मैं रूका नहीं…मैं थका नहीं, मैं रुका नहीं, मैं थका नहीं, डर से मैं डरा नहीं

-बस चुनौती को अवसर में बदलकर चलता रहा, बस चलता रहा..

बात ये इसी दिन 31 अगस्त की है जब मुझे चूरू, हनुमानगढ़ के प्रवास में शरीर में हल्की सी थकावट, थोड़ा सा ताप, गले में खरखराहट ने चेतावनी का अलार्म देकर सचेत किया। एक पल मेरे मन ने मुझे आगाह कर कहा कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो है, तुरंत जयपुर पहुंचकर कोरोना की जांच करवाई।

मन में असमंजस्य की स्थिति बनी थी कहीं कुछ है तो नहीं ? और अलसुबह मोबाइल पर मैसेज देखकर मेरी आशंका के डर ने मुझे झकझोर दिया। ये मैसेज मुझे डॉ. अजीत के समाचार के रूप में मिला।


मैं कोरोना पॉजिटिव हूं।… सुबह—सुबह पूरे घर में एक बार फिर अफरा—तफरी मच गई। क्योंकि एक पखवाड़े पूर्व ही पुत्र पराक्रम कोरोना से संक्रमित हो चुका था उस कठिन समय के दौर से पूरा परिवार गुजर चुका था। पुन: उसी दौर में जाना, कुछ देर के लिए मन में अशांति और बैचेनी ने घर कर लिया। जिससे निकलना भी मेरे लिए बेहद जरूरी था।


मन में पहला सवाल उठा वायरस कोरोना के बचाव के लिए मुझे कुछ करना था? बार-बार चहुंओर की चेतावनी के बावजूद क्या कुछ नहीं हुआ? और क्या छूट गया? इस सवाल ने मन-मस्तिष्क को झकझोरने के साथ ही आत्मग्लानि का अहसास कराया और यूं लगा कि कहीं मेरे ही किसी कृत्य से मैं कोरोना वायरस का सुपर स्प्रेडर तो नहीं बन गया ?

और पहला कार्य किया अपनी याददाश्त को ताजा कर विगत 3 दिनों में संपर्क में आये लोगों को सूचना देने का जो लंबा क्रम चला उन्हें तुरंत कोरोना की जांच करवाने की प्रार्थना की।

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क रो ना यानि कुछ करना था चाहे मास्क पहनने की बात हो या सोशल डिस्टेंसिंग की या अपने आप को सैनेटाइज रखने का काम तो कही न कही निश्चित तौर पर छूट गया तो ही तभी तो कोरोना जीता। यह बात स्वतः ही अहसास हो गई।

मुझे याद आया जैन धर्म के अणुव्रत का वह सिद्धांत ‘निज पर शासन-फिर अनुशासन’ मेरे मन ने कहा कि निज के शासन में यह चूक मुझसे कहीं न कहीं हो गई चाहे इसका कारण मेरी वर्षों पुरानी जनता के बीच में सदैव घिरे रहने की आदत रही हो या जनसंवाद में जन निकटता रही हो।

कोरोना को हराने के लिए आज की प्रबल आवश्यकता है ‘निज पर शासन-फिर अनुशासन’ के सिद्धांत को अपने जीवन में उतारने की। 14 दिन से अधिक समय तक क्वारेंटाइन रहने का चिकित्सकीय परामर्श, कोरोना को हराने में मेरा 22 दिन तक चला।

इन 22 दिनों में एकाकी समय को जीने के लिए यकायक मुझे याद आया देश के प्रधानमंत्री जी का वह ध्येय वाक्य ”चुनौती को अवसर में बदलने का”। उन्हीं अवसरों कि तलाश मैंने प्रारंभ कर दी।

अवसर था – बीते लम्हों को एक बार और जीने का, याद करने का, पूर्णतया एकांत के जरिये एकाग्रता, स्वध्यान से खुद को पहचानने का, पुरानी स्मृतियों को ताजा करने का।

इसके लिए मैंने कई प्रयोग भी किये और पहले प्रयोग के लिए मैंने विश्वविद्यालय के छात्रसंघ गतिविधियों से जुड़ी स्मृतियों को ताजा करने के लिए पुराने फोटो एलबम को ढूंढवाकर प्रतिदिन आधा घंटा पुरानी फोटो व स्मृतियों के आधार पर विश्वविद्यालय के दिनों के पुराने मित्रों को जो भागमभाग के इस दौर में दूर हो गये को याद कर टेलीफोन नंबर पता कर उनसे संपर्क करना प्रारंभ किया, तो वर्षों पुराना विद्यार्थी जीवन पुन: तरोताजा हो गया तथा जिन पुराने मित्रों से वर्षों बाद संपर्क हुआ, तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ और उन्हें अच्छा महसूस हुआ।

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ठीक इसी प्रकार दशकों पुराने छात्र जीवन के बाद खुद को क्वारेंटाइन किए कमरे की साफ—सफाई, बिस्तरों की सिलवटों से लेकर कमरे के रखरखाव, चाय के कप—प्लेट, खाने के बर्तन को धोने के प्रतिदिन काम से भी एक अनोखा अनुभव हुआ।

यह क्रम लगातार तब तक चला जब तक कोरोना जांच 22 दिन पश्चात् नेगेटिव रिपोर्ट नहीं आई। इसी एकाकी समय में मेरी मान्यता बनी कि व्यक्ति अगर अपनी मानसिकता में सकारात्मक सोच के साथ दृढ़ विश्वास से किसी भी चुनौती को स्वीकार करें, तो उस चुनौती पर विजय आसानी से प्राप्त कर सकता है।

वैश्विक महामारी कोरोना को हराने के लिए सकारात्मक मानसिकता के साथ शांत व मजबूत मन का होना इस बीमारी के विरुद्ध एक कारगर हथियार है तथा इस हथियार को और तीखा करने के लिए आवश्यकता है रूचिपूर्ण साहित्य, चाहे वह कोई उपन्यास हो या कथानक, रूचिपूर्ण संगीत चाहे वह शास्त्रीय संगीत हो या सिनेमाई उसे पढ़ने व सुनने का, और इसी का प्रयोग मैंने बखूबी से किया।

संत रविदास ने दशकों वर्षों पहले कहा था ”मन चंगा तो कठौती में गंगा” व्यक्ति को अपना मन चंगा करने के लिए किसी चिकित्सक की जरूरत नहीं है। हम स्वयं अपने मोटिवेटर बन सकते हैं।

अपनी क्षमता का अगर सकारात्मक रूप से स्वयं आंकलन करें, तो जीवन में एक नई ऊर्जा और स्फूर्ति का अहसास स्वत: अपने आप हो जाता है, जो किसी भी चुनौती को हराने में सक्षम होता है।

कोरोना के लिए जिसका वैक्सीन अब तक इजाद नहीं हुआ है इसके लिए जनचेतना की आवश्यकता तथा मास्क पहनने से लेकर सोशल डिस्टेंसिंग, सैनेटाइजेशन इस कार्य को ”चैरिटी बिगेन फ्रॉम होम” के भाव से हम स्वयं करेंगे।

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तभी कोरोना हारेगा और हिंदुस्तान जीतेगा। किसी ने सही कहा था अनुभव जीवन में कुछ देकर जाता है। कोरोना के क्वारेंटाइन अवधि ने अनुभव दिया कि आज के तनावपूर्ण भागमभाग जीवन में योग व स्वध्यान के अलावा आत्म शांति के लिए अपने आप को तैयार करना आवश्यक है तथा कोरोना संक्रमण व इससे लड़ने का पुरुषार्थ भी स्वयं पैदा करना पड़ेगा, अभी लगता है कोरोना के साथ यात्रा लंबी है, जिसमें धैर्य व सतर्कता स्वयं बरतनी होगी।

बचाव ही इसका इलाज है। यह धारणा जनमानस तक पहुंचाने के लिए संवाहक बनने की आवश्यकता है।