुये करोड़ों रुपयों के घोटाले की जांच करेगा। हालांकि, अभी तक इसके लिये किसी मंत्री समूह का गठन नहीं किया गया है।

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान स्वास्थ्य विभाग में ‘स्वास्थ्य अधिकारियों’ के 2500 पदों पर भर्ती को लेकर विवाद पैदा हो गया, जिसके लिये लगभग 30 हजार आवेदन किये गये। भर्ती लोकसभा चुनाव की आंचार संहिता के दौरान निकाली गई थी, जिसके लिये नियमानुसार बकायदा लिखित रुप से चुनाव आयोग ने अनुमति ली गई थी।

जिस दिन इस भर्ती के ​लिये परीक्षा आयोजित की जानी थी, उसके दो दिन पहले ही इसको लेकर विवाद सामने आया। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार बताया तो यह जाता है कि विवाद जानबूझकर किया गया था, क्योंकि इस भर्ती में अजमेर जिले में एक भी पद नहीं था, जो रघु शर्मा का गृह नगर और चुनाव क्षेत्र भी है।

राज्य के ‘दैनिक भास्कर’ नामक अखबार ने इस भर्ती को घोटाला लिखकर उजागर करने का दावा किया और लगातार तीन—चार दिन तक खबरें प्रकाशित कर एनएचएम निदेशक डॉ. समित शर्मा को ‘विलेन’ साबित करने का भरकस प्रयास किया। इस दौरान अखबार ने मंत्री के पक्ष में जबरदस्त खबरें प्रकाशित कीं।

सूत्रों की मानें तो अखबार के जिस रिपोर्टर ने खबरें लिखीं, उसने डॉ. समित शर्मा के बयानों को बुरी तरह से तोड़—मरोड़ कर पेश किया। डॉ. समित शर्मा और विभाग के अन्य अधिकारियों द्वारा तमाम सबूत पेश करने के बाद भी अखबार ने अपना रवैया नहीं बदला, जो भी बड़ी शंका का विषय बन गया।

हालांकि, मंत्री रघु शर्मा के दावों की हकिकत उजागर करते हुये ‘राजस्थान पत्रिका’ अखबार ने सही खबरों को प्रमुखता दी, किंतु तमाम सबूत दिखाती ‘राजस्थान पत्रिका’ की तमाम खबरों के बावजूद भी डॉ. समित शर्मा का आखिर सरकार ने 27 जून 2019 को तबादला कर दिया।

बेहद चर्चित, किंतु पांच साल में एक तरह से मृत हो चुकी ‘फ्री दवा योजना’ में फिर से जान फूंकने का काम शुरू कर चुके डॉ. समित शर्मा को एनएचएम निदेशक के पद से हटाया गया, जिसके पीछे एकमात्र कारण हमारी पड़ताल में भी उनका स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा की आंखों में खटकना ही सामने आया है।

चर्चा तो यह भी है कि इस मामले में जातिवाद का संकुचित नजरिया भी एक कारण रहा है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मंत्री रघु शर्मा के बीच दलीय कलह भी एक वजह रही है। रघु शर्मा को उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट का करीबी माना जाता है, जो साफ तौर पर राजनीति में गहलोत के प्रतिद्वंदी हैं।

चर्चा है कि एक अधिकारी के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस के दो राजनेता अशोक गहलोत को आलाकमान की नजर में विफल मुख्यमंत्री साबित करना चाहते थे, किंतु अपने चहेते अधिकारी का ट्रांसफर कर गहलोत ने साबित कर दिया कि विरोधी चाहे कितने भी प्रयास कर लें, पर फिलहाल सियासी तौर पर उनका कोई सानी नहीं हैं।

राजनीतिक प्रतिद्वंदिता, नेताओं का आपसी स्वार्थ, एक दूसरे से आगे निकलने की भावना और ब्यूरोक्रेसी में साथी अधिकारी को पीछे छोड़ने के लालच ने एक ‘सुपर एक्टिव’ अधिकारी को उस योजना से दूर कर दिया, ​जिससे राज्य और आसपास के प्रदेशों के 65 करोड़ मरीज लाभांवित हो चुके हैं और उसकी सफलता पर सरकार की पूरे विश्व में वाहवाही हो चुकी है।