satish punia ashok gehlot
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रामगोपाल जाट
राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की निकाय चुनाव में हुई हार को लेकर तरह—तरह के सवाल उठने लगे हैं। प्रदेश की 49 लोकल बॉडीज के लिये हुये इलेक्शन में भाजपा को केवल 6 जगह पर बहुमत मिला है, जबकि कांग्रेस को सबसे अधिक 26 जगह पर बोर्ड बनाने का अवसर प्राप्त हो सकता है। अन्य सभी ​स्थानों पर निर्दलीयों का दबदबा है, जबकि ब्यावर में शुक्रवार को 9 निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा को समर्थन दे दिया है।

भाजपा ने कुल 49 में से 48 जगह पर अध्यक्ष पद के ​लिये अपने उम्मीदवार उतारे हैं, ज​बकि एक जगह पर निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन देने का फैसला किया है। यहां पर देखने वाली बात यह है कि 2091 वार्डों में हुये चुनाव के बाद 26 नवंबर को अध्यक्ष और 27 नवंबर को उपाध्यक्ष के लिये, जहां आवश्यक हुआ, वहां पर होने वाली वोटिंग में भाजपा—कांग्रेस में कौन बाजी मारता है।

कांग्रेस ने 961 उम्मीदवार जिताये हैं, जबकि भाजपा के 737 प्रत्याशी जीतने में कामयाब रहे हैं। निर्दलीय उम्मीदवार भी 386 जगह पर जीतने में सफल रहे। जहां पर निर्दलियों का दबदबा है, वहां पर भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही बोर्ड बनाने का दावा कर रही हैं। इस बीच बाड़ेबंदी ने बिना दल वाले पार्षदों की बल्ले बल्ले कर दी है।

चर्चा है कि निर्दलीय पार्षद अपना मत देने को लेकर 30—30 लाख रुपये तक की डिमांड कर रहे हैं। इस बात को खुलकर स्वीकारते हुये भाजपा के एक पूर्व जिलाध्यक्ष कहते हैं कि, ‘ऐसी स्थिति में केवल कांग्रेस ही पार्षदों को अपने पाले में ले सकती है, क्योंकि बोर्ड बनने के बाद सरकार के साथ सामांजस्य बिठाकर इतने पैसे कमाने का काम कांग्रेस समर्थित ही कर सकते हैं।’

इस बीच पूर्व विधानसभाध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने केंद्रीय नेतृत्व को सोचने की हिदायत देकर सियासत को चकित कर दिया है। मेघवाल ने कहा है कि प्रदेश में पार्टी की हालत के बारे में आलाकमान को सोचना चाहिये। जाहिर सी बात है कि दो माह पहले अध्यक्ष बनाये गये डॉ. सतीश पूनियां के नेतृत्व पर ही मेघवाल ने सवाल उठाया है, जबकि उनको काम करके अपनी क्षमता दिखाने का अवसर तो मिला ही नहीं।

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, उनके करीबी राजेंद्र राठौड़, यूनुस खान समेत कई भाजपाई पर्दे के पीछे और पर्दे के सामने से डॉ. पूनियां पर हमलावर हो चुके हैं। निकाय चुनाव परिणाम के बाद ही वसुंधरा राजे भी फिर से एक्टिव हो गईं हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार भाजपा कार्यालय में कदम रखकर भाजपा की सियासत को चर्चित कर दिया है।

सर्वविदित है कि वसुंधरा राजे और डॉ. पूनियां के बीच सियासी खटास की बात हर भाजपाई की जुबान पर है। बीते 17 साल में वसुंधरा राजे ने डॉ. सतीश पूनियां को पार्टी में किसी भी तरह से आगे आने से रोकने का हर संभव प्रयास किया है। करीब 37 साल पुराने भाजपाई को नेपथ्य में रहने का कारण भी सर्वाधिक यही जान पड़ता है।

हालांकि, अध्यक्ष बनने से लेकर अब तक डॉ. पूनियां ने इस तरह की सभी बातों को सिरे से खारिज किया है जो उनके रिश्ते खराब करने का काम करती हैं। इतना ही नहीं, डॉत्र पूनियां ने मौके—बेमौके वसुंधरा राजे सरकार की तारीफ भी की है। बीते दिनों उन्होंने वसुंधरा राजे से उनके आवास पर मुलाकात कर संबंधों को नये सिरे से शुरु करने का प्रयास ​भी किया था, लेकिन अभी के हालात में ऐसा नजर नहीं आ रहा है।

निकाय चुनाव में हार के कारणों की बात करें तो यह काफी विस्तृत विचार करने का विषय है। फिर भी हम यहां पर भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत की चर्चा पॉइंट्स के माध्यम से करेंगे।

पहला कारण:
निकाय चुनाव में भाजपा की उम्मीद के मुताबिक जीत नहीं मिलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य में अभी सत्ता कांग्रेस की है। राजस्थान में यह ट्रेंड हमेशा रहा है कि जिस दल की सत्ता होती है, वही दल निकाय चुनाव में बढ़त बनाने में कामयाब रहता है।

यदि इसको हम भाजपा की हार कहने के बजाए कांग्रेस की जीत नहीं हुई है, कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि कांग्रेस भी महज 26 जगह ही बोर्ड बनाने की स्थिति में नजर आ रही है, जो कि कुल सीटों का करीब 50 फीसदी के आसपास ही होता है।

इसके अलावा करीब 25 प्रतिशत जगहों पर निर्दलीयों का कब्जा हो रहा है। यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि स्पष्ट तौर पर तो कांग्रेस को भी जनता ने नहीं चुना है। हालांकि, कांग्रेस में हमेशा की तरह अभी भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच जीत का श्रेय लेने की होड़ चल रही है।

दूसरा कारण:
कहा जाता है कि, ‘जितना छोटा चुनाव होता है, वहां उतनी ही बड़ी राजनीति होती है’ और ऐसे में उम्मीदवार का चेहरा सबसे अधिक मायने रखता है। तो लोकल चुनाव में इसे किसी भी दल की हार या जीत कहना उचित नहीं होगा। हां, यह जरुर है कि प्रत्याशी का चयन पार्टियां अधिक सोचकर समझकर करती, तो शायद परिणाम कुछ अलग होते।

उम्मीदवारों का चयन करने में भाजपा जरुर मात खाती हुई नजर आ रही है। कांग्रेस ने अपने विधायकों और प्रभारी मंत्रियों के साथ जिलाध्यक्षों की बात को अधिक तवज्जो दी, जिसमें भाजपा कामयाब नहीं हो सकी। बताया जाता है कि भाजपा ने अपने विधायकों और पूर्व विधायकों की राय को अधिक तहरीज ही नहीं दी।

तीसरा कारण:
सत्ता के करीब हर कोई रहना चाहता है। जनता को भी पता है कि आज की तारीख में सत्ता कांग्रेस की है, तो जो उम्मीदवार सत्ताधारी दल का होगा, उसका ही कार्य अधिक आसानी से होगा। यही कारण है कि जनता ने स्थानीय प्रत्याशी के साथ कांग्रेस उम्मीदवार का चयन किया।

चौथा कारण:
भाजपा का स्थानीय मुद्दों तक नहीं पहुंच पाना भी बड़ा कारण माना जा रहा है। भाजपा ने लोकल इश्यूज के बजाए धारा 370 और राष्ट्रवाद को अधिक तवज्जो दी। यह मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी दल को लाभ दे सकते हैं, किंतु जब स्थानीय चुनाव की बात आती है तो स्थानीय मुद्दे ही फायदा कर सकते हैं।

इस मामले में भाजपा पिछड़ गई। स्थानीय विधायकों, सांसदों, जिलाध्यक्षों और उम्मीदवारों के साथ अन्य पदाधिकारियों ने स्थानीय मुद्दों को साइड में कर राष्ट्रीय मुद्दों को अधिक हवा दी और उनके भरोसे रहे। पदाधिकारियों को यह मान लेना चाहिये कि भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर हर जगह वोट नहीं ले सकती है। स्थानीय चुनाव में उसको लोकल मुद्दों पर ही फोकस रखना होगा।

पांचवा कारण:
पार्टी में बिखराव, गुटबाजी, असहयोग की भावना ने भी काफी नुकसान किया है। आज की तारीख में भाजपाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां को कमजोर करने के लिये वसुंधरा राजे गुट हर तरफ से जुटा हुआ है। हर हाल में विरोधी गुट डॉ. पूनियां को असफल करार देने की कोशिशें कर रहा है।

सियासत में चर्चा स्पष्ट है कि डॉ. पूनियां और राजे के बीच रिश्ते अभी बिलकुल वैसे ही हैं, जैसे 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले ओम माथुर और वसुंधरा राजे के रिश्ते थे। तब भी पार्टी की फूट ने 96 सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस को शासन सौंप दिया था।

दोनों नेताओं के बीच खींचतान के चलते स्थानीय स्तर पर भी पार्टी दो धड़ों में बंटकर काम कर रही है। बताया तो यहां तक जाता है कि वसुंधरा गुट ने निकाय चुनाव में पूरी तरह से असहयोग की भावना से काम किया है। इसमें कई पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक भी शामिल बताये जाते हैं।

असहयोग की यह भावना अब कैलाश मेघवाल जैसे नेताओं के बयानों से पूरी तरह से सामने आ चुकी है। इस बीच राजेंद्र राठौड़, यूनुस खान, अशोक परनामी, अरुण चतुर्वेदी जैसे नेताओं पर भी खूब आरोप लग रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने दल के लिये काम करके दिखाया है।

छठा कारण:
प्रशासनिक सहयोग ने कांग्रेस की जीत की नींव रखी है। इसमें कोई दोहराय नहीं कि सत्ता के चलते प्रशासन ने भी कांग्रेस के पक्ष में काम किया है। इस बात को खुद भाजपाध्यक्ष डॉ. पूनियां ने पहले ही स्वीकार कर लिया था कि निकाय चुनाव में लाभ उसी दल को मिलता है, जिसकी सत्ता होती है।

सातवां कारण:
मंत्रियों के पद खोने के ड़र ने उनको अधिक ताकत के साथ काम करने के लिये मजबूर किया है। बताया जाता है कि खुद सीएम गहलोत ने सभी मंत्रियों को जिलों का प्रभार सौंपने के साथ ही यह भी संकेत दे दिया था कि जिसके इलाके में पार्टी को हार मिलेगी, उसकी मंत्रीमंड़ल विस्तार में छुट्टी होनी तय है।

इस ड़र का ही परिणाम था कि सभी मंत्रियों ने राजधानी छोड़कर अपने अपने जिलों में ड़ेरा डाल दिया था। कई मंत्री करीब एक पखवाड़े तक जयपुर नहीं पहुंचे। उन्होंने जी—जान से कांग्रेस के स्थानीय उम्मीदवारों को जिताने के लिये दिनरात एक करके काम किया। यह भावना भाजपा में नहीं दिखी।