आयुर्वेद में चिकित्सा मूलतः युक्ति-व्यपाश्रय पर आधारित है, परन्तु संहिताओं में प्रमाण-आधारित चिकित्सा के साथ ही दैव-व्यपाश्रय व सत्त्वावजय भी वर्णित की गयी हैं। आज की चर्चा इन्हें दोनों पद्धतियों पर है|

आधुनिक वैज्ञानिक शोध के प्रकाश में यह जानना आवश्यक है कि समकालीन आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में दैव-व्यपाश्रय और सत्त्वावजय का कोई उपयोग है या ये अब केवल अकादमिक चर्चा का विषय ही हैं|

इसका उत्तर कई प्रकार से जाना जा सकता है। एक बहु-स्वीकार्य और सरल रास्ता यह जानना हो सकता है कि दैव-व्यपाश्रय व सत्त्वावजय में सम्मिलित विविध उपायों या उनसे मिलते-जुलते बिन्दुओं पर आधुनिक विज्ञान में क्या कोई शोध उपलब्ध है और यदि है तो उसके निष्कर्ष क्या हैं|

व्यापक चिकित्सकीय सन्दर्भों में युक्ति-व्यापाश्रय का अर्थ औषधि एवं आहार द्रव्यों के साथ-साथ जीवन-शैली, पंचकर्म आदि की प्रमाण-आधारित योजना व क्रियान्वयन है।

दैव-व्यपाश्रय का अर्थ अदृष्ट, अद्रव्य या आध्यात्मिक चिकित्सा, तथा सत्त्वावजय का अर्थ सत्य-आधारित आत्म-नियंत्रण या मन को नियंत्रित कर जय प्राप्त करना है।

दैव-व्यपाश्रय चिकित्सा में मंत्र, औषध व मणि धारण करना, मंगलकारी कार्य, त्याग, उपहार, हवन, नियम-पालन, प्रायश्चित, उपवास, कल्याणकारी विचारों को सुनना, प्रणिधान (वरिष्ठ के प्रति निष्कपट एवं पूर्ण सम्मान) तथा तीर्थाटन-पर्यटन आदि शामिल हैं।

सत्त्वावजय में आत्म-नियंत्रण के द्वारा अहितकारी विषयों से मन को हटाना है (च.सू.11.54)। चरकसंहिता (च.वि. 8.87) में प्रदत्त द्रव्य-अद्रव्य के वर्गीकरण के प्रकाश में सत्त्वावजय और दैव-व्यपाश्रय को प्रायः परस्पर अंतर्निहित मान लिया जाता है।

निदान-परिवर्जन सिद्धांत स्पष्ट करता है कि (सु.उ. 1.25): सङ्क्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम्। अर्थात रोग का कारण समाप्त करना ही चिकित्सा है।

इस सूत्र के प्रकाश में देखें तो सत्त्वावजय और दैव व्यपाश्रय चिकित्सा में निर्दिष्ट उपायों का पालन करना वस्तुतः उन कारणों का निदान-परिवर्जन है जो, आयुर्वेद के अनुसार, रोगोत्पत्ति की जड़ हैं (च.शा. 1.102): धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेsशुभम्।

प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।। तात्पर्य यह कि धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं।

इन कुकर्मों को ‘प्रज्ञापराध’ कहा जाता है। आधुनिक अपराध-विज्ञान का निष्कर्ष भी यही है कि अपराध पहले माथे में होता है। यही सब रोगों की जड़ भी है|

हालाँकि प्रज्ञापराध रोग-जनन का एकल कारक नहीं, बल्कि असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग तथा परिणाम भी रोग-कारक हैं। तथापि, प्रज्ञापराध को सर्वदोषप्रकोपक कहा गया है, क्योंकि रोगजनन के अन्य दो कारक मूलतः प्रज्ञापराध पर निर्भर करते हैं।

हालाँकि योग एवं आयुर्वेद के ध्येय भिन्न हैं, किन्तु दोनों के तत्त्वाधार व विधियाँ युक्ति-युक्तता में चिकित्सकीय-दख़ल की सीमा तक तो समान ही हैं।

योग का ध्येय आध्यात्मिक उत्कर्ष होते हुये भी यौगिक सिद्धियों की प्राप्ति में औषधियों के महत्व को महर्षि पतञ्जलि कैवल्यपाद में नहीं भूले: जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः (यो.सू. 4.1)। आयुर्वेद का ध्येय आरोग्य होते हुये भी महर्षि चरक इस बात को नहीं भूले कि योग मोक्ष का प्रवर्तक है: योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम्।

मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः।। (च.शा. 1.137)। ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति, और समाधि के माध्यम से योग का चिकित्सार्थ महत्त्व होने का सबसे मज़बूत प्रमाण महर्षि चरक ने चरकसंहिता के प्रारम्भ में ही दे दिया है (च.सू. 1.58): प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः। मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः।। शारीरिक दोष दैव-व्यपाश्रय व युक्ति व्यपाश्रय से शांत हो जाते हैं|

मानसिक दोष ज्ञान (आत्म-ज्ञान), विज्ञान (यथार्थ ज्ञान), धैर्य (चित्त की स्थिरता), स्मृति (अनुभूत का स्मरण), व समाधि (विषयों से मन हटाकर आत्मस्थ होना) से शांत हो जाते हैं|

दैव-व्यपाश्रय के वे सभी उपाय भी योग के ही अंग हैं, जिनके द्वारा मन पर चिकित्सार्थ नियंत्रण किया जाता है।

सत्त्वावजय और योग दोनों ही अद्रव्य मन व अद्रव्य चित्त-वृत्ति के नियंत्रण के खेल हैं: सत्त्वावजयः पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनोनिग्रहः (च.सू.11.54); योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (प.यो.सू.1.2); यथाभिमतध्यानाद् वा (प.यो.सू.1.39)। आचार्य पतञ्जलि द्वारा निर्दिष्ट योग और आचार्य चरक द्वारा निर्दिष्ट सत्त्वावजय के मध्य आरोग्य प्राप्ति के उद्देश्य तक तो साम्य है।

अतः योग पर हुई वैज्ञानिक शोध, भले ही सत्त्वावजय का नाम लेकर न की गयी हो, सत्त्वावजय पर यथावत लागू है।

अब हमें आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों के प्रकाश में दैव-व्यपाश्रय एवं सत्त्वावजय चिकित्सा के प्रमाण देखना आवश्यक है।

शोध-पत्रिकाओं में वर्ष 2019 तक प्रकाशित लगभग सवा लाख शोधपत्र ऐसे हैं जहाँ मंत्र, मणि, मंगलकार्य, त्याग, उपहार, हवन, नियम, प्रायश्चित, उपवास, सस्वर पाठ, आध्यात्मिक लगाव तथा तीर्थाटन आदि विषयों तथा इनका स्वास्थ्य रक्षण एवं रोगमुक्ति के संदर्भ में विश्लेषण है।

वास्तव में ये वही विषय हैं जिन्हें दैव-व्यपाश्रय के पृथक-पृथक उपाय के रूप में माना गया है। इनमें से यदि केवल ऐसे शोधपत्र देखे जायें जिनके शीर्षक में उपरोक्त शब्द मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में लिये गये हैं, तब भी 5000 शोधपत्र ऐसे हैं, जिनमें इन विषयों का गहन विश्लेषण है।

योग और आयुर्वेद के सम्बन्ध में पूर्वोक्त तथ्यों के कारण योग पर वर्ष 2019 तक प्रकाशित 16000 से अधिक शोधपत्र देखना भी आवश्यक है।

साथ ही बृहदारण्यकोपनिषत् (5.5.2) के प्रकाश में दम (आत्म-नियंत्रण), दान (दान, उपहार, गिफ्ट आदि), दया (सद्भावना, स्नेह, कल्याणार्थ परोपकार आदि) का स्वास्थ्य पर प्रभाव देखने के लिये हुई शोध को भी देखना होगा।

एक रोचक बात यह है कि योग की कैवल्योन्मुखता पर कोई शोध नहीं है। परन्तु स्वास्थ्योन्मुख योग, जिसे आयुर्वेद की कायचिकित्सा के सन्दर्भ में सत्त्वावजय के तुल्य माना जा सकता है, में शोध के परिणामों से ज्ञात होता है कि आसन, प्राणायाम और ध्यान मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।

योगिक क्रियाओं से कॉर्टीसाल में कमी, रक्तशर्करा में कमी, सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप में कमी, हृदय स्वास्थ्य में बढ़ावा, उच्च रक्तचाप में कमी, कॉरोनरी एन्थीरोसिस पर नियंत्रण, सीरम लिक्विड प्रोफाईल में सुधार, हृदय और श्वसन तंत्र की दक्षता में वृद्धि, मधुमेह में कमी, गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार, तनाव, चिन्ता और अवसाद में कमी, मूड में सुधार, और यहां तक की कैंसर से उबर रहे लोगों की जीवनी-शक्ति में भी सुधार के प्रमाण मिले हैं।

वयोवृद्ध लोगों में योग शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, एवं ओज में बेहतरी लाता है। युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में अध्ययनों के परिणाम यह बताते हैं कि ध्यान क्यूरेटिव एवं प्रिवेन्टिव मानसिक-स्वास्थ्य के लिये उपयोगी है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा योग पर आज तक हुई शोध के सांखिकीय विश्लेषण के आधार पर वर्ष 2016 में प्रकाशित सिस्टेमेटिक-रिव्यू एवं रेण्डमाइज कन्ट्रोल्ड क्लीनिकल ट्रायल्स की मेटा-एनेलिसिस के निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि योग करने वाले व्यक्तियों में बॉडीमॉस इन्डेक्स, सिस्टोलिक ब्लडप्रेशर, लो-डेंसिटीलिपोप्रोटीन कोलस्ट्राल व हाईडेंसिटीलिपोप्रोटीन कोलस्ट्राल के मानकों में सुधार होता है।

इसके साथ ही शरीर के वजन पर डायस्टोलिक ब्लडप्रेशर टोटल कोलस्ट्राल ट्राइग्लिसराइड्स, व हृदय गति के मानकों में भी सुधार होता है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि योग

कार्डियो-मेटाबोलिक स्वास्थ्य को बेहतर करता है। विश्व के इन तमाम प्रमाणों को समाहित करते हुये यह निर्विवाद और सुस्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि योग मानव स्वास्थ्य में बेहतरी लाता है।

क्षमा, कृतज्ञता, स्नेह, प्रसन्नता, संतोष, श्रद्धा, विश्वास आदि पर बड़ी संख्या में शोधकर्ताओं ने पाया है कि ये सब शरीर के जैविक प्रतिरोध तंत्र को मजबत कर प्रतिरोधक क्षमता या व्याधि-क्षमता में सुधार करते हैं। वस्तुतः चरक द्वारा दिया गया अचार रसायन यही कार्य करता है।

चिकित्सा के सन्दर्भ में इस चर्चा के क्या अर्थ हैं? निष्कर्ष यह है कि युक्ति-व्यपाश्रय, दैव-व्यपाश्रय व सत्त्वावजय का समकालीन आयुर्वेद चिकित्सा में समन्वित प्रयोग विज्ञान-सम्मत है।

इस बात के प्रमाण शोध में उपलब्ध हैं कि जहाँ युक्ति-व्यपाश्रयी चिकित्सा के साथ दैव-व्यपाश्रयी उपायों को मानसिक और शारीरिक रोगों की सह-चिकित्सा के रूप में शामिल किया गया है, वहाँ रोग-शमन की गति में बेहतरी पायी है।

समकालीन समाज में अद्रव्य-अदृश्य, और विज्ञान की दृष्टि में अभी तक प्रायः अज्ञात कारकों से निरंतर बढ़ रही बीमारियों के उपचार में केवल गोलियाँ खिलाना समाधान नहीं है। समकालीन चिकित्सा में सत्त्वावजय का महत्वपूर्ण स्थान है।

ग्लोबल इकोनोमिक फोरम के लिये किये गये एक प्रसिद्ध अध्ययन का अनुमान है कि केवल मानसिक विकृतियों के कारण आर्थिक उत्पादन में कमी का 20 वर्षों में संचयी वैश्विक प्रभाव 16 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है, जो वैश्विक जीडीपी के 25 प्रतिशत के बराबर है।

अतः युक्ति-व्यपाश्रय, दैव-व्यपाश्रय व सत्त्वावजय का समकालीन आयुर्वेद चिकित्सा में समन्वित उपयोग मानवता के लिये कल्याणकारी हो सकता है।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)