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जयपुर।

राजस्थान की राजनीति में जिनको जादूगर के नाम से जाना जाता है, उनको लेकर कुछ तथ्य जांच लेना जरूरी है। खुद की पार्टी को सत्ता के करीब मानकर फिर से मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी ठोक रहे मेवाड़ के माली नेता अशोक गहलोत का इतिहास सियासी तौर सफल नहीं कहा जा सकता।

बावजूद इसके पांच साल के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और वसुंधरा राजे सरकार से सदन में लोहा लेने वाले नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी को दरकिनार कर खुद को मुख्यमंत्री का सबसे योग्य उम्मीदवार बताने वाले गहलोत के बारे में कुछ बातें हैं, जो जाननी आवश्यक है।

छात्र राजनीति से राजस्थान की राजनीति में सक्रिय हुए अशोक गहलोत 7वीं लोकसभा (1980-84) के लिए वर्ष 1980 में पहली बार जोधपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए। उन्‍होंने जोधपुर संसदीय क्षेत्र का 8वीं लोकसभा (1984-1989), 10वीं लोकसभा (1991-96), 11वीं लोकसभा (1996-98) तथा 12वीं लोकसभा (1998-1999) में प्रतिनिधित्‍व किया।

इसके बाद गहलोत ने सरदारपुरा (जोधपुर) विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर निर्वाचित हुए। गहलोत 1998 में 11वीं राजस्‍थान विधानसभा के सदस्‍य बने। गहलोत 2003 में एक बार फिर से इसी विधानसभा क्षेत्र से 12वीं राजस्‍थान विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। बाद में 13वीं राजस्‍थान विधानसभा के लिए 8 दिसंबर 2013 को सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से ही लगातार चौथी बार निर्वाचित हुए।

गहलोत 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता और दमदार नजर आ रहे कांग्रेस के दिग्गज परसराम मदेरणा को क्रॉस कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा किया। लेकिन साल 2003 में उनके ही नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता से न केवल बाहर हुई, बल्कि भाजपा ने 120 सीटों के साथ पहली बार स्पष्ट बहुमत हासिल किया।

बीजेपी में अंतर्कह के कारण साल 2008 में टिकट बंटवारा विवाद का कारण बना और पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर पाई। भाजपा 78 सीट जीत सकी, जबकि कांग्रेस ने 96 जगह जीत दर्ज की। भाजपा को नुकसान पहुंचाने वालों में बागी हुए किरोडीलाल मीणा ने काफी नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस ने बसपा के सभी 6 विधायक और गोलमादेवी को शामिल कर सरकार बना ली।

लेकिन एक बार फिर से अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए ही कांग्रेस पार्टी ने 2013 में इतिहास की सबसे बुरी हार का सामना किया। मोदी लहर और पार्टी की एकता ने गहलोत के खिलाफ ऐसी लहर चलाई कि कांग्रेस केवल 21 सीटों पर सिमट गई।

वैसे तो अशोक गहलोत को सियासत का जादूगर कहा जाता है, लेकिन समीक्षकों की नजर में गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस ने दो बार बुरी तरह से पछाड़ खाई है। उससे पहले गहलोत केवल लोकसभा का चुनाव ही लड़ते रहे हैं।

1998 में परसराम मदेरणा के अक्खड़ स्वभाव के कारण गहलोत ने बाजी मार ली। 2008 में सबसे बड़े प्रतिद्वंदी सीपी जोशी के एक वोट से हारने के कारण गहलोत का रास्ता साफ हो गया था। किंतु अब पहली बार गहलोत को प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष के तौर पर विराजमान जाट नेता रामेश्वर डूडी से कड़ी टक्कर मिल रही है।

1998 और 2008 में अपने प्रतियोगियों को पछाड़ने में कामयाब रहे गहलोत को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस शहर और सिविल लाइंस से प्रत्याशी अध्यक्ष प्रताप सिंह खाचरिवास के द्वारा दिए गए बयान ने साफ कर दिया है कि गहलोत के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी इस बार इतनी आसान नहीं रहेगी।

देखना दिलचस्प होगा कि कथित तौर पर सियासत के जादूगर अशोक गहलोत तीसरी बार सत्ता की सीट पर पहुंच पाते हैं, या पायलट के जोश के आगे पस्त हो जाते हैं? बहरहाल, गहलोत, पायलट और डूडी के अलावा सीपी जोशी, बीडी कल्ला, रघु शर्मा भी सीएम की रेस में बताए जा रहे हैं।