ये हैं वो बीमारियां, जिन्होंने भारत के नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है-

118
- नेशनल दुनिया पर विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें 9828999333-
dr. rajvendra chaudhary jaipur-hospital

जयपुर।

जीवन और मृत्यु के मध्य आयुर्वेद के सात रक्षा कवचों को न सम्हालने की बड़ी कीमत चुकानी पद रही है| स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा के सिद्धान्त का प्रतिपादक और आयुर्वेद का जन्मदाता भारत अब दुनिया का सबसे बीमार देश कहा जाने लगा है।

हम आज़ादी के बाद से ही स्वास्थ्य बजट का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा आधुनिक चिकित्सा पद्धति में ढोलते आ रहे हैं। लेकिन देश के स्वास्थ्य आंकड़े आयुर्वेद की उपेक्षा का दुष्परिणाम नहीं छुपा पा रहे हैं।

कैंसर, डायबिटीज, हृदयरोग, श्वसनतंत्र के रोग, गुर्दे के रोग, यकृत के रोग, तमाम तरह के गैर-संचारी और संचारी रोग, शिशु-मृत्यु दर, यहाँ तक मानसिक रोगों के कारण आत्महत्या आदि में से किसी भी समस्या से सम्बंधित आँकड़े उठा कर देखिये तो सब भारत में स्वास्थ्य की दयनीय स्थिति की कहानी कहते हैं।

आइये कुछ आंकड़े देख लेते हैं। तथाकथित आधुनिक चिकित्सा पद्धति को लम्बे समय से स्वास्थ्य बजट का 97 प्रतिशत देने के बावजूद 195 देशों के बीच स्वास्थ्य संबंधी सतत विकास लक्ष्य में भारत का 145वां स्थान है।

यह आयुर्वेद की उपेक्षा का दुष्परिणाम है। वर्ष 2018 में भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित साझा शोध के अनुसार वर्ष 1990 से 2016 के मध्य के 26 वर्षों में भारत में हृदय रोग से होने वाली मौतों में 34 प्रतिशत बढ़त हुई है, जबकि अमेरिका में यह दर 40 प्रतिशत कम हुई है।

जर्नल ऑफ़ दि अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी (72.1:79-95, 2018) में प्रकाशित इस अध्ययन से ज्ञात होता है कि वर्ष 2016 में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में क्रमशः इन बीमारियों के कारण अनुमानित 62.5 और 12.7 मिलियन वर्ष का जीवनकाल नष्ट हुआ।

इनमें इस्चेमिक हार्ट डिजीज और स्ट्रोक 15 से 20 प्रतिशत मृत्यु के लिये जिम्मेवार हैं। भारत में प्रत्येक एक लाख जनसंख्या में 5,681 लोग कार्डियोवैस्कुलर बीमारी से पीड़ित हैं।

कुल संख्या के रूप में देखें तो भारत में 54.6 मिलियन लोग कार्डियोवैस्कुलर बीमारी से पीड़ित हैं, जो अमेरिका के 33.6 मिलियन लोगों की तुलना में 70 प्रतिशत ज्यादा है।

भारत में कुल होने वाली मृत्य की संख्या में से 60 प्रतिशत केवल गैर-संचारी रोगों के कारण है। देश के अस्पतालों में चिकित्सार्थ भर्ती होने वाले कुल मरीजों में 40 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों के होते हैं।

स्वाभाविक है कि इन बीमारियों की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था को वर्ष 2030 के पूर्व गैर-संचारी रोगों के कारण 4.58 लाख करोड़ डॉलर की हानि हो सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2015 के आँकड़ों के अनुसार समय-पूर्व मृत्यु के केवल 30 कारण ही 57.8 प्रतिशत मृत्यु एवं 41.2 प्रतिशत अशक्तता समायोजित जीवन वर्ष (डिसएबेलिटी एडजस्टेड लाईफ इयर्स) की हानि कर रहे हैं।

ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिसीजेज 2010 के अनुसार इस्चेमिक हार्ट फेलियर, मधुमेह, स्ट्रोक, और अस्थमा के सम्मिलित प्रभाव से होने वाली अकाल-मौतें भारत में 18 प्रतिशत जीवन-काल खा जाती हैं। यह आंकड़ा 1990 के आंकड़ों से दोगुना है।

हर वर्ष 58 लाख भारतीय दिल और फेफड़े के रोगों, स्ट्रोक, कैंसर और मधुमेह से मर जाते हैं। विश्व में मधुमेह के 42 करोड़ रोगी हैं। चीन के बाद भारत सर्वाधिक, 6.9 करोड़ से अधिक, मधुमेह रोगियों वाला देश होने के कारण मधुमेह की वैश्विक राजधानी कहा जाने लगा है।

लगभग 77 लाख लोग मधुमेह से पीड़ित होने की कगार पर हैं। दुनिया भर में डायबिटीज से सम्बंधित इलाज का खर्च ही 612 बिलियन डॉलर है।

मानसिक बीमारी का वैश्विक बोझ कुल 32.4 प्रतिशत इयर्स लिव्ड विद डिसेबिलिटी और कुल 13 प्रतिशत डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ इयर्स या विकलांगता-समायोजित जीवन-काल के बराबर है।

इनमें से एक तिहाई प्रकरण केवल चीन और भारत में हैं जो कि सभी विकसित देशों से अधिक हैं। पूरी दुनिया की तरह भारत में भी मानसिक रोगों का बोझ बढ़ता जा रहा है।

रोगों के मामले में भारत की स्थिति अन्य विकासशील देशों जैसी है जबकि चीन की स्थिति विकसित देशों के समान दिखती है। वर्ष 2013 से 2025 के बीच मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और मादक द्रव्यों के विकारों के बोझ में चीन में 10 प्रतिशत और भारत में 23 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।

आंकड़े यह भी स्पष्ट करते हैं कि मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और मादक पदार्थों के उपयोग से उत्पन्न विकारों के बोझ में 1990 से 2010 के बीच 41 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। तात्पर्य यह है कि अब विश्वभर में स्वास्थ्य के खाते नष्ट हो रहे हर 10 में एक साल मानसिक बीमारियों के खाते में आता है।

ग्लोबल इकोनोमिक फोरम के लिये किये गये एक अध्ययन का अनुमान है कि केवल मानसिक विकृतियों के कारण आर्थिक उत्पादन में कमी का 20 वर्षों में संचयी वैश्विक प्रभाव 16 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है, जो वैश्विक जीडीपी के 25% के बराबर है।

ध्यान दीजिये, इन आंकड़ों में इन बीमारियों से संबंधित मृत्यु दर या प्रभावित व्यक्तियों, उनकी देखभाल करने वालों और समाज पर मानसिक विकारों के कारण होने वाले सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम शामिल नहीं हैं।

भारत में शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं वाले लगभग 112 मिलियन बूढ़े लोग हैं। इनमें लगभग 3.7 मिलियन वृद्ध लोग डिमेंशिया से ग्रस्त हैं, 40 मिलियन लोगों को देखने की समस्या है, और सालाना 1.6 मिलियन वृद्ध लोगों को दिल का दौरा पड़ जाता है।

हर 3 में से 1 वृद्ध गठिया से, 3 में से 1 उच्च रक्तचाप से, 5 में से 1 मधुमेह, 5 में से 1 सुनने की समस्या और 4 में से 1 अवसाद से पीड़ित है। वृद्धावस्था में कैंसर के प्रकरण भी 10 गुना अधिक पाये जा रहे हैं।

वर्ष 2015 में डिमेंशिया के कारण की वैश्विक लागत 818 अरब डॉलर थी जो 2018 तक 1 ट्रिलियन डॉलर होने की संभावना है।

वैश्विक स्वास्थ्य-व्यय वर्ष 2014 में 9.21 ट्रिलियन डॉलर था, जो वर्ष 2040 में 24.24 ट्रिलियन डॉलर होने की संभावना है। इसमें अकेले मधुमेह ही 1.31 ट्रिलियन डॉलर यानी कुल वैश्विक जीडीपी का 1.8 प्रतिशत खा जाती है।

एलोपैथी के प्रति देश के नागरिकों का मोह इतना प्रबल है कि 70 प्रतिशत लोग तो प्राथमिक स्वास्थ्य के लिये भी अपनी गाँठ का धन खर्च करते हैं।

भारत में 74,000 घरों के 3,83,000 लोगों के बीच किये गये अध्ययन से पता चलता है कि कमाई का एक तिहाई हिस्सा दिल की बीमारी पर आउट-ऑफ़-पॉकेट ही खर्च हो जाता है।

एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक़ कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों, पुराने श्वसन रोग, कैंसर, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य के संबंध में अगले दो दशकों में 47 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर संचयी उत्पादन हानि हो सकती है।

यह नुकसान 2010 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 75 प्रतिशत या 63 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है। इतना पैसा तो यह आधी-शताब्दी से ज्यादा समय तक के लिये उन 2.5 बिलियन लोगों की गरीबी दूर करने के लिये पर्याप्त है जो मात्र दो डॉलर प्रतिदिन में अपना गुजारा करने को मज़बूर हैं।

दुनिया भर में डायबिटीज से सम्बंधित इलाज का खर्च ही 612 बिलियन डॉलर है। इसी प्रकार ग्लोबल इकोनोमिक फोरम के लिये किये गये एक प्रसिद्ध अध्ययन का अनुमान है कि केवल मानसिक विकृतियों के कारण आर्थिक उत्पादन में कमी का 20 वर्षों में संचयी वैश्विक प्रभाव 16 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है, जो वैश्विक जीडीपी के 25% के बराबर है।

असल में अपर्याप्त नींद या नींद व्यवधान से उत्पन्न होने वाले अनेक संज्ञानात्मक और मानसिक विकार आज विश्व भर की समस्या हैं। हमारे स्वास्थ्य, कार्यदक्षता, और सुरक्षा के सन्दर्भ में निद्रा-अवधि, निद्रा-काल और निद्रा-गुणवत्ता तीनों ही अति महत्वपूर्ण हैं।

दुनिया के 142 देशों के लिये उपलब्ध आंकड़े, जो दुनिया की 93.2 प्रतिशत आबादी के प्रतिनिधि-आंकड़े हैं, के आधार पर की गयी शोध से ज्ञात हुआ है कि शारीरिक निष्क्रियता के कारण होने वाली बीमारियों जैसे कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, टाइप-2 मधुमेह, स्तन कैंसर, पेट के कैंसर आदि के उपचार में लगने वाली सीधी लागत लगभग 53.8 बिलियन डॉलर है।

इसके अलावा, शारीरिक निष्क्रियता से होने वाली मौतों के कारण 13.7 बिलियन डॉलर उत्पादकता घटने की कीमत भी चुकानी पड़ती है।

वर्ष 2014 में 18 वर्ष या उससे ऊपर के 1.9 अरब, अर्थात 39 प्रतिशत लोगों का वजन अधिक था। इनमें से 60 करोड़ या 13 प्रतिशत से अधिक मोटापा-ग्रस्त थे।

वर्ष 2025 तक वैश्विक मोटापे का प्रसार पुरुषों में 18 प्रतिशत और महिलाओं में 21 प्रतिशत हो जाने की आशंका है। पुरुषों में गंभीर मोटापा 6 प्रतिशत और महिलाओं में 9 प्रतिशत तक जा सकता है।

वर्ष 2025 में दुनिया भर में 2.7 अरब वयस्क भारी-मोटापे से ग्रस्त हो जाने का अनुमान है। बच्चों के सन्दर्भ में आँकड़े बताते है कि वर्ष 2013 में 5 वर्ष से कम आयु के 420 लाख बच्चे अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त थे।

अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो दुनिया में अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त शिशुओं और बच्चों की संख्या वर्ष 2025 तक 700 लाख पहुँच सकती है।

अमेरिका और चीन के बाद भारत में मोटे और वजनी लोगों की तीसरी सबसे बड़ी संख्या है जो किशोरों का 11 प्रतिशत और सभी वयस्कों का 20 प्रतिशत है।

आधुनिक बायोमेडिकल शोध के सफल उदाहरणों में सर्जरी और टीकाकरण अवश्य हैं, पर असफलताओं की तुलना में ये इस कदर नाकाफ़ी बैठते हैं कि उनका वर्णन आप यहाँ आंकड़ों में देख ही रहे हैं।

एक सफल उदाहरण टीकाकरण से इम्युनिटी या रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास है। हालाँकि, अभी तक केवल चेचक ही ऐसा रोग है जिसे वैक्सीन का उपयोग कर समाप्त किया गया है।

तथापि, वैक्सीनेशन से कुल आर्थिक लाभ देखें तो अकेले यूनाइटेड स्टेट्स को ही 619 बिलियन डालर का लाभ बीमारियों को रोकने के रूप में हुआ है। यूनाइटेड स्टेट्स में 16 बीमारियों के विरूद्ध बच्चों के टीके लगाये जाने की सलाह दी जाती है।

इन बीमारियों में वहाँ 90 प्रतिशत कमी आई है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, निम्न एवं मध्यम आय वाले 94 देशों में 34 बिलियन डालर का निवेश टीकाकरण में किया गया।

परिणामस्वरूप उन देशों में इन 10 बीमारियों के घटने से 586 बिलियन डालर की बचत हुई। यदि पूरी अर्थव्यवस्था को हुये लाभ को देखें तो 1.53 ट्रिलियन डालर है।

असल में वैक्सीन का लाभ बाकी लोगों को भी मिलता है, क्योंकि ऐसे लोग जिन्हें वैक्सीन लगी होती है, स्वयं बीमारियाँ के वाहक नहीं रहते।

आंकड़े तो बहुत हैं पर ऊपर दिये गये तथ्य उस वास्तविकता की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिये पर्याप्त हैं कि स्वस्थ जीवनशैली जीने का उत्तरदायित्व सरकार का नहीं, हमारा स्वयं का है।

प्रायः लोगों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के लिये सरकार को उत्तरदायी ठहराया जाता है। लेकिन नागरिक होने के नाते स्वयं के उत्तरदायित्व को हम तब पूरी तरह भुला देते हैं, जब व्यक्तिगत स्वास्थ्य की निरंतरता के लिये आयुर्वेद के स्वास्थ्यवृत्त, सद्वृत्त आदि का पालन करने की बात आती है।

इस चर्चा का हमारे लिये व्यक्तिगत महत्त्व क्या है? पहली बात तो यह है कि भारत सहित दक्षिण एशिया में गैर-संचारी रोगों का प्रसार दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तुलना में सबसे अधिक है।

आयुर्वेदाचार्यों के सम्मुख अपनी रसायन थेरेपी और पंचकर्म की मदद से देश को इन बीमारियों के कलंक से मुक्त करने का एक बड़ा अवसर है।

जरा-व्याधि मुक्त स्वस्थ भारत का रास्ता आयुर्वेद से होकर जाता है। संचारी, गैर-संचारी, पर्यावरणीय या जलवायुवीय कारणों से उत्पन्न बीमारियों के इस विशालकाय बोझ को केवल औषधियों के भरोसे नीचे नहीं लाया जा सकता।

इससे निपटने के लिये जन-समुदाय की स्वदेशी जीवनशैली, जो वस्तुतः आयुर्वेदिक अवधारणाओं पर आधारित है, के आधार पर मजबूत प्रतिषेधात्मक रणनीति विकसित करने और बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

बीमारियों व स्वास्थ्य-जोखिमों के सामाजिक-पचड़े में बदलाव बड़ा मुश्किल है, लेकिन जीवनशैली विषयक कारकों जैसे आहार, आचार, विहार, और विचार में परिवर्तन संभव है।

प्रतिषेधात्मक स्वास्थ्य-देखभाल के लिये दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या जैसे स्वस्थ व्यवहार अपरिहार्य हैं। वस्तुतः हमें एक ऐसी रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है जो चिकित्सा के उपचारात्मक पहलुओं की बजाय स्वास्थ्य देखभाल के प्रतिषेधात्मक पहलुओं पर आधारित हो।

जैसे ऐलोपेथी के वैक्सीन मानव शरीर में रोगाणुओं के विरुद्ध इम्युनिटी या रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं, उसी प्रकार आयुर्वेद में आहार, विहार, रसायन, सद्वृत्त एवं स्वास्थ्यवृत्त भी समुचित प्रयोग और अभ्यास से गैर-संचारी रोगों के विरुद्ध शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

अतः यह एक बहुत ही उपयोगी समन्वय होगा यदि संचारी रोगों के लिये बायोमेडिकल साइन्स द्वारा विकसित टीकों से पारिवारिक स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करायें और साथ ही गैर-संचारी रोगों से बचने के लिये लोग आयुर्वेद के माध्यम से स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा में निवेश करें।

संदेश बिलकुल स्पष्ट है कि स्वास्थ्य-रक्षण के लिये समय, श्रम और धन का निवेश, बीमारी के उपचार से सदैव सस्ता होता है। भारत आयुर्वेद के बिना स्वस्थ नहीं रह सकता।

हमे स्वयं को स्वस्थ रखने का उत्तरदायित्व लेना होगा और उसके लिये आहार, रसायन, पंचकर्म, व्यायाम, योगासन, प्राणायाम एवं ध्यान आदि पर निवेश करना होगा। व्यक्तिगत स्वास्थ्य संभलने पर देश-दुनिया के स्वास्थ्य विषयक आँकड़े स्वयमेव सुधार जायेंगे।

आयुर्वेद आज ऐसे मोड़ पर है जहाँ भारत में बॉयो-मेडिकल पद्धतियों द्वारा संचारी व गैर-संचारी रोगों को रोक पाने में निरंतर और व्यापक असफलता के कारण सरकार और समाज को एक बार पुनः आयुर्वेद की ओर गंभीरतापूर्वक देखने का अवसर प्राप्त हुआ है।

अन्य शब्दों में कहें तो इस भारी असफलता के कारण सरकार और समाज एक बार पुनः आयुर्वेद की ओर देखने के लिये विवश हुये हैं।

आज की इस चर्चा का मूल उद्देश्य यही ध्यान दिलाना है कि यदि स्वस्थ व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की रक्षा, किसी बीमारी की चपेट में आने के पूर्व ही, व्यक्तिगत स्तर पर प्रारंभ कर दे तो परिवार, देश और विश्व के अनावश्यक वित्तीय भार में संतोषजनक कमी आने की प्रबल संभावना है।

वैयक्तिक स्वास्थ्य मानव की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूँजी है। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश एवं विश्व का आर्थिक विकास स्वस्थ नागरिकों पर निर्भर है।

इस पर वैश्विक परिदृश्य व भारत में स्वास्थ्य की स्थिति देखना उपयोगी रहेगा, क्योंकि हमारे व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर ही राष्ट्रीय और वैश्विक स्वास्थ्य निर्भर है। नागरिकों का स्वास्थ्य ही देश का स्वास्थ्य है। यह एक वृहद् विषय है, और इसे ख़ास और अगुआ बीमारियों के लिये वैश्विक और राष्ट्रीय आँकड़ों से मिलने वाले संदेश से समझा जा सकता है।

यथार्थतः इन प्रश्नों में स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु किये जाने वाले व्यक्तिगत और राष्ट्रीय निवेश का सन्देश मिल सकता है। इससे यह भी जानकारी मिल सकती है कि अस्वस्थता के कारण दुनिया कितने वित्तीय भार से जूझ रही है।

अनुमान यह भी है कि भारत में अस्पतालों के 40 प्रतिशत बिस्तर खाली हो जायेंगे यदि हम रसायन चिकित्सा व यथा-संभव आयुर्वेदोक्त जीवन शैली अपना लें।

दरअसल, प्रमाण-आधारित बात यह है कि देश के अस्पतालों में चिकित्सार्थ भर्ती होने वाले कुल मरीजों में 40 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों के होते हैं। यदि आयुर्वेद को पर्याप्त बजट देकर देश में रसायन चिकित्सा और आयुर्वेदोक्त जीवन शैली को प्रोत्साहित किया जाये तो गैर-संचारी रोगों से ग्रसित होने की दर गिरना सुनिश्चित है।

क्या हमारे पास अभी भी राष्ट्रीय, राज्य और परिवार के कुल स्वास्थ्य बजट का 50 प्रतिशत हिस्सा आयुर्वेद को न देने के लिये पर्याप्त कारण हैं? भारत को 2030 तक शीर्ष 25 देशों में लाने की केवल यही एक रणनीति है कि आयुर्वेद की प्रिवेंटिव और थेराप्युटिक विधाओं में गंभीर निवेश किया जाये।

एक मोटे अनुमान के अनुसार आयुर्वेद के रसायनों के माध्यम से स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करने पर भारत में कम से कम 200 बिलियन डॉलर सालाना का दवाई-खर्च बच सकता है।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं।)