forest in rajasthan (file photo)
forest in rajasthan (file photo)

हाल ही में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान, भोपाल द्वारा किये गये शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि राजस्थान के वनों से सालाना 33244 करोड़ रुपये मूल्य के वास्तविक लाभ समाज और अर्थव्यवस्था को प्राप्त होते हैं।

शोध प्रतिवेदन शीघ्र ही प्रस्तुत होगा किन्तु उस रिपोर्ट का वन विभाग के सम्मुख प्रेजेंटेशन भारतीय वन प्रबंधन संस्थान की प्रोफेसर डॉ मधु वर्मा द्वारा किया गया है।

यह शोध विख्यात पारिस्थितिकीय-अर्थशास्त्री प्रोफेसर डॉ. मधु वर्मा के नेतृत्व में भारतीय वन प्रबंध संस्थान, भोपाल के वैज्ञानिक-दल द्वारा किया गया है। सालाना प्रप्प्त होने वाले उपरोक्त लाभ के साथ ही राजस्थान के वनों में 52,433 करोड़ रुपये का 8 करोड़ 96 लाख टन कार्बन स्टॉक भी जमा है।

जैसा कि सर्वविदित है, ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिये कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन अत्यंत महत्वपूर्ण है और राजस्थान के उष्णकटिबंधीय शुष्क वन विश्व के सबसे संकटापन्न वनों में शामिल हैं।

अध्ययन से प्राप्त लाभ का यह आंकड़ा दरअसल और अधिक होना चाहिये क्योंकि अभी इसमें वनों से प्राप्त होने वाले केवल 18 प्रकार की सेवायें और उत्पाद ही अध्ययन में शामिल किये जा सके हैं|

इनमें टिंबर, जलाऊ लकड़ी, लघु वनोपज, वनों में आमोद-प्रमोद व पर्यटन, संचित कार्बन, कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन, हाइड्रोलोजिकल सर्विसेज, न्यूट्रिएंट्स रेगुलेशन, मृदा संरक्षण, परागण, वन्य प्राणियों के लिये आवास, जैव-विविधता और जीन-पूल संरक्षण, ऑक्सीजन समेत अन्य गैसों का रेगुलेशन जिसमें सांस लेने की हवा भी शामिल है आदि शामिल हैं।

राजस्थान के भीतर केवल एक क्षेत्र, अरावली और विंध्याचल पर्वत श्रंखलाओं के मिलान पर स्थित रणथम्भोर जो विश्व का सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व है, की बात की जाये तो शोध से ज्ञात होता है कि कार्बन और लकड़ी के रूप में रणथम्भोर टाइगर रिजर्व में 49.2 अरब रुपये का स्टॉक जमा है|

इस मूल जमापूंजी से वस्तुओं एवं सेवाओं के रूप में सालाना 8.3 अरब रुपये का अनुमानित आर्थिक प्रवाह प्राप्त होता है|

ऐसे क्षेत्रों का सतत विकास और दीर्घकालीन संरक्षण न केवल राजस्थान के लोगों बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति के व्यापक हित में है|

पिछले दो दशकों में पर्यावरणीय प्रबंधन की एक रणनीति के रूप में पर्यावरण सेवाओं के बदले भुगतान में बढ़ती वैश्विक रुचि देखी गई है।

उत्कृष्ट पर्यावरणीय सेवायें प्रदान करने के लिये स्थानीय लोगों को सेवा का लाभ उठाने वाले लोगों द्वारा वित्तीय भुगतान अब एक वैश्विक वास्तविकता है|

इस प्रक्रिया को स्थापित करने हेतु पर्यावरण के गैर-बाजार मूल्यों का उच्चकोटि के अर्थशास्त्रीय शोध द्वारा पता लगाया जाता है|

इसे पेमेंट्स फॉर एनवायर्नमेंटल सर्विसेज (पी.ई.एस.) की अवधारणा के रूप में भी समझा जाता है| यह “लाभार्थी द्वारा भुगतान के सिद्धांत” पर आधारित है।

साधारण शब्दों में एक उदाहरण लें तो यदि आपके शहर को साफ़ पानी चाहिये तो जिन वन क्षेत्रों से यह पानी आता है वहां के लोगों को उन वनों के सतत प्रबंध के लिये आपको भुगतान करना होगा|

दूसरा उदाहरण लें तो यदि आप अपनी फैक्ट्री से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं कर पा रहे हैं तो उन लोगों को बजट देकर वृक्षारोपण के सतत प्रबंध में निवेश कीजिये जो आप के उद्योग द्वारा किये जा रहे सालाना उत्सर्जन के बराबर निरंतर कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन करते रहें|

या एक अन्य रूप में समझें तो यदि आपको राजस्थान के वनों से सालाना 33,244 करोड़ रुपये मूल्य के वास्तविक उत्पाद एवं सेवायें प्राप्त करते रहना है तो इन वनों के सतत प्रबंध एवं संरक्षण हेतु वित्तीय निवेश करना होगा|

समुचित निवेश के बिना, वनों का विनाश होने पर, 33,244 करोड़ रुपये मूल्य के वास्तविक उत्पाद एवं सेवायें मिलना बंद हो जायेगा|

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके चारों और आसपास जो वन दिखाई पड़ते हैं वे हमारी जिंदगी में और हमारी अर्थव्यवस्था में कितना योगदान देते हैं?

क्या आपने कभी सोचा है कि सांस लेने के लिये जो ऑक्सीजन वनों में पाये जाने वाले पेड़-पौधे हमें नियमित और अनवरत रूप से देते हैं, वही ऑक्सीजन अगर खरीद कर नाक में लगानी पड़े तो कितना खर्च आयेगा?

इस प्रकार की अनेक सेवायें और उत्पाद वनों से हमें प्राप्त होते हैं जिनका आर्थिक मूल्य हमारी आंखें खोलने वाला है। असल में हम इस दिशा में मुश्किल ही सोचते हैं।

पिछले 2 वर्षों से भी अधिक समय तक इस विषय की अगुआ शोधकर्ता और भारतीय वन प्रबंधन संस्थान भोपाल में कार्यरत प्रोफेसर डॉ. मधु वर्मा के नेतृत्व में राजस्थान के वनों द्वारा प्रदत्त की जा रही सेवाओं और उत्पादों के मूल्य पर गंभीर शोध हुई है।

इस शोध के लिये विश्व में उपलब्ध उच्चकोटि की की उन सभी विधियों का प्रयोग किया गया है जो इकोलॉजिकल इकोनॉमिक्स से संबद्ध अध्ययनों के लिये उपलब्ध हैं।

क्या इस प्रकार के अध्ययन दुनिया में अन्य स्थानों पर भी हुये हैं? विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शोध जर्नल्स में इकोसिस्टम सर्विसेज के मूल्यांकन एवं उनके आर्थिक योगदान पर विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित जर्नल्स में ही 2,767 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं|

इकोसिस्टम सर्विसेज और एनवायर्नमेंटल सर्विसेज पर 28,576 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं| इन शोधपत्रों से तीन बातें बिल्कुल स्पष्ट होती हैं|

सबसे पहली बात यह है कि प्रकृति से मिलने वाली जिन सेवाओं को हम मुफ्त मानकर प्राप्त करते हैं, वे असल में मुफ्त नहीं हैं|

उन सेवाओं का निरंतर प्रवाह जारी रहे इसके लिये उस ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का निरंतर रखरखाव आवश्यक है जिनसे ये प्राप्त होती हैं|

उदाहरण के लिए यदि आप चाहते हैं कि वनक्षेत्र भौम-जल के पुनर्भरण का कार्य करते रहें या पारिस्थितिक तंत्र में कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन होता रहे या टूरिज्म के लिये उच्चकोटि के क्षेत्र सदैव उपलब्ध रहे आयें, तो स्वाभाविक है कि इस प्रकार के ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर के रखरखाव, प्रबंध एवं सतत विकास की दिशा में समाज और सरकारों को निरंतर निवेश करते रहना होगा|

दूसरी बात यह है कि हालांकि इन सेवाओं और उत्पादों का आर्थिक मूल्य यदि आपको दृष्टिगोचर नहीं हो रहा हो तो आप याद कीजिये उस क्षण को जब आप या आपके परिजन अस्पताल में भर्ती होकर एक-एक सांस के लिये तड़प रहे हों और तब ऑक्सीजन के एक एक सिलेंडर की कितनी कीमत आपने चुकाई|

आशा है आपको वृक्षों के माध्यम से निरंतर प्राप्त होने वाली प्राणवायु ऑक्सीजन का आर्थिक मूल्य स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ गया होगा|

तीसरी बात जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वह यह है कि दो दशक पूर्व तक यह माना जाता था कि इन सेवाओं का आर्थिक आंकलन तो किया जा सकता है लेकिन इस आंकलन के आधार पर इन सेवाओं के बदले वास्तविक धन का आदान-प्रदान प्रायः नहीं हो सकता या इन आंकलनों को वनों के प्रबंध के लिये बजट का आधार नहीं बनाया जा सकता|

लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है और ऐसी सोच को अवैज्ञानिक, अविवेकी और मूर्खतापूर्ण सोच माना जाता है| क्यों? क्योंकि अब दुनिया के अनेक देशों में वनों के माध्यम से कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन, जलग्रहण व जल प्रदाय सेवाओं आदि का बहुत बड़ा बाजार विकसित हो चुका है|

शहरों को पानी पीना है तो शहरवासियों को अपने बौद्धिक दिवालियापन को छोड़कर आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों में ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर में स्वयं निवेश करना होगा| जहाँ से पानी आ रहा है, वहां के नागरिकों को जलग्रहण विकास के लिये मुआवजा देना अब दुनिया के बड़े शहरों की नई आर्थिक व्यवस्था है|

हाल ही में हुये एक अध्ययन के अनुसार दुनिया के 416 बड़े शहर यही कर रहे हैं जहाँ कुल मिलाकर 25 बिलियन डॉलर से अधिक का लेन-देन हो रहा है|

दरअसल अब पूरी दुनिया में जलग्रहण सेवाओं में निवेश बढ़ रहा है| डाउनस्ट्रीम शहर में पानी के उपयोगकर्ता, पेयजल की रक्षा करने वाले कार्यों के लिये अपस्ट्रीम वाटरशेड सेवा आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करते हैं।

ऐसे कार्यक्रम 4.3 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा वाटरशेड क्षेत्रों में 170 मिलियन डॉलर के निवेश से चल रहे हैं|

इन कार्यक्रमों से 230 मिलियन से अधिक लोगों को साफ़ पानी प्राप्त हो रहा है (देखें, नेचर कम्युनिकेशंस, 2018, 9:4375)|

उदाहरण के लिए न्यूयॉर्क शहर के समीप वाटरशेड में ऊपरी क्षेत्र के किसान वन क्षेत्रों का रखरखाव एवं प्रबंध इस प्रकार करते हैं कि वाटरशेड की पानी देने की क्षमता तो सुरक्षित रहे किंतु उस पानी के साथ ऐसी मिट्टी गाद इत्यादि बहकर ना आये जिस को साफ करने में न्यूयॉर्क शहर को बहुत धन खर्च करना पड़े|

किसानों द्वारा दी गई वाटरशेड और वन संरक्षण सर्विसेज के बदले न्यूयॉर्क शहर के नागरिक किसानों को एक निश्चित सालाना शुल्क प्रदान करते हैं| ध्यान दीजिये, न्यूयॉर्क अकेला शहर नहीं है|

जैसा कि ऊपर वर्णित है, विश्व भर में अनेक ऐसी व्यवस्थायें अब विकसित हो चुकी हैं और निरंतर चल रही हैं| पर्यावरणीय सेवाओं के बदले धन का आदान-प्रदान अर्थव्यवस्था का एक अंग बन गया है|

ऐसे अन्य उदाहरण जहाँ इकोसिस्टम सर्विसेज अब बाजार का अंग बन गई हैं, उनमें कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन और टूरिज्म सर्वाधिक महत्वपूर्ण है|

एक प्रश्न उठता है कि पारिस्थितिक तंत्रों से प्राप्त उत्पाद एवं सेवाओं को इस प्रकार बाजार का अंग बनाना क्यों आवश्यक है? क्या प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधन प्रत्येक नागरिक के लिये निशुल्क नहीं होना चाहिये? यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है|

लेकिन वैश्विक औद्योगीकरण पर पिछले 300 वर्षों के अनुभव से एक बात स्पष्ट हो जाती है गरीब की लुगाई सबकी भौजाई होती है|

जिन सेवाओं को प्रकृति द्वारा प्रदत्त माना जाता है, उनके समुचित रखरखाव में किसी का कोई योगदान न होने के कारण, जिस ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर से यह सेवायें और उत्पाद प्राप्त होते हैं, वह ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो जाती है और परिणामस्वरूप सेवाओं और उत्पादों का प्रवाह ही समाप्त हो जाता है|

हम ऐसे आत्मघाती विश्व का अंग हैं जहाँ सांस सब लेना चाहते हैं पर पेड़ लगाने में निवेश कोई नहीं करना चाहता|

हम ऐसे अज्ञानी और आँख मूंदे बैठे विश्व का अंग हैं जहाँ पानी सब पीना चाहते हैं पर उन वनों के संरक्षण और प्रबंध हेतु कोई निवेश नहीं करना चाहते जो मीठे पानी के सबसे बड़े स्रोत हैं|

सम्हलिये, अन्यथा पारिस्थितिक, आर्थिक और सामाजिक विनाश सामने है|

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)