hanuman beniwal rlp bottle
hanuman beniwal rlp bottle

जयपुर।
हनुमान बेनीवाल को फायर ब्रांड नेता के तौर पर पहचाना जाता है। किसान कौम से आने के कारण लोग उनको रणनीतिक तौर पर भी कमतर आंकते हैं।

किंतु बेनीवाल की इस अहम रणनीति जीत को कांग्रेस क्या दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा भी नहीं समझ पाई।

हनुमान बेनीवाल की खास रणनीतिक चाल का ही कमाल है कि महज छह माह के भीतर ही पार्टी को क्षेत्रीय दल का दर्जा मिल गया।

सबसे पहले नियमानुसार जरूरत के मुताबिक 3 विधायकों को जिताकर राज्य पार्टी के दर्ज के लिए पहला कदम बढ़ाया। साथ ही आवश्यक 6 फीसदी मत भी हासिल करने में कामयाबी पाई।

इसके बाद इस उपलब्धि को अमलीजाम पहनाने के लिए बेनीवाल ने लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस की सांसे फूल गई और भाजपा पीछे भागने लगी।

आखिरी अशोक गहलोत को अपना सा मुंह लेकर बिना गठबंधन के हाथ मलना पड़ा और भाजपा ने रालोपा के साथ गठबंधन कर नागौर की सीट दे दी। यही बेनीवाल के लिए दूसरा कदम था, जो क्षेत्रीय पार्टी की तरफ ले जाता था।

अब बेनीवाल ने पूरी ताकत लगाकर नागौर की सीट जीती, साथ ही भाजपा को अन्य सात सीटों पर भी फायदा पहुंचाया। नतीजा प्रदेश की सभी 25 सीटों एनडीए के खाते में चली गई।

समर्थकों को विश्वास था कि केंद्र में हनुमान बेनीवाल को मंत्री बनाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सपोर्टर नाराज हुए। किंतु इसके साथ ही बेनीवाल ने अपनी रणनीति को कामयाबी तक पहुंचाने का काम भी पूरा कर दिया।

जो भी आवश्यक अहर्ताएं क्षेत्रीय पार्टी के लिए चाहिए थी, वह रालोपा ने पूरी कर लीं। विधानसभा में कम से कम 2 विधायक, लोकसभा की 25 में से कम से कम एक सीट समेत 6 प्रतिशत मत हासिल करने के साथ ही बेनीवाल ने पार्टी को क्षेत्रीय पार्टी बना दिया।

इस रणनीति की शुरुआत हुआ थी जयपुर के मानसरोवर में शिप्रापथ थाने के सामने खुले मैदान से। यहां पर पार्टी के गठन का ऐलान किया गया, साथ ही चुनाव लड़ने की घोषणा और अब क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर उसका अंत किया गया है।

राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए रालोपा को कम से कम 2024 के लोकसभा चुनाव तक इंतजार करना होगा, किंतु एक बड़ी कामयाबी से न केवल कांग्रेस बल्कि भाजपा भी अचंभित हो गई।

जो भी लोग हनुमान बेनीवाल को केवल उग्र और फायर ब्रांड नेता कहकर रणनीतिक तौर पर दरकिनार करते थे, वो आज उनकी छह माह पहले बनाई गई रणनीति के कायल हो गए हैं।

क्षेत्रीय दल की मान्यता के लिए निम्न शर्तों में से किसी एक को पूरा करना होता है-

कोई दल राज्य की विधानसभा के चुनावों में कुल वैध मतों में से 6 फीसदी प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त उसने सम्बंधित राज्य में कम से कम 2 सीटों पर जीत दर्ज की हों। या

अगर राज्य में लोकसभा के लिए हुए चुनाव में राज्य से हुए वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त सम्बंधित राज्य में लोकसभा की 25 में से कम से कम 1 सीट जीती हो। या

उस दल ने राज्य की विधानसभा के कुल सीटों में से 3 प्रतिशत अथवा कम से कम 3 सीटें जीती हों, इसमें जो भी ज्यादा हो प्राप्त की हों। या

यदि प्रत्येक 25 लोकसभा सीटों में से उस दल को कम से कम एक सीट पर जीती मिली हो, अथवा लोकसभा के चुनाव में उस सम्बंधित राज्य में उसे कम से कम इतनी सीटें प्राप्त की हों। या

किसी राज्य में लोकसभा के आम चुनाव में या विधानसभा के लिए हुए चुनाव में वैध मतों का 8 प्रतिशत मत प्राप्त कर लेता है।

किसी दल को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होता है। जिनमें से निम्न प्रमुख हैं—

लोकसभा या विधानसभा के चुनावों में 4 या उससे अधिक राज्यों में कुल मतों का 6 प्रतिशत वोट हासिल करना। इसके साथ किसी राज्य या राज्यों से लोकसभा में 4 सीटें जीत लेना। या

अगर पार्टी लोकसभा में 2 फीसदी सीटें जीतती है, और ये सदस्य 3 अलग-अलग राज्यों से चुने जाते हैं। या

अगर कोई पार्टी कम से कम 4 राज्यों में राज्यस्तरीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त हो।

अभी ये दल हैं राष्ट्रीय पार्टियां—

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस— 1885— राहुल गांधी

भारतीय जनता पार्टी— 1980— अमित शाह

बहुजन समाज पार्टी— 1984— मायावती

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी— 1925— सुरवरम सुधाकर रेड्डी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)— 1964—सीताराम येचुरी

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी— 1999— शरद पवार

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस— 1998— ममता बनर्जी