जीती बाजी हार गए हम…किस्मत ही कुछ ऐसी थी….

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जयपुर।

बॉलीवुड की एक हिंदी फिल्म में गाना था, “जीती बाजी हार गए हम किस्मत ही कुछ ऐसी थी”…… । उसी गाने की तर्ज़ पर कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव के परिणाम हो सकते हैं।

बीते एक सप्ताह की उठापटक के बाद कांग्रेस के समीकरण बिगड़ते नज़र आ रहे हैं। सियासी जानकारों की मानें तो डूडी-स्पर्धा, स्पर्धा-पायलट, कल्ला-झंवर, गहलोत-अविनाश गहलोत…जैसे कुछ ऐसे विवाद हैं, जो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

यह तो चुनाव का परिणाम ही बताएगा कि नई नवेली पार्टी के साथ मैदान में उतरे हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी बीजेपी-कांग्रेस के लिए कितने विध्वंसक होंगे, लेकिन जिस तरह से सत्ता की ट्रैन एक बार फिर बीजेपी के तरफ़ मुड़ती नज़र आ रही है, उसके लिए भाजपाई कम और कांग्रेसी ज्यादा जिम्मेदार हैं।

सबसे पहले देरी से उम्मीदवारों की घोषणा। उसमें भी तय होने से पहले ही नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के द्वारा कथित तौर पर स्पर्धा चौधरी और सोनाक्षी वशिष्ठ का पक्ष लेकर सचिन पायलट की खिलाफत करना कांग्रेस के लिए नकारात्मकता लाने में कामयाब हुआ।

जिस बात का भाजपाई इंतज़ार कर रहे थे, उसी के अनुरूप काम को अंजाम देते हुए कांग्रेस पार्टी ने जबरदस्त उत्सुकता के बावज़ूद अपने उम्मीदवारों की पहली सूची हुई जारी नहीं की।

जब भारतीय जनता पार्टी अपनी पहली सूची के बाद दूसरी लिस्ट जारी करने को तैयार थी, तब कांग्रेस पार्टी ने देर रात 152 उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन जैसी ही लिस्ट आई वैसे ही पार्टी अपने द्वारा किए गए वादे और सिद्धांतों से भटक गई।

कांग्रेस पार्टी की दूसरी सूची में भी इस वर्धा चौधरी के नाम नहीं होने के बाद उन्होंने हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी जॉइन कर ली और फुलेरा से टिकट ले लिया।

इधर, दूसरी सूची में बीकानेर वेस्ट से पूर्व अध्यक्ष बीडी कल्ला की जगह कन्हैया लाल झंवर को टिकट दिए जाने के बाद बीकानेर की सियासत में उबाल आ गया। हालात ट्रेन की पटरी उखाड़ने तक पहुंच गए।

बीकानेर में बढ़ता विरोध दिल्ली तक जा पहुंचा और तीसरी लिस्ट में कन्हैया लाल झंवर का का टिकट काटकर निकलना को टिकट दे दिया गया। इसके साथ ही रामेश्वर लाल डूडी ने कन्हैया लाल झंवर के साथ खड़े होकर खुद भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया।

नेता प्रतिपक्ष द्वारा विधानसभा चुनाव लड़ने से इंकार करने पर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने एक बार फिर से अपना फैसला बदला और बीकानेर ईस्ट से अविनाश गहलोत का टिकट काटकर कन्हैया लाल झंवर को दे दिया।

उधर, हाल ही में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए बाड़मेर के राजपूत नेता मानवेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जैसे मजबूत कैंडिडेट के सामने उतारकर पार्टी ने सियासत में हलचल पैदा कर दी।

पार्टी के सामने मुश्किल तब खड़ी हो गई, जब प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के सामने भारतीय जनता पार्टी ने पीडब्ल्यूडी मंत्री यूनुस खान को टोंक से टिकट देकर मैदान में उतारा। सचिन पायलट और यूनुस खान ने आज अपने नामांकन पत्र भी दाखिल कर दिए।

कांग्रेस पार्टी ने चार सूचियां जारी करने से पहले किसी के साथ गठबंधन नहीं करने का दावा करने वाली पार्टी ने प्रदेश की 5 सीटों पर राष्ट्रीय लोक दल और दूसरी दो पार्टियों के साथ गठबंधन करके सीटें उनको दे दी।

अंत में आई दो सूचियों के बाद कांग्रेस पार्टी में ऐसा बवाल मचा कि जो पार्टी टिकट वितरण से पहले भारतीय जनता पार्टी पर भारी पड़ती नजर आ रही थी, वह काफी कमजोर और दरों में बैठी हुई दिखने लगी है।

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय संगठन महामंत्री अशोक गहलोत, नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर लाल डूडी और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच सियासी दूरियां इतनी बढ़ गई हैं, कि विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में एक साथ उतरना भी उनके लिए मुश्किल नजर आ रहा है।

रही सही कसर कांग्रेस के बीकानेर वेस्ट से उम्मीदवार बीडी कल्ला द्वारा आयोजित भीड़ में उन्ही के द्वारा भारत माता की जय बोलने से रोककर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के जयकारे लगवाने वाले वीडियो के वायरल होने पर पूरी हो गई।

एक तरफ भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को आगे कर उनके नेतृत्व में पूरी तरह एकजुट नजर आ रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस में तीन-चार धड़े बन चुके हैं, जिसके चलते पार्टी में एक राय होना भी कठिन हो गया है।

अब तक सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ बनी एंटी इनकंबेंसी के दम पर कांग्रेस पार्टी बीजेपी से बढ़त बनाने का दावा कर रही थी, लेकिन 7 दिसंबर को होने वाले मतदान के बाद 11 दिसंबर को आने वाले परिणाम में यह एंटी इनकंबेंसी बीजेपी के लिए घातक साबित होती है, या टुकड़ों में बंटी कांग्रेसी के लिए मुश्किलें लेकर आती है?

वैसे तो राजस्थान विधानसभा में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला बनता नजर आ रहा है। पहली बार मैदान में उतरी हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी काफी टिकट बांट चुकी है। उनके द्वारा वहीं पर उम्मीदवार उतारे गए हैं, जहां पर बेनीवाल का काफी प्रभाव है।

ऐसे में अब यह देखना भी दिलचस्प होगा, कि मुकाबला हमेशा की तरह भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच होता है या फिर हनुमान बेनीवाल की पार्टी दोनों ही प्रमुख पार्टियों में से किसी की दल की सरकार बनाने में अहम भूमिका अदा करती है?