-राजस्थान में वर्ष 1995 के बाद वनक्षेत्र में निरंतर बढ़त विदेशी बबूल से नहीं, स्थानीय प्रजातियों के कारण है।

यह बात भले आश्चर्यजनक लगे परन्तु उच्चकोटि के वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि राजस्थान में वर्ष 1995 के बाद हरियाली व वन क्षेत्र में कमी नहीं बल्कि निरंतर बढ़त हुई है|

इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर, हैदराबाद के वैज्ञानिकों एवं अन्य स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा प्रमाणित तथ्य यह है कि राजस्थान में वर्ष 1995 के बाद वनों के क्षेत्रफल में कुल मिलाकर राज्य स्तर पर कोई कमी नहीं हुई। असल में इस तथ्य की पुष्टि अनेक अध्ययनों से भी होती है|

उदाहरण के लिये भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून के वर्ष 2017 में प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजस्थान में वन क्षेत्रों में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है| राज्य में वनों और वनेत्तर क्षेत्रों में हरियाली का कुल क्षेत्र अब 24,838 वर्ग कि.मी. है।

भारतीय वन सर्वेक्षण के 2017 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वर्ष 2015 में प्रकाशित आंकड़ों की तुलना में कुल 466 वर्ग किलोमीटर फारेस्ट-कवर की बढ़त हुई है|

इसके साथ ही वर्ष 2018 में प्रकाशित शोध से ज्ञात होता है कि वर्ष 1994 से 2009 के मध्य राजस्थान के वन क्षेत्र में 859.57 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोत्तरी हुई। इसी प्रकार वर्ष 1994 से 2010 के बीच राजस्थान के वनों में 12.22 टेराग्राम कार्बन बढ़ा।

तुलना के लिए बता दें कि इसी दौरान गुजरात में 35.37 टेराग्राम कार्बन घटा था (इकोलॉजिकल इंडिकेटर्स, 2018, 85:742-752)।

तुलना के लिए यह भी बता दें कि वर्ष विश्व भर के आंकड़े देखने पर ज्ञात होता है कि 1990 से 2015 के दौरान लगभग 3 प्रतिशत वन क्षेत्र कम हुआ।

इस वैश्विक घटत के बीच राजस्थान में वनों का निरंतर बढ़ना एक भारी उपलब्धि है, विशेषकर तब, जब राजस्थान भारत में सबसे कम वर्षा, पानी की अल्प-उपलब्धता, पशुधन की अधिकता एवं विकट जलवायुवीय परिस्थितियों वाला राज्य है।

इस तथ्य को एक अलग दृष्टि से देखना आवश्यक है| हालाँकि वन और हरियाली में बढ़त की वास्तविकता को लम्बे समय तक नकारने के बाद अब लोग स्वीकार कर चुके हैं कि राजस्थान में वनों और वृक्षों से हरियाली का क्षेत्रफल बढ़ा है|

परन्तु अभी भी लोगों के मानस में वास्तविकता के विपरीत एक भ्रम बना हुआ है कि यह सब विदेशी बबूल की माया है| प्रमाणों को जांचे परखे बिना कोई भी व्यक्ति कह बैठता है कि राजस्थान में हरियाली का बढ़ता हुआ क्षेत्रफल विदेशी बबूल के फैलाव के कारण है|

परन्तु वैज्ञानिक शोध, स्थानीय ज्ञान और अनुभवजन्य प्रमाणों पर आधारित तथ्य यह है कि राजस्थान में वर्ष 1995 के बाद से वनक्षेत्र में निरंतर बढ़त विदेशी बबूल के फैलाव के कारण नहीं, बल्कि स्थानीय प्रजातियों के कारण है|

लगभग 200 शोधपत्रों, जिनमें राजस्थान में ट्रॉपिकल ड्राई फॉरेस्ट्स के पारिस्थितिकीय पुनरुद्धार और वृक्षारोपणों का अध्ययन किया गया है, उनसे यह बात स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है कि राजस्थान में वन विभाग और यहाँ के नागरिकों द्वारा स्थानीय प्रजातियों के रोपण की लम्बी परंपरा रही है, और वर्ष 1990 के बाद तो स्थानीय प्रजातियों के रोपण को निरंतर विशेष प्राथमिकता दी गयी है|

रोपण में स्थानीय प्रजातियों का भारी संख्या में प्रयोग के साथ ही इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन के दौरान स्थानीय प्रजातियों के बीज भी बोये जाते हैं|

वृक्षारोपण क्षेत्रों में सुरक्षा के इंतजाम होने से उन क्षेत्रों में डिग्रेडेड रूट-स्टॉक से प्राकृतिक पुनरुत्पादन भी होता है|

राजस्थान में वृक्षारोपण में विदेशी बबूल को नहीं बल्कि स्थानीय जैवविविधता को बढ़ावा दिया गया है|

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन क्षेत्रों में प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा बहुतायत में पाये जाने की बात की जाती है वहां भी यह प्रजाति स्थानीय प्रजातियों से कम है|

उदाहरण के लिये, राजस्थान के 14,690 वर्ग किलोमीटर का वह क्षेत्र जो कभी क्लोज्ड-एरिया के रूप में घोषित किया गया था, वहां भी वर्ष 2018 में प्रकाशित शोध से ज्ञात होता है कि प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा नहीं बल्कि स्थानीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष खेजड़ी ही सबसे ज्यादा पायी जाने वाली प्रजाति है|

इसके साथ नीम, सिरस, देशी बबूल, हिंगोट, कैर, कणज, मिस्वाक या सल्वाडोरा आदि की अलग अलग संख्या भी तुलनात्मक रूप से प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा से अधिक है (देखें, जर्नल ऑफ़ नेचर कंसर्वेशन, 2018, 45: 30-40)|

इसके अतिरिक्त जिन प्रोटेक्टेड एरियाज के बाहरी क्षेत्रों या पेरीफेरी में इर्दगिर्द प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा पाया जाता है, वहां यह स्थानीय लोगों की आजीविका और जलाऊ लकड़ी का साधन होने से स्थानीय प्रजातियों से दबाव कम हो गया है|

इससे स्थानीय जैव-विविधता के संरक्षण में भारी मदद मिली है| यहाँ तक कि राजस्थान का एक संरक्षित क्षेत्र जहाँ प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा वृद्धि के लिये सबसे अनुकूल परिस्थितियाँ हैं, वहां भी इसके प्योर-ट्री-स्टैंड 16.46 प्रतिशत क्षेत्र में ही हैं, जिन्हें समय समय पर स्थानीय आवश्यकताओं के लिये हटाया जा सकता है (देखें, बायोडायवर्सिटी एंड कंसर्वेशन, 2017, 26: 2839–2856)|

महत्वपूर्ण शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित शोधपत्रों का लेखा-जोखा देखें तो यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि औद्योगिक युग की शुरूआत में वर्ष 1850 से लेकर 1990 के दशक तक विश्व में संसाधनों के विदोहन के कारण भारी निर्वनीकरण हुआ।

आश्चर्यजनक बात यह है कि संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश, चीन और भारत, कुल निर्वनीकरण से उबर कर वनों की निरंतर बढ़ोत्तरी की स्थिति में आ गये हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन के स्वतंत्र अध्ययन ‘फ़ॉरेस्ट रिसोर्स असेसमेंट 2015 से पता चलता है कि भारत में, जनसँख्या की प्रति वर्ष 16.4 मिलियन व्यक्तियों की वृद्धि के बावजूद, जो किसी भी उष्णकटिबंधीय देश में सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि दर है, के बावजूद 2000 से 2010 के बीच वन क्षेत्र में 43,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष की दर से बढ़त हुई है।

वर्ष 2010 से 2015 के बीच तो यह वृद्धि 1,78,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष रही है। वर्ष 1990 से 2015 के मध्य वन क्षेत्र 63,939 हजार हेक्टेयर (6,39,390 वर्ग कि.मी.) से बढ़कर 70,682 हजार हेक्टेयर (7,06,820 वर्ग कि.मी.) हो गया।

किसी भी देश में वनों की कुल बर्बादी से उबरने के बाद, कुल बेहतरी में आ जाने की इस स्थिति को फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन या वन संक्रमण का नाम दिया जाता है।

भारतीय वन सर्वेक्षण के 180 से अधिक वैज्ञानिकों के दल द्वारा वर्ष 2017 में जारी किये गये शोध अध्ययन से भी प्रमाणित होता है कि भारत के वन और वनेत्तर क्षेत्रों में कुल वन और वृक्ष आवरण 80.20 मिलियन हेक्टेयर पहुँच गया है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 24.39 प्रतिशत है|

वर्ष 2015 के एसेसमेंट की तुलना में वर्ष 2017 के एसेसमेंट में 6,778 वर्ग किलोमीटर फॉरेस्ट कवर बढ़ा है| इसी दौरान 1243 वर्ग किलोमीटर ट्री-कवर बढ़ा है|

भारत के बाहर, वैश्विक स्तर पर फ्रांस का उदाहरण रोचक है। वर्ष 1500 से 1830 तक फ्रांस की जनसंख्या में बढ़त और वन क्षेत्र में ह्रास एक साथ हुआ। वहां वर्ष 1500 में 37 प्रतिशत वन थे व जनसंख्या 15 मिलियन थी।

वर्ष 1830 से लेकर वर्ष 1960 के मध्य कुल जनसंख्या 32 मिलियन से 42 मिलियन बढ़ी। उसके पश्चात् वर्ष 1960 से वर्ष 2005 के मध्य जनसंख्या 61 मिलियन हो गई।

वन क्षेत्र जो फ्रांस के कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 12 से 13 प्रतिशत रह गया था, बढ़ कर लगभग 25 प्रतिशत हो गया। संयुक्त राज्य अमेरिका में देखें तो वर्ष 1885 से वर्ष 1910 के मध्य अमेरिकी किसानों ने 77 मिलियन हेक्टेयर वनों को अन्य कार्यों में प्रयोग किया।

तुलना के लिये यह बताना समीचीन होगा कि अमेरिका में निर्वनीकरण का यह क्षेत्र भारत में वनों के कुल क्षेत्रफल के लगभग बराबर है।

मजबूत अर्थव्यवस्था से उत्पन्न आर्थिक अधिशेष, धन एवं दक्षता के उपयोग से धनी देशों में फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन की बात तो समझ में आती है, परन्तु कुछ विकासशील देशों, जैसे भारत और चीन, में जहां न तो अर्थव्यवस्था में पर्याप्त अधिशेष वित्त था और न ही संसाधनों के दक्षतापूर्वक उपयोग का कोई प्रमाण या परंपरा रही, वहां भी फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन हुआ।

ज़ाहिर है कि जिन कारणों से विकसित देशों में वन संक्रमण हुआ, वही कारण विकासशील देशों में लागू नहीं होते। तब प्रश्न यह है कि भारत और चीन में ऐसे विशेष कारण क्या थे जिनके परिणामस्वरूप, विश्व की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का घर होने के बावज़ूद, कुल निर्वनीकरण से कुल वनीकरण की स्थिति बनी?

इस प्रश्न के कई उत्तर शोधकर्ताओं द्वारा दिये गये हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो वन विभाग द्वारा अपनी रणनीति में बदलाव है। औपनिवेशिक काल, और स्वतंत्रता के बाद शुरुआती काल, में वन विभाग का मूल उद्देश्य प्राकृतिक वनों का विदोहन ही रहा।

वर्ष 1968 में अखिल भारतीय सेवा के रूप में गठित इंडियन फ़ॉरेस्ट सर्विस के सम्मुख तीन चुनौतियां थी: प्रथम, भारत में औपनिवेशिक काल में हुये अति-विदोहन के कारण नष्ट हुये वनों का पुनरुद्धार; दूसरी, नष्ट हुये वनों के क्षेत्र व गुणवत्ता में बढ़ोतरी; और, तीसरा, वनों पर निर्भर भारत की अधिसंख्य आबादी की वनोपज संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रखना।

यही कारण है कि वर्ष 1985 के आसपास सामाजिक वानिकी के माध्यम से वनों व गैर-वन क्षेत्रों में वृक्षारोपण, और 1990 के आसपास साझा वन प्रबंध के माध्यम से प्राकृतिक वनों एवं वृक्षारोपणों की सुरक्षा एवं प्रबंध के लिये गंभीर प्रयत्न किये गये।

उद्योगों ने भी यथासंभव अपने स्तर पर कच्चे माल की आपूर्ति हेतु वृक्षारोपण प्रोत्साहित किया।

भारत में फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन आर्थिक एवं वित्तीय कारणों नहीं बल्कि वन प्रबंध में वन विभाग के नवाचारी प्रयत्न, लोगों की सहभागिता, प्रभावी गवर्नेंस, वनेत्तर क्षेत्रों में पौधारोपण को बढ़ावा आदि से हुआ।

देश की प्रति व्यक्ति औसत आमदनी यूरोप और अमेरिका की तुलना में कम होने के बावजूद प्रभावी गवर्नेंस एवं अल्प वित्त में भी वन संरक्षण एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम के ठोस क्रियान्वयन से भारत में फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन संभव हुआ है।

राजस्थान में सामाजिक वानिकी के साथ, साझा वन प्रबंध में 1991 से आगे ठोस प्रयत्न हुये। जैसा कि भारत में वन संरक्षण, संवर्धन प्रबंध पर प्रकाशित 9000 से अधिक शोधपत्रों से निष्कर्ष निकला जा सकता है|

इन्ही विशेष कार्यों के परिणामस्वरूप राजस्थान में वर्ष 1995 के पश्चात वनों का नेट लॉस या कुल हानि नहीं हुई। अपितु, वनों के क्षेत्रफल एवं गुणवत्ता में भी निरंतर बढ़ोत्तरी हुई। इस दौरान एक ओर रोचक बात यह हुई कि वन विभाग द्वारा सीमित संख्या में ही सही, नागरिकों को अपनी निजी भूमि में हरियाली विकसित करने हेतु पौधे उगा कर वितरित किये गये।

परिणाम यह हुआ कि आज राजस्थान में 80 प्रतिशत ईंधन एवं इमारती लकड़ी वन क्षेत्रों के बाहर निजी जमीनों से प्राप्त हो रही है।

धनी देशों की बात छोड़ दें तो चीन, वियतनाम, और फिलिपींस के साथ भारत ऐसा देश है जहां प्रति व्यक्ति औसत आमदनी कम होने के बावज़ूद फ़ॉरेस्ट ट्रांजिशन संभव हुआ।

यदि इस बढ़त को नवाचार और लोगों की साझेदारी के माध्यम से सुदृढ़ नहीं किया गया तो वृक्षों की संख्या में तो बढ़ोतरी हो सकती है लेकिन वृक्षों के इन समूहों द्वारा प्राकृतिक वनों के समान पारिस्थितिक, सामाजिक एवं औद्योगिक रूप से लाभकारी उत्पाद और सेवायें नहीं प्राप्त होंगे।

औपनिवेशिक काल में भारत के वनों का जितना विदोहन हुआ, विश्व में शायद ही कोई अन्य उदाहरण हो। देश में संरक्षण और वनीकरण की उत्तम स्थिति के बावज़ूद अभी भी स्थानीय स्तर पर कहीं-कहीं वनों का ह्रास व गुणवत्ता में गिरावट हो रही है।

अतः आने वाले समय में वन संरक्षण, वनीकरण एवं सतत वन प्रबंध की दिशा में निरंतर प्रयत्न आवश्यक रहेंगे।

भारत में वनों की बढ़ोतरी हुई है, किंतु चुनौतियाँ अभी विद्यमान हैं। इनके निदान की दिशा में वन विभाग को उसी प्रकार सजग रह कर कार्य करते रहना होगा जैसा अभी तक किया गया है।

आने वाले दशकों में कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश करना उचित होगा। प्राकृतिक वनों एवं वृक्षारोपणों में जैव-विविधता को विशेष महत्व दिया जाना, और वृक्षारोपणों में वृक्ष और झाड़ियों को समाहित करते हुये त्रिस्तरीय वनस्पति को बढ़ावा देना आवश्यक है।

भारतीय वन सेवा को आगे उस नवाचारी दृष्टि की आवश्यकता है जो केवल हरियाली बढ़ाने के स्थान पर जैव-विविधता एवं जनोपयोगी प्रजातियों पर ध्यान देते हुये लोगों की आजीविका सुदृढ़ करने में भी योगदान दे।

शहरीकरण, कृषि एवं विकास कार्यों हेतु वन भूमि का उपयोग कम से कम हो, इसके लिये अन्य विभागों द्वारा, वनों के बाहर उत्पादकता वृद्धि एवं नवाचार की भी आवश्यकता है।

प्रमाण-आधारित तथ्यों को समझने और देखने के लिये हमें दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही शोध को पढ़ना, समझना और विश्लेषण करना होगा|

पूर्वाग्रही सोच को माथे में लिये रहने से सत्य प्रकट नहीं होता| हमें स्वयं से निरंतर यह पूछना आवश्यक है कि कहीं हमारी बुद्धि पर पूर्वाग्रह और अहंकार का आवरण तो नहीं चढ़ता जा रहा है|

पूर्वाग्रही बुद्धि से यथार्थ को नहीं देखा जा सकता| पूर्वाग्रही सोच माथे में ऐसा कचरा एकत्र कर लेती है जो सही जानकारी को समझने की संभावना समाप्त कर देता है|

प्रमाण-आधारित चिंतन वैज्ञानिकों और विद्वानों के लिये तो आवश्यक है ही, परन्तु वास्तविकता को न जानने वालों लिये भी इसकी उपयोगिता कम नहीं है|

यथार्थ को जानने के लिये हमें भारत के उन तमाम क्षेत्रों को स्वयं नज़दीक से देखना, परीक्षण करना और समझना होगा, जहाँ डिग्रेडेड फॉरेस्ट्स का इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन किया गया है।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)