vice chancellor of jnu
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रामगोपाल जाट
जब सोशल मीडिया पर ट्रोल्स के द्वारा जवाहर लाल नेहरू विवि, दिल्ली के छात्रों को जवाब दिया जाता है, तब सामने से सवाल आता है कि क्या आपने कभी जेएनयू देखी है क्या? क्या आप जेएनयू में पढ़ने के योग्य भी हैं? क्या आपकी औकात है जेएनयू का एग्जाम फाइट कर सकने की? क्या आप जेएनयू के छात्रों का आईक्यू लेवल जानते हैं?

इन तमाम सवालों का जवाब देने के लिये आपको या तो जेएनयू में पढ़ना होगा, या फिर उसको बारीकी से जानना होगा। वरना पक्के तौर पर यह मानकर चलिये कि जेएनयू में देशभर से अलग—अलग तरह के परिवेश से आकर पढ़ने वाले तेज तर्रार छात्रों को जवाब देने के लिये आप समक्ष नहीं हैं।

जेएनयू की तमाम खूबियों का आज हम यहां पर जिक्र करेंगे। देश के 2 नंबर वाले विवि की कमियों के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, किंतु उससे पहले कुछ लोगों के बारे में जरुर जानना चाहिये, जो यहां पर पढ़े हैं और देश—दुनिया में अपना नाम उंचा कर रहे हैं।

देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण, आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन, हाल ही में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू, स्वराज इंडिया दल के अध्यक्ष योगेंद्र यादव समेत सैंकड़ों नाम ऐसे हैं, जो जेएनयू में एक साल, दो साल, चार साल पढ़कर निकले हैं।

देश के कई मीडिया घरानों में उंचे पदों पर बैठे पत्रकार भी यहां पर पढ़कर निकले हैं। यहां पर हर हॉस्टल का नाम नदियों के नाम पर है। यहां पर कोई भी निर्माण करने के लिये किसी प्राकृतिक चीज को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। यहां पर ही आकर अरावली की श्रंखला का अंत होता है।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम पर उनकी बेटी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पुरानी दिल्ली से दूर पहाड़ों और पठारों की इस धरती पर 1972 में जेएनयू की नींव रखी थी। यहां पर भाषा को छोड़कर किसी भी विषय का स्नातक कोर्स नहीं पढ़ाया जाता है। यहां पर स्नातकोत्तर, एमफिल, पीएचडी के स्टूडेंट्स अध्ययन करते हैं।

वर्तमान की बात की जाये तो यहां पर विवि रिकॉर्ड के मुताबिक 8732 छात्र पढ़ते हैं। यह केंद्रीय विवि पूरी तरह से आवासीय है, यानी सभी 8732 विद्यार्थियों के लिये यहां पर बने हुये 17 छात्रावास में रहने खाने की पर्याप्त व्यवस्था है। छात्रों के मुकाबले विवि में जितनी संख्या में चाहिये, उतने शिक्षक भी मौजूद हैं।

विवि परिसर में खाने के लिये कई ढाबे हैं और मांस की दुकान भी यहीं पर है। यहीं पर कैफिट​एरिया है। विवि कैम्पस में जवाहर लाल नेहरू की मूर्ति लगी हुई है, लेकिन अन्य किसी विद्वान की मूर्ति यहां पर नहीं लगने दी जाती है। जिसका ताजा उदाहण स्वामी विवेकानंद की मूर्ति तोड़ने को लेकर सामने आया है।

विवि की कुल 8732 सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें एससी, एसटी, ओबीसी और विकलांग वर्ग के छात्रों के लिये आरक्षित हैं। जहां पर 4562 विद्यार्थी एससी, एसटी और विकलांग कोटे से पढ़ते हैं। इसके साथ ही 328 छात्र विदेशी हैं।

फीस की बात की जाये तो देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मुकाबले यहां पर एक छात्र पर सालाना कम ही खर्च होता है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर पढ़ने वाले एक छात्र पर हर साल 3.75 लाख रुपये अधिक खर्च हो रहा है। बीते 40 साल में फीस वृद्धि नहीं हुई है। जेएनयू की सालाना फीस 61 हजार रुपये है, तो बनारस हिंदू विवि, यानी बीएचयू की 68400, हैदराबाद केंद्रीय विवि की 57250, अलीगढ़ मुस्लिम ​विवि की 36400 और जामिया मीलिया इस्लामिया विवि की 84000 रुपये है।

हाल के विवाद की बात करें तो जिस कमरे का किराया 20 रुपये था, जो बढ़ाकर पहले 600 रुपये किया गया, विरोध के बाद उसको आधा कर दिया गया है। यह एक छात्र वाले कमरे का है। यदि दो छात्रों वाला कमरा है, तो उसका किराया पहले मात्र 10 रुपये महीना था, वह 300 रुपये किया गया और फिर उसको 150 कर दिया गया।

पानी और बिजली का सालाना खर्च वास्तविक रखा गया था, जिसको भी विरोध के बाद बीपीएल के लिये आधा कर दिया गया है। पहले यह खर्च नहीं लगता था। सर्विस चार्ज की बात की जाये तो यह भी अक्चुअल किया गया था, जिसको अब बीपीएल के लिये यह आधा है।

अब यदि दुनिया की अन्य मशहूर और बेस्ट रिजल्ट देने वाले विवि की तुलना में बात की जाये तो एमआईटी विवि, जो अमेरिका में है उसका सालाना खर्च 8.5 लाख रुपये है। इसी तरह से अमेरिका के स्टेनफोर्ड विवि का 10.5 लाख सालाना खर्च है। ऐसे ही हार्वर्ड ​विवि में 12 लाख, कैम्ब्रिज विवि, इंग्लैंड में 5.5 लाख और ओक्सफोर्ड विवि में 5 लाख रुपये सालाना खर्च होता है।

बताया जाता है कि जेएनयू में फीस बढ़ाने से ज्यादा विरोध छात्रों पर दिनरात की अन्य गतिविधियों पर रोक लगाने के कारण बढ़ा है। हाल ही में विवि प्रशासन ने पर्थ चट्टानों पर रात के वक्त छात्रों को जाने से रोका है, जहां पर शराब की हजारों खाली बोतलें बिखरी रहती हैं। इसी तरह से छात्रों के छात्रावासों में लड़कियां रातभर ठहर सकती थीं, उनको भी रोक दिया गया है। छात्राओं को रात के वक्त अपने ही छात्रावासों में रहने के निर्देश दिये गये हैं। इसी तरह से रातभर हॉस्टल से बाहर रहने वाले छात्र—छात्राओं को भी अब रात 10 बजे बाद एंट्री नहीं मिलेगी, उनपर रात के वक्त उपस्थित नहीं रहने पर कार्यवाही की जायेगी।

जिस तरह की बातें सामने आ रही है, उससे साफ है कि यही अंकुश छात्रों और छात्राओं को पसंद नहीं आ रहे हैं। यहां के विद्यार्थी जिस तरह से बोलने की आजादी चाहते हैं, ठीक वैसे ही रातभर कहीं पर भी विचरण करने, ठहरने, रहने की आजादी चाहते हैं, जो एमएचआरडी को मंजूर नहीं है।

ताजा विवाद भले ही एक नवंबर 2019 को रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार द्वारा शुल्क वृद्धि का नोटिफिकेशन जारी करने के बाद शुरु हुआ हो, मगर यह विवि हमेशा विवादों में रहा है। यहां पर तत्कालीन चांसलर इंदिरा गांधी को आपातकाल के दौरान 1976 में छात्रों के भारी विरोध के बाद इस्तीफा देना पड़ा था।

इसके बाद भी गाहे—बगाहे विवाद होते रहे हैं। प्रधानमंत्री रहते हुये मनमोहन सिंह को भी एक बार यहां पर रोक दिया गया था। सबसे बड़ा विवाद तब हुआ, जब संसद पर हमले के मुख्य आरोप अफजल गुरु का फांसी की सजा के बाद उसकी बरसी मनाई गई और उसकी फांसी के खिलाफ कैंडल मार्च निकाला गया, अफजल को सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा हुई थी।

इतना ही नहीं, जब दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों पर हमला हुआ, जब कश्मीर में जवानों की शहादत हुई और पुलवामा में दर्जनों जवान शहीद हो गये, तब जेएनयू में खुलेआम खुशियां मनाई गईं। ऐसे ही ‘तेरे कातिल​ जिंदा हैं, अफजल हम शर्मिंदा हैं’ के नारे लगे तो दुनिया ने देखा।

सबसे ज्यादा विवाद तब हुआ, जब छात्रसंघ अध्यक्ष और तमाम वामपंथी संगठनों के छात्रों द्वारा साल 2015 में यहां पर देशद्रोही नारेबाजी की गई। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह’ की नारेबाजी ने देश को झकझौर के रख दिया। कहा जाता है कि इस तरह की नारेबाजी यहां पर अक्सर होती है।

नारेबाजी करने वालों पर केस चल रहे हैं, लेकिन उनमें से एक को लोकसभा का टिकट देकर सीपीआई ने अपना असली चरित्र भी दिखा दिया। हालांकि, वह हार गया। अन्य दो कश्मीरी यहां से निकल चुके हैं। यहां पर पढ़े, लेकिन वामपंथी विचारधारा से ताल्लुख नहीं रखने वाले कई पूर्व छात्रों के वीडियो—बयान हत्प्रभ करने वाले हैं।

यहां पर ‘किस फ्री डे’, ‘सेक्स फ्री डे’ और इसी तरह से भारत की संस्कृति से मेल नहीं खाने वाले तमाम आयोजन होते हैं। पाकिस्तान की टीम जीतने पर खुशियां मनाने की बातें भी सुर्खिंयां बटोरती हैं। यहीं पर लड़के—लड़के, लड़के—लड़की और लड़की—लड़की और लड़की—लड़के मिलकर खुलेआम ‘लिपलॉक किस’ कर देश की संस्कृति के खिलाफ दम भरते हैं।

फीस विवाद उठने के बाद यहां पर कुलपति सचिवालय के अंदर लिखा गया था, ‘सेक्स फ्री सेल्फी पॉइंट’, और इसी तरह से विवेकानंद की मूर्ति को तोड़ने के बाद लिखा गया कि ‘भगवा जलेगा’, ‘भगवा का विनाश’ होगा। संघ, भाजपा, मनु को लेकर विवि में आये दिन गंदी गंदी गालियां देना आम बात है।

विवि की फीस वृद्धि के बारे में संजय बारू करते हैं कि स्कूली शिक्षा सभी जगह पर फ्री होनी चाहिये, लेकिन उच्च शिक्षा फ्री कर पाना भारत जैसे देश में संभव नहीं है। उनके अनुसार यहां पर विवाद अचानक फीस बढ़ाने से हुआ है, लेकिन वो मानते हैं कि फीस वृद्धि होनी जरुरी है।

इसी तरह से पूर्व छात्र रहे योगेंद्र यादव के अनुसार फीस बढ़ने से यहां पर पढ़ने वाले 40 फीसदी गरीब छात्रों के लिये रास्ते बंद हो जायेंगे। उच्च शिक्षा के द्वार गरीबों के लिये पहले से मुश्किल है, इस फीस वृद्धि से उनको शिक्षा मिलना कठिन होगा।

फिर भी कहना उचित ही होगा कि कई कार्य हैं, जो जेएनयू को अन्य विवि से अलग करता है। यहां पर अमेरिका के राष्ट्रपति की तर्ज पर चुना होते हैं। विवि प्रशासन इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेता है, खुद छात्रसंघ कार्यालय ही पूरा चुनाव करवाता है। उम्मीदवारों की खुलेआम डिबेट होती है, जहां पर उनको छात्रों के सवालों का जवाब भी देना होता है।

इसी तरह से यहां की धौलपुर लाइब्रेरी है, जो 24 घंटे खुली रहती है, काई भी छात्र पूरी रात अध्ययन कर सकता है। यहां पर वर्षभर में 200 से अधिक एकेडमिक और गैर अकादमिक लेक्चर और वर्कशॉप्स होती हैं, जहां पर देश—दुनिया के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग अपने लेक्चर देते हैं।

देश में सुरक्षा की संस्थाओं में देहरादूर का सेना कैडेट कॉलेज, पुणे का सैन्य इंजीनियरिंग कॉलेज, सिकंराबाद का इलेक्ट्रानिक एवं यांत्रिकी सैन्य कॉलेज, मउ का दूरसंचार इंजीनियरिंग सैन्य कॉलेज, पुणे की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और केरल की भारतीय नौसेना अकादमी भी जेएनयू से मान्यता प्राप्त हैं।

हालांकि जेएनयू के करीब 50 साल के इतिहास में से अधिकांश छात्रसंघ वामपंथी विचारधारा से चुने गये हैं, लेकिन फिर भी यहां पर एबीवीपी, एनएसयूआई, एसएफआई, बापसा समेत कई छात्र संगठन सक्रिय हैं।

जेएनयू में फीस का विवाद जारी है, और इसी विवाद के बीच सामने आई कई चीजों का फायदा यह हुआ है कि पूरे देश में उच्च शिक्षा सस्ती और फ्री करने की मांग प्रबल होने लगी है, जो शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिये अच्छी बात है।

जबकि देखा जाये तो केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राज्य सरकार के अधीन विवि और निजी विवि की फीस में रात—दिन का अंतर है। इन तीनों तरह के विवि में पढ़ाने वाले शिक्षकों, कलर्क स्टाफ समेत तमाम कर्मचारियों के वेतन में भी रात—दिन का अंतर है।