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रविवार, नवम्बर 1, 2020

गांवों में बसा है गांधीजी का भारत और उनके स्वावलम्बन का सपना

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वैश्विक ख्यातिप्राप्त युग पुरुष पूजनीय महात्मा गांधीजी की जन्म जयंती है। भारत भर में गांधी जयंती के उत्साह उल्लास की भव्यता कोविड—19 की महामारी के कारण सोशल डिस्टेंसिग, वर्चुअल रैलियों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के साथ मनाई जाएंगी।

गांधीजी ने भारतीय स्वतंत्रता की अलख को सत्याग्रह और आंदोलनों के सामाजिक आग्रह से अहिंसा के सतमार्ग से संचालित किया। आज का संस्मरण दिवस माँ भारती के संपूर्ण स्वराज्य से ग्राम स्वराज्य की जींवत संकल्पना की सार्थकता को खोज रहा है।

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असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च से लेकर नमक सत्याग्रह के पावन संग्राम में सैकड़ों देश भक्तों की देशभक्ति को उत्साहित करता नारा “अंग्रेजों भारत छोड़ो” ने स्वतंत्रता से स्वराज्य की ओर समर्पित लाखों वाणियों में एकजुटता भर दी थी।

स्वराज्य प्राप्ति की ललक ने आम जनता जनार्दन की एकत्व सहभागिता से गांधीजी के लिए सर्वव्यापी जनप्रियता प्रदान की। आपकी दूरदर्शिता में जन—जन में सक्रिय आंदोलनात्मक नेतृत्व की निरंतरता को सत्याग्रही उपवास जैसे आत्मयंमित संतुलन की बेड़ियों से नियंत्रित भी किया। जिससे निरंतर आंदोलनात्मक प्रवृत्तियों से स्वराज्य प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय नव निर्माण एंव सामाजिक समरसता में उग्रता का समावेश न हो जाए।

इस व्यावहारिक दूरदर्शिता में ब्रिटिश शासन शक्ति का उन्मूलन भारत की जन्मशक्ति के माध्यम से किया गया। इसी दूरदर्शिता से उत्प्रेरित ग्राम स्वराज्य की संजीवनी को राष्ट्रीय स्वराज्य के ढांचे की बुनियाद माना गया। आपके ग्राम स्वराज्य में सारे देश के राज्यों का स्वयमेव सहभागिता से संचालित होना निहित रहा है, जिसमें भारतीय सनातन समाज ग्राम स्वराज्य से ही पल्लवित होता रहा है।

गांधीजी के ग्राम सुराज में प्रत्येक प्रत्येक गांव की आत्म निर्भरता का स्वावलंबन गांव के लोगों द्वारा स्वयं प्रेरणा से संचालित हो, गांव का आर्थिक आत्मबल परिपूर्ण हो, गांव की आम आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति का स्थानीय समाधान, पर्याप्त भोजन, स्वस्थ जीवन पर्याप्त उत्पादन से उपभोग की निश्चिंतता, प्रकाश व्यवस्था, साफ़—सफ़ाई शुद्ध प्राकृतिक हवा से परिपूर्ण सुखी जीवन हो।

गांव के स्थानीय विवादों का समाधान पंच परमेश्वर की न्यायिक श्रद्धा से हो, जैसे देश के विवादों का समाधान देश के बाहर नहीं जाता, लंदन में नहीं जाता, उसी तरह देश का स्वराज्य अब गांव के स्वराज्य तक होना चाहिए। ”गाँव आज़ाद हुआ” गांव में स्वराज्य हो गया, इसलिए गांव की समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो।

गांव के जल-जंगल-ज़मीन और जानवरों की सार संभाल गांव की आम जनता ही करें। एक वृहद विस्तृत—सा गांव की रंगशाला-पाठशाला की ख्याति दूर दराज तक हो।
गांव की आर्थिक व्यवस्था में समाज के संतुलन की अवस्था भी हो सके, इसके लिए समाज में छुआछूत, अस्पृश्यता, मद्यपान जैसी कुरीतियों का नामो—निशाना ना हो।

मां भारती की प्राकृतिक नैसर्गिकता से पोषित गांव की धरा पर ”मैं, मेरे” से परे अपनत्व का भाव अपना हम-हमारे की सामाजिक समरसता से प्रेरित है। गांवों की ज़मीनों पर ज़बरन धन वसूली का माध्यम बनी जमींदारी प्रथा से मालिक नौकर की व्यवस्था को भी त्यागना होगा। भारतीय परंपरा में “न भूमि: स्यात् सर्वान प्रति अविशिष्टत्वात्” अर्थात भूमि पर किसी का मालिकाना हक़ नहीं हो सकता है।

”भूमि भोग्य नहीं पूज्य है” यही ग्राम स्वराज्य की मौलिकता का भव्य दिव्य और रमणीय आधार है। यद्यपि भारत को राजकीय स्वतंत्रता मिले सात दशक बीत चुके हैं, किंतु आज भी गांवों की राजकीय परतंत्रता राज्यों पर क़ायम है। भारतीय संविधान के लिखित संरचना में ग्राम स्वराज्य की बुनियाद का अभाव होने पर श्रीसंथानम ने संविधान सभा के क़ानून विशेषज्ञों को आपत्ति दर्ज भी करवाई थी। जिसके परिणामस्वरूप संविधान की धारा 40 में राज्यों को ग्राम पंचायत को स्वशासन की इकाई मानने का निर्देश दे दिया गया था।

ग्राम पंचायतों के उत्थान के लिए स्वस्वतंत्र भारत में सामुदायिक विकास कार्यक्रमों से लेकर पंचायती राज को संवैधानिक जामा एवं संशोधन की वैधानिकता और आदर्श ग्राम योजनाएं भी ग्राम राज्य की परतंत्रता में ग्राम स्वराज्य की सामरिक सम्पूर्णता को तलाश रही हैं।

आज ग्रामसभा के संचालन की काग़ज़ी खानापूर्ति में गांव की जन सहभागिता की आलस्य जड़ता को सहभागिता के उल्लास में परिवर्तित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। क्योंकि ग्रामराज्य को ग्राम स्वराज्य की विराटता में डालने से ही गांधीजी की ग्राम स्वराज्य का स्वप्न सार्थक हो सकेगा। जिससे एकत्व व्यक्ति, एकत्व परिवार और एकत्व गांव से एकत्व राष्ट्र की नींव सींची जा सकती है।

भारत राष्ट्र की नींव गांवों की संपन्न सशक्तता से होंगी तो वैश्विक नेतृत्व में वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श प्रतिमान को दुनिया सहज स्वीकार करेंगी। आइए आज हम सभी आत्मनिर्भर भारत के अभियान को आत्मनिर्भर गावों तक संचालित करने का संकल्प लें।
हर गांव अनाज, दुग्ध, साग, सब्ज़ी, फल, कपास से स्वावलंबी हो प्राकृतिक संसाधनों की परिपूर्णता से आत्मनिर्भर गांव परस्पर निर्भरता से सुखद समाज का निर्माण कर सकें।

आज का नया भारत इक्कीसवीं सदी के तकनीकी युग में कश्मीर से कन्याकुमारी तक जैसलमेर के रेगिस्तान से लेकर शिलॉन्ग सिक्किम की पहाड़ियों तक शासकीय—प्रशासकीय समस्याओं के त्वरित समाधान की ओर अग्रसर हो रहा है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है जिस सामूहिकता में व्यक्ति स्वयं प्रकाशित था। उसी गांव की स्वराज्य को देदीप्यमान करना है। गांव की सनातन जड़ों को सीचंने से ही गांधीजी के ग्राम स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा।
जय हिन्द जय भारत।

लेखिका: डॉ. निमिषा गौड़
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
कनोडिया महिला महाविद्यालय।

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नेशनल दुनिआ संपादक .

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