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राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक और नागौर से सांसद hanuman beniwal ने vasundhara raje से 10 साल पहले किये गये अपमान का बदला पूरा कर लिया।

आज हालात यह है कि हनुमान बेनीवाल भाजपा में नहीं होने के बाद भी शान से party office जाते हैं, लेकिन दो बार की प्रदेश में chief minister रहीं और भाजपा में करीब चार दशक बिता चुकीं वसुंधरा राजे ही bjp office नहीं आ पा रहीं हैं।

ऐसा नहीं है कि hanuman beniwal ने vasundhara raje का रास्ता रोक दिया है, बल्कि हालात ही इस कदर कर दिये हैं कि वह खुद अपनी ही party के office आने से कतरा रहीं हैं।

विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद vasundhara raje अधिकांश foran में ही रहीं हैं, लेकिन जब वह जयपुर में होती हैं, तब भी bjp headquarter जाने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं।

दरअसल, इसकी शुरुआत तब हुई थी, जब parliament election से पहले rashtriy loktantrik party और bjp के बीच alliance की इबादत लिखी गई थी।

सूत्रों का दावा है कि वसुंधरा राजे के लाख असहमत होने के बाद भी तत्कालीन प्रदेश चुनाव प्रभारी prakash javdekar ने हनुमान बेनीवाल के गृह जिले, नागौर parliament election की एकमात्र सीट छोड़कर दोनों के दलों के बीच alliance का रास्ता खोला।

हालांकि, vasundhara raje ने साफ कह दिया था कि hanuman beniwal के साथ गठबंधन नहीं किया जाये और भाजपा अपने दम पर parliament election लड़कर अपनी ताकत दिखायें।

लेकिन चार माह पहले, दिसंबर में ही वसुंधरा राजे के दम पर election लड़कर जोरदार हार का सामना कर चुकी पार्टी ने ex chief minister की सारी राय को दरकिनार कर दिया।

लोकसभा चुनाव के लिये जब मार्च माह के दौरान rlp और bjp में गठबंधन हुआ था, तब भी वसुंधरा राजे bjp office नहीं आईं।

अलबत्ता पार्टी कार्यालय पर प्रकाश जावडेकर, गुलाबचंद कटारिया, राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया जैसे प्रदेश के नेताओं ने हनुमान बेनीवाल का स्वागत कर गठबंधन की इबारत लिखने का काम किया था।

अपनी नाराजगी और hanuman beniwal के साथ पुरानी रंजिश के कारण ही वसुंधरा राजे ने इस alliance को कभी स्वीकार नहीं किया।

चुनाव के बाद सभी 25 सीटों पर bjp-rlp की जीत हुई और बेनीवाल के दावे के अनुसार congress को लोकसभा चुनाव के वक्त राजस्थान में एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई।

चुनाव के दौरान भी वसुंधरा राजे नागौर जैसे political गढ़ में प्रचार करने नहीं गईं।

हालांकि, उनके गुट से माने जाने वाले राजेंद्र राठौड़ ने जरूर पाला बदला और आलाकमान की नजरों में वसुंधरा राजे से अलग दिखाने के लिये हनुमान बेनीवाल की rally में उनकी शान में कसीदे गढे।

विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद कार्यालय से दूर हुईं वसुंधरा राज ने लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तो जैसे भाजपा मुख्यालय से मुंह ही मोड़ लिया।

बताया जाता है कि वसुंधरा राजे ने लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद एक बार भी पार्टी कार्यालय में कदम नहीं रखा।

दबी जुबान में भाजपा के पदाधिकारी कहने लगे हैं कि जब से हनुमान बेनीवाल ने भाजपा कार्यालय में कदम रखा है, तब से वसुंधरा राजे ने कार्यालय से दूरी बना ली है।

अब इस बात को पुख्ता करते हुये 26 सितंबर को जब खींवसर और मंड़ावा में उपचुनाव के लिये भाजपा-रालोपा में गठबंधन हुआ तो एक बार फिर हनुमान बेनीवाल भाजपा कार्यालय पहुंचे।

इस बार उनकी अगुवाई करने वालों में पार्टी के नवनिवार्चित अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़, पूर्व अध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी और अशोक परनामी मौजूद थे।

लेकिन राज्य की भाजपा में सबसे बड़ी नेता मानी जाने वाली वसुंधरा राजे एक बार फिर पार्टी कार्यालय से दूर रहने को मजबूर हो गईं।

दोनों दलों के बीच हुये गठबंधन के लिये आयोजित दो बड़े कार्याक्रमों में वसुंधरा राजे के पार्टी कार्यालय में नहीं आने के बाद यह बात साफ हो गई है कि जब तक हनुमान बेनीवाल किसी भी रुप में भाजपा के साथ जुड़े रहेंगे, तब तक वसुंधरा राजे पार्टी से दूर ही रहेंगी।

अब बात करते हैं हनुमान बेनीवाल और वसुंधरा राजे के बीच बढ़ी हुई राजनीतिक दूरियों की।

कहा जाता है कि साल 2008 में भाजपा के टिकट पर पहली बार विधायक चुनकर आये हनुमान बेनीवाल ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में वसुंधरा राजे की तीखी आलोचना कर दी थी, जिसके बाद पार्टी ने उनपर एक्शन लेते हुये उनको भाजपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

तब ताकतवर रहीं वसुंधरा राजे ने ही यह कदम उठाया था। अब करीब 10 साल बाद अपने कई गुणा बढ़ चुके राजनीतिक कद के साथ हनुमान बेनीवाल ने भाजपा कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी है।

इसके साथ ही उन्होंने वसुंधरा राजे को पार्टी से दूर रहने पर मजबूर कर दिया है, तो कहा जा रहा है कि 10 साल पहले पार्टी से बाहर कर वसुंधरा राजे ने हनुमान बेनीवाल का जो अपमान किया था, उसका बदला उन्होंने वसुंधरा राजे को ही पार्टी से दूर कर चुका दिया है।