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जयपुर।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल के द्वारा 29 अक्टूबर को चुनाव मैदान में उतरने से पहले एक भी सीट पर जीत का दावा नहीं किया जा रहा था, लेकिन जैसे ही भाजपा और कांग्रेस ने अपने अपने टिकट घोषित किए, वैसे ही बेनीवाल ने अपनी गणित बिठानी शुरू कर दी।

अंतत: आखिरी दिन से पहले तक बेनीवाल ने अपने 77 से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में उतार दिए। कुछ ने सिंबल लेकर भी नामांकन ही दाखिल नहीं किया, तो कईयों के बाद में पर्चे खारिज हो गए। आखिरी आरएलपी के 57 प्रत्याशी मैदान में बचे।

पार्टी ने अपने नेता के दम पर चुनाव में दम ठोका और प्रचार के अंतिम दिन तक आते—आते कई सीटों पर बेनीवाल ने अकेले के दम पर भाजपा—कांग्रेस के पीसने छुड़ा दिए। जहां भाजपा—कांग्रेस आज भी अपनी जीत का दावा नहीं कर पा रही है।

खासकर जयपुर की बगरू, दूदू, चाकसू, चौमू, विराटनगर के अलावा सीकर की नीम का थाना के अलावा सीकर, झुंझुनूं, नवलगढ़, नागौर की खींवसर, लाडनूं, जायल, बाड़मेर की बायतू, नोखा, जोधपुर की भोपालगढ़, अलवर की कठूमर समेत कुल 15 सीटों पर बेनीवाल के धुंआधार प्रचार के कारण भाजपा—कांग्रेस ने पानी मांग लिया।

हनुमान बेनीवाल ने अपने उम्मीदवारों को जहां गली—गली, गांव—गांव, कस्बों में जनसंपर्क में लगा दिया, वहीं खुद इन सीटों पर किराए के चोपर से ताबड़तोड़ रैलियां कर दोनों ही प्रमुख दलों के लिए चुनौती बन गए।

इस बीच उनपर कांग्रेस की पूर्ण नेत्री और नागौर की सांसद ज्योति मिर्धा ने ड्राइवर, दरियां उठाने वाला और जयकारे लगाने वाला कार्यकर्ता कहकर नागौर की सियासत को गर्मा दिया। आखिर चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बेनीवाल ने उनकी मानसिक स्थिति विक्रत होने का बयान देकर करारा जवाब दे दिया।

टिकट बंटवारे से पहले जहां बेनीवाल सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे थे, वहीं टिकट देने और नाम वापसी तक उनके केवल 57 उम्मीदवार मैदान में बचे। ऐसे में उन्होंने किसान मुख्यमंत्री का अपना दावा छोड़कर उनके सहयोग के बिना कोई सरकार नहीं बनने का दावा कर डाला।

एक ओर जहां भाजपा दुबारा सत्ता में लौटने के लिए जुटी रही, वहीं कांग्रेस ने एंटी इंकंबेंसी को सबसे बड़ा हथियार बनाने का प्रयास किया। उनके नेताओं की जुबान पर केवल भाजपा सरकार में सीएम वसुंधरा राजे के द्वारा लोगों से नहीं मिलने की बातें ही आरोप बन पाईं।

इधर, बेनीवाल ने दोनों पार्टियों को आड़े हाथों लेते हुए वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत की सांठगांठ बताकर प्रचारित किया। उन्होंने किसान, जवान और खेत—खलिहान पर ध्यान केंद्रित किया।

इसी का परिणाम रहा है कि महज एक माह से भी कम समय में उन्होंने करीब दो दर्जन सीटों पर एक अभियान बना दिया। अपनी पहले की रैलियों में लाखों की भीड़ जुटाने वाले बेनीवाल ने अपने दम पर गहलोत और वसुंधरा राजे से बड़ी रैलियां कर डाली।

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि बेनीवाल भले ही सत्ता में नहीं पहुंच रहे हों, लेकिन इतना तय है कि करीब दो दर्जन सीटों पर उन्होंने भाजपा—कांग्रेस के पसीने छुड़ा दिए हैं।

देखना यह होगा कि उनके कितने उम्मीदवार जीतकर आते हैं, और उनके बिना किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बनने देने का दावा कितना सच साबित हो पाता है? किंतु इस बीच कल मतदान होना है, और 11 तारीख को सभी 199 सीटों पर अगले पांच साल के लिए योद्धा तय होने हैं।

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