कोरोना वायरस के बारे में क्या चीन खुलकर आंकड़े दिखा रहा है?

– पहले चीन की प्रवृत्ति होती थी गलतियां करने कमियां छुपाने की इस सोच में परिवर्तन का क्या है कारण?

क्या भारत को कोरोनावायरस को लेकर थोड़ा और ज्यादा चिंतित होना चाहिए। क्या सरकार को पूरी देश में अलर्ट घोषित कर देना चाहिए तथा व्यापक रूप से युद्ध स्तर पर गाइडलाइन तय करनी चाहिए। क्या इस दिशा में पहले से ही काफी कुछ किया जा रहा है या हमारे मन में आत्म संतुष्टि का भाव पैदा हो गया है।

जाहिर है कि इन प्रश्नों के उत्तर दो प्रकार के होते हैं। पहला चिंता मत करो, कुछ भी नहीं होगा सब कुछ नियंत्रण में है अकारण आतंकित नहीं होना चाहिए और दूसरा नहीं जागरूकता खतरनाक रूप से कम है। खतरे को बहुत हल्के रूप में लिया जा रहा है, महामारी नियंत्रण के उपायों का सोचने अभाव है, अफसोस करने से सुरक्षा करना बेहतर होता है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के नेतृत्व में आशावादी लोग कह रहे हैं कि स्थिति पर बहुत भारी किसी नजर रखी जा रही है, समुचित कदम उठाए जा रहे हैं, हर संभव खामी को दूर किया जा रहा है, सभी हवाई अड्डों तथा देश के अन्य प्रवेश बिंदुओं पर पड़ी स्क्रीनिंग की जा रही है, इसका विरोध करने वाली गाइडलाइन जारी की जा रही है।

आशावादी लोग यह भी कह रहे हैं कि चीन में कोरोना वायरस के फैलने का सर्वाधिक अपेक्षा फरवरी के अंतिम दिनों में अप्रैल के शुरुआती दिनों में ही की जा रही है। जो भी हो भारत में ग्रीष्म ऋतु का पदार्पण हमें पूरी तरह से सुरक्षित जोन में पहुंचा देगा। क्योंकि यह वायरस कम तापमान में ही फलता फूलता है।

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इसका जवाब दे रहा, यह बिल्कुल भी निश्चिंत नहीं है कि यह महामारी अपने चरम पर कब पहुंचती है। अगर आप अपनी भविष्यवाणियों को हर सप्ताह दोहराते रहे तथा कहें कि यह महामारी 1 या 2 सप्ताह में अपने चरम पर होगी तो आप पूर्ण रूप से सही नहीं होंगे, क्योंकि उस समय तक बहुत देर हो चुकी होगी।

निराशावादी लोग भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि सभी राज्य सरकारें इस दिशा में प्रभावी तरीके के उपाय कर रही है अथवा नहीं इस बात को लेकर संदेह है। भारत के पास इस बीमारी पर निगरानी रखने के लिए समुचित सा सामान है अथवा नहीं।

क्या प्रयोगशालाओं में इसकी जांच की पूरी सुविधाएं मौजूद हैं, क्या अस्पतालों के संक्रमण की रोकथाम तथा उस पर काबू करने की सुविधाएं तथा व्यवस्थाएं हैं। आम आदमी का इस बात को लेकर हैरान भी है और प्रशंसा भी कर रहा है कि चीन ने सिर्फ 10 दिन के अंदर वहान को 600000 वर्ग फीट से बड़ा आपातकालीन अस्पताल आखिर कैसे बना डाला?

यह संभव नहीं है कि भारत इस गति तथा दक्षता के साथ इतने स्वच्छता मानको वाला अस्पताल बना ले। भारत के मौजूदा अस्पताल मरीजों के खचाखच भरे हुए हैं तथा अत्यधिक संक्रमित नए मरीजों की बड़ी संख्या में अचानक आ जाने पर उन्हें संभालने के लिए सामान भी अस्पतालों के पास नहीं है।

आइसोलेशन वार्डस का अभाव है तथा संक्रमण निरोध की व्यवस्था में भी अनेक खामियां हैं। इस खतरे को लेकर आम जागरूकता नगण्य है। अधिकारियों ने जन सामान्य के लिए एहतियात बरतने संबंधी गाइडलाइन अंग्रेजी तथा स्थानीय भाषाओं में अभी तक जारी नहीं की है तथा देशव्यापी व्यापक निगरानी व्यवस्था कहीं अस्तित्व में नहीं है।

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इसका और भी ज्यादा निराशाजनक पहलू है की प्रयोगशाला में जांच की सुविधाएं पूरी तरह से अपर्याप्त तथा अविश्वसनीय है। पुणे की वायरोलॉजी प्रयोगशाला वायरस की जांच के लिए इस समय इकलौती सक्षम प्रयोगशाला है।

एक विशेषज्ञ के अनुसार वायरोलॉजिकल विशेषज्ञों से युक्त 150 डायग्नोस्टिक तथा रिसर्च प्रयोगशालाओं स्थापित करने का प्रस्ताव 2012 में रखा गया था, में से केवल 80 प्रयोगशाला में पूरी तरह से तैयार होने के आसपास मानी जा सकती है। यह संख्या 1.3 अरब लोगों वाले देश के लिए बहुत कम है।

चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ कहते हैं कि यद्यपि भारत में रेबीज और जैपनीज इंसेफेलाइटिस जैसे जूनोटिक रोग पर निगरानी के लिए सुव्यवस्थित व स्थापित कार्यक्रम है, लेकिन यह देश कोरोना जैसे नए वायरस के खतरे से निपटने के लिए तैयार नहीं है। जंगलों, प्रजनन केंद्रों और इंसानी समूह जो नए कोरोनावायरस के संभावित स्रोत हैं, में जूनोटिक पैथोजन्स के लिए कोई समग्र एपिडेमियोलॉजिकल सर्विलांस नहीं है।

इस बीच चीन के एक अखबार ग्लोबल टाइम्स, जिसे सरकारी मुखपत्र माना जाता है, में चिंता बढ़ाने वाली नई रिपोर्ट छपी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि रविवार को वह आन के 500 किलोमीटर दूर सेंट्रल चीन के हेनान प्रांत में कोरोनावायरस के दो नए के सामने आए हैं। नए केस बेहद संक्रामक है तथा इनमें संक्रमण का स्रोत पता नहीं लगा है।

अखबार का कहना है कि वुहाना में लोगों का अलग-थलग रखने की अवधि 14 दिन से बढ़ाकर 21 दिन कर दी गई है। दो में से एक मरीज जिसका नाम वू है, वहां से लौटने के 34 दिन बाद बीमार हुआ। संक्रमण का पता लगने के पहले दिन 3 न्यूक्लिक एसिड टेस्ट करने पड़ते हैं।

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जिस तरह से सरकारी अखबार में सारी जानकारी दी गई है, यह काफी चिंताजनक है रिपोर्ट कहती है कि मरीज दो पारिवारिक रात्रि भोज कार्यक्रमों में शामिल हुआ था और लगभग 10 लोगों के संपर्क में आया था, इसमें से दो में संक्रमण की पुष्टि हुई है तथा तीन अन्य संदिग्ध हैं।

हैनान के दूसरे मरीज का नाम निंग है, वह अपने ससुर जिनका नाम झांग से संपर्क में 94 दिन बाद बीमार हुआ। झांग मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए 1 हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे, झांग की देखभाल के लिए निंग 13 नवंबर से अस्पताल में रह रहा था, तथा 31 जनवरी झांग के निधन के बाद वापस लौटा था। वह तीन बार घर से बाहर गया, सुपर मार्केट में फार्मेसी जाने के लिए और फिर 14 फरवरी को अस्पताल में भर्ती हो गया।

प्रेक्षक असमंजस में है कि इतनी विस्तृत जानकारी क्यों दी जा रही है जबकि सामान्य परंपरा किसी नई बीमारी के फैलाने की गंभीरता को कम दिखाने की है लेकिन इसे एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि चीन ने अधिक पारदर्शी होने का फैसला किया है और वह राष्ट्रीय गर्व तथा आर्थिक लागत की वजह से घटकों के कारण कम जानकारी देने की प्रवृत्ति से उभर रहा है। यह एक संकेतक है कि कोरोनावायरस महामारी के बारे में जितना पहले सोचा गया था, यह उससे अधिक गंभीर और जटिल है। भारत के लिए यह झूठे अभियान को त्यागकर मिशन के रूप में बचाव अभियानों को शुरुआत करने के लिए जागृत होने का समय है।