barmer girl power plant
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—बाड़मेर में 2007 में स्थापित गिरल पॉवर प्लांट को बंद कर खर्च कर रहे हैं हर माह 65 लाख रुपए

Barmer news.
राज्य सरकार द्वारा 12 साल पहले जिस पॉवर प्लांट को बिजली उत्पादन के लिए 1923 करोड़ खर्च कर लगाया गया था, वह सरकारी अधिकारियों की लापरवाही और निजी क्षेत्र से मिलीभगत करने के कारण अब बंद हो चुका है। बावजूद इसके इसपर हर माह 65 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं।

साल 2007 में 125—125 मेघावाट की दोनों इकाइयों के बंद होने के बाद भी इस प्लांट की सुरक्षा के लिए यहां पर 40 होमगार्ड, 30 पूर्व सैनिक और एक डिप्टी डायरेक्टर समेत 65 से ज्यादा कर्मचारी लगे हुए हैं। इन सब पर हर माह करीब 65 लाख रुपए का खर्च आता है।

ऐसा नहीं है कि सरकार अफसरों की लापरवाही के बाद इसको बेचने के प्रयास नहीं किए गए हों, लेकिन 5—5 बार इसको निलामी की प्रक्रिया की गई, बावजूद इसके कोई खरीददार नहीं मिल रहा है।

राज्य सरकार ने 2016 में इसको बेचने के लिए प्रयास किए थे। कैबिनेट के द्वारा इसको अप्रुव किया गया, लेकिन कोई खरीददार नहीं मिलने के कारण यह ​गिरल पॉवर प्लांट अब सरकार के लिए सफेद हाथी बन चुका है।

खास बात यह है कि जहां सरकार अधिकारियों की मिलीभगत और लापरवाही के चलते जहां यह सरकारी उपक्रम बंद हो गया है, वहीं इससे महज 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थि​त निजी कम्पनी का लिग्नाइट पॉवर प्लांट 1000 मेघावाट विद्युत का उत्पादन कर रहा है।

इस उपक्रम की बात की जाए तो 125 मेघावाट की इसकी पहली इकाई 2007 में शुरू हुई थी। उसके बाद 2009 में ही कोयले में सल्फर की तादात अधिक होने के कारण इसका बॉयलर चॉक होने लगा गया, तमाम प्रयास किए गए, लेकिन यह समस्या लगातार बढ़ती गई।

दूसरी इकाई भी साल 2009 में शुरू कर दी गई थी, किंतु उसमें भी यही समस्या सामने आई। बताया गया कि कोयले में सल्फर की मात्रा अधिक होने के कारण बॉयलर बंद हो रहा है। नतीजा यह निकला कि कोयला बदलने के बजाए 2016 में 958.91 करोड़ रुपए के घाटे के साथ इन इकाईयो के ही ताले लगा दिए गए

सबसे मजेदार बात यह है कि सरकार ने इन इकाइयों को विकल्प के तौर कपूरडी का कोयला देकर सुचारू किया जा सकता था, लेकिन यह कोयला निजी इकाईयों को दिया जा रहा है, जबकि इसको वही सल्फर वाला कोयला देकर बंद कर दिया गया।

गिरल प्लांट के मुख्य अभियंता हनुमंत चारण का कहना है कि निर्णय तो सरकार को ही करना है कि इसे चालू रखना है कि बंद करना है, लेकिन इतना जरूर है कि कपूरडी वाला कोयला यहां पर लाया जाये तो इकाईयां फिर से जिंदा हो सकती है।

मदद की दरकार के वक्त सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए। जब पहली बार इकाई को ठीक से चलाने के लिए 50 करोड़ रुपए मांगे गए तो नहीं दिए गये, बाद में एक बार फिर से इन इकाइयों को ठीक करने के लिए 176 करोड़ की मांग की गई, जिसपर भी सरकार ने हाथ खड़े कर दिये।

सरकारी लापरवाही, मिलीभगत और भ्रष्ट तंत्र का नतीजा था कि जनता की गाढ़ी कमाई के 1923 करोड़ रुपए को मिट्टी मिलाकर इस उपक्रम को ताले लगाए गये हैं, तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र की इकाई इसी क्षेत्र में फायदे का सौदा बनी हुई है।