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गुरूवार, अक्टूबर 29, 2020

कृषि बिलों से किसानों की दोगुनी आय होने में मदद मिलेगी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि विधेयकों से स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और चौधरी चरण सिंह के सपने को पूरा कर देश के किसान को दी पूरी आजादी

भारत के कृषि क्षेत्र में नये युग की शुरुआत, सशक्त होगा किसान, दोगुनी होगी आय, फसल बेचने की पूरी आजादी

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भारतीय जनता पार्टी, जनसंघ के समय से किसानों की हितैषी रही है, इसलिए पहले तो विपक्ष के नाते किसानों के मुद्दों पर संघर्ष किया, वहीं शासन के जरिये देश एवं प्रदेशों में विभिन्न क्रांतिकारी योजनाओं से किसानों का जीवन बदलने के सफल प्रयास किये।

स्व. श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री काल के दौरान ‘‘किसान क्रेडिट कार्ड’’ (केसीसी) इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। आज देश के करोड़ों किसान इसका लाभ ले रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के किसानों को मिल रही ‘‘भावान्तर स्कीम’’ भी किसानों को सम्बल प्रदान करने वाली है।


प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में शासन सम्भालने के बाद पीएम किसान से लेकर फसल बीमा तक और 50 करोड़ पशुओं का टीकाकरण, सॉइल हेल्थ कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, पीएम आशा, आत्मनिर्भर भारत अभियान के जरिये भारत के अन्नदाता के जीवन स्तर को बदला है, जिसके हम 130 करोड़ भारतीय साक्षी हैं।


इन दिनों देश में कृषि क्षेत्र सम्बन्धी विधेयकों की चर्चा मुखर हो रही है। माननीय राष्ट्रपति महोदय ने किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश 2020 और अनिवार्य वस्तुएं (संशोधन) अध्यादेश 2020 इन तीनों विधेयकों को 5 जून, 2020 को जारी कर दिया था और अब लोकसभा एवं राज्यसभा में पहले दो विधेयकों को मंजूरी दे दी गई है।


इन विधेयकों की गुणावगुण के आधार पर आलोचना-समालोचना हो रही है, लेकिन खासतौर पर विपक्षी दल कांग्रेस इसका मुखर विरोध कर रही है और वह तब कर रही है जब 2019 के लोकसभा चुनाव के स्वयं के घोषणा-पत्र के कुछ बिन्दुओं पर स्वयं ने आगे बढ़कर अध्यादेश से जुड़ी बातों का भरोसा देश की जनता को दिया था और कांग्रेस के स्वयं के इस विरोधाभास के चलते कांग्रेस खुद कठघरे में खड़ी हो गयी है, लेकिन इन सबसे बेपरवाह होकर कांग्रेस विरोध क्यों कर रही है, यह प्रश्न विचारणीय है?


अध्यादेश के पहलूओं पर मैं बाद में आऊंगा, लेकिन ऐसा लगता है कि विगत एक दशक के दौरान कांग्रेस विचार एवं व्यवहार, संगठन के नाते सिमटती चली गई और लगभग साढ़े तीन प्रदेशों में भी साख बचाने की जद्दोजहद में फंसी है। पहले प्रदेशों में और अब राष्ट्रीय स्तर पर भी बिखराव की ओर जा रही है। कतिपय तौर पर बौखलाहट भी है अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार भी बैठी है।


2014 में भ्रष्टाचार, वंशवाद, विषमता, महंगाई, बेरोजगारी जैसे ही मुद्दों पर सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और बुनियादी विकास एवं देश में वैचारिक मुद्दों के समाधान से देश ही नहीं वरन् विश्व में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति व्यापक समर्थन के आभामंडल से लुप्त होती चली गई।

यूँ कहें कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अक्षम नेतृत्व, मुद्दों एवं दिशाहीनता के कारण अप्रासंगिक होती जा रही है, ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अब घायल नागिन की तरह फुंफकार कर प्रतिशोध की अग्नि में जल रही है और किसी भी हद तक मोदी सरकार को बिना तार्किक आधार के घेरना चाह रही है और इसी चाहत में वो अराजकता का भी सहारा ले रही है।

विरोध करते-करते वो देश हित को भी पीछे छोड़ देती है। विगत दिनों चीन, नागरिकता संशोधन कानून, राफेल और अब बेरोजगारी एवं किसानों के मुद्दों को बिना वजह तूल देकर इसी अराजकता पर सवार होकर अपने वोट बैंक को इकट्ठा करके सत्ता वापसी के मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रही है।

यह बात दीगर है कि भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर जब उनके 55 वर्षों की सत्ता के दौरान सवाल पूछे जाते हैं तो उनके नेताओं के पास कोई तार्किक उत्तर नहीं होता है। बरहाल हम विधेयकों की चर्चा कर रहे थे।


हम हमेशा सुनते आए हैं एक पंच लाइन की तरह ‘‘भारत एक कृषि प्रधान देश है।’’ वैदिक काल से लेकर मध्यकाल, आधुनिक काल तक भारत में सामर्थ्य एवं सम्पन्नता का आधार खेती को ही माना गया है। अभी कोरोना काल में भी जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था लॉकडाउन का शिकार होकर ध्वस्त हो रही थी तो भारत में खेती ही जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की 3.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह तो कहते थे कि ‘‘देश की खुशहाली का रास्ता खेत और खलिहान से गुजरता है।’’ यह सत्य है कि किसान हमेशा भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा, जिसके बारे में कहा बहुत गया, लेकिन किया कम गया।

1960 के दशक में प्रारम्भ हुई हरित क्रांति भी लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती चली गई। बढ़ती आबादी, घटती जोत, शहरों की ओर पलायन, औद्योगिकरण, पश्चिमीकरण और नीतियों की विसंगतियों और क्रियान्वयन की कमी के कारण खेती और किसान नारों और कागजी नीतियों में दबते चले गए, लेकिन आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है।


रोजी-रोटी के लिए आज भी भारत की अर्थव्यवस्था खेती और खेती से जुड़े क्रियाकलापों पर ही टिकी हुई है और देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती पर ही निर्भर है। वैदिक काल में खेती का उन्नत स्वरूप था और कालान्तर में बढ़ती आबादी, प्राकृतिक आपदाएं, औद्योगिकरण, पलायन, भौतिकता के कारण खेती न प्राथमिकता का सौदा रही और न लाभ का।

खेती के बारे में कहते सब हैं कोशिश करते हैं, लेकिन खेती प्राथमिकता में नहीं रही, यही कारण है कि समय-समय पर बहुत-सी बातों के बारे में कृषि सुधारों के बारे में आंशिक कुछ होता रहा, लेकिन कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुए, कभी खेती राजनीति की शिकार होती रही, कभी प्रशासनिक अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार की शिकार होती रही।


दशकों से किसान की फसल का मूल्य खरीददार बोली लगाकर निर्धारित करने लगे, जिससे देश के किसान का शोषण चला गया, वह कर्जदार, खोखला, हर तरह से कमजोर होता चला गया।

किसानों की परिस्थितियों एवं समस्याओं के समाधान की तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने बड़े क्रांतिकारी एवं ऐतिहासिक कदम उठाते हुये सबसे पहले कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय किया, फिर किसान केन्द्रित आधारभूत योजनाओं के माध्यम से 2022 तक किसान की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पूरा करने का दृढ़ संकल्प लिया।


नवीन कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के साथ जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये 26 मई, 2015 को केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग ने दूरदर्शन पर 24 घंटे का किसान चैनल शुरू किया। सोइल हेल्थ कार्ड से मिट्‌टी के अनुरूप फसलें रोपने के कार्य शुरू किये गये, प्राकृतिक आपदाओं से फसलों को नुकसान होने पर वित्तीय सहायता की व्यवस्था, बीजों की गुणवत्ता व 800 से अधिक वैरायटी से रिकॉर्ड तोड़ धान का उत्पादन होने लगा।


नीति आयोग की रिपोर्ट के सार के मुताबिक किसानों की चार-पांच बुनियादी प्राथमिक समस्याएं हैं, मसलन एक प्रति हैक्टेयर कम उत्पादन, दूसरा उपज का उचित मूल्य एवं कृषि विपणन केन्द्र का सीमित किसानों तक पहुंच होना।

अन्यत्र काम की तलाश के कारण खेती को खाली छोड़ देना, जिसके कारण खेती के किराये पर देने के कानूनों की जटिलता होना है। चौथा प्राकृतिक आपदा में जोखिम कवर की जटिलता और इसलिए नीति आयोग ने उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए खेती की विकास वृद्धि और किसानों को उचित मूल्य के लिए सुझाव दिए हैं।


देश में पहली बार गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री स्व. श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने सबसे पहले ‘‘किसान क्रेडिट कार्ड’’ (केसीसी) के माध्यम से एक बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। इसी तरीके से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के उद्देश्य भी किसान के उत्पाद को शहर की मण्डी तक पहुंचाने की सहूलियत देना ही था।


2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले ही कार्यकाल में ‘‘सॉइल हेल्थ कार्ड’’, नीम कोटेड यूरिया और फसल बीमा योजना, पीएम किसान सम्मान निधि, 60 वर्ष से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन इत्यादि कार्यक्रमों से अपनी प्रतिबद्धता खेती के लिए दर्शायी।

इसी तरीके से स्वामीनाथन आयोग, जिसका हवाला कांग्रेस के लोग बार-बार देते हैं, उसकी सिफारिशों के अनुरूप 14 खरीफ एवं रबी की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुणा बढ़ाया, यह पहली बार हुआ।

प्रधानमंत्री मोदी के किसानों के प्रति नीतियों की प्रतिबद्धता इसी बात से पता चलती है कि नीति आयोग की 2015 की एक रिपोर्ट में पैरा 4.1 एवं 4.2 में एमएसपी और एग्रीकल्चर मार्केटिंग के बारे में ही वर्णित कर दिया था।


नीति आयोग ने 2015 की रिपोर्ट में कृषि सुधारों एवं किसान की आमदनी में बढ़ोतरी को लेकर जो सिफारिशें की, उनमें 1960 से जो गेहूं, चावल की एमएसपी ( Minimum support price, न्यूनतम समर्थन मूल्य), खरीद शुरू की गई थी, उसे विस्तार देकर उसमें 23 फसलों को शामिल करने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियों को दूर कर सुव्यवस्थित करने, देश में जमीन को लीज पर देने का कानून बनाने, कृषि से संबंधित सुधार सिर्फ कागजी न रहकर धरातल पर आयें।

हरियाणा एवं पंजाब में अपनी मंडी, आंध्रप्रदेश में रायतु बाजार, तमिलनाडु में उजावार संधाई इत्यादि बाजार, जिसमें किसान ग्राहक को सीधी उत्पाद बेचता है, इसी तरह के बाजार विकसित हैं, जिसमें किसान स्वयं सीधे ग्राहक को फसल बेच सकता है।

उत्पाद की गुणवत्ता पर जोर देने, नई सप्लाई चेन विकसित करने, प्रॉडक्ट प्रोसेसिंग को बढावा देने, सुगम परिवहन सुविधा, बिचौलिया व्यवस्था खत्म कर कृषक एवं ग्राहक का सीधा संबंध बनाने, सुगम परिवहन सुविधा, किसान को उत्पाद का अच्छे दाम मिलना सुनिश्चित हो, इत्यादि सिफारिशें की थी, किसानों के हित में इन सभी शामिल कर एवं नई व्यवस्थायें बनाकर केन्द्र सरकार किसानों के लिये ये कानून लेकर आई है, जिससे किसान तमाम सहूलियतों के साथ उन्नत भी बनेगा।


देश के सभी वर्गों को आर्थिक उन्नति के साथ आत्मनिर्भर बनाने के प्रति दृढ़ संकल्पित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि विधेयकों को लेकर कहा कि, भारत के कृषि इतिहास में आज (20 सितंबर) एक बड़ा दिन है। संसद में अहम विधेयकों के पारित होने पर मैं अपने परिश्रमी अन्नदाताओं को बधाई देता हूं।

यह न केवल कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाएगा, बल्कि इससे करोड़ों किसान सशक्त होंगे। दशकों तक बिचौलियों के बंधनों में जकड़े हुये हमारे किसान भाई-बहनों को आजादी मिली है। इससे किसानों की आय दोगुनी करने के प्रयासों को बल मिलेगा और उनकी समृद्धि सुनिश्चित होगी।


मोदी ने कहा कि इन बिलों के पास होने से हमारे किसानों की पहुंच भविष्य की टेक्नोलॉजी तक आसान होगी। इससे न केवल उपज बढ़ेगी, बल्कि बेहतर परिणाम सामने आएंगे। मैं पहले भी कहा चुका हूं और एक बार फिर कहता हूं, एमएसपी की व्यवस्था जारी रहेगी, सरकारी खरीद जारी रहेगी।

हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे।


कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी किसानों को आश्वस्त कर चुके हैं, जिन्होंने कहा कि, कृषि उपज और कीमत आश्वासन संबंधी विधेयकों को ‘किसान हितैषी बताते हुए कहा कि किसानों की उपज की, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था के तहत खरीद हो रही है और यह आगे भी जारी रहेगी।


नरेन्द्र तोमर ने संसद में कहा कि, हमारी सरकार किसानों की आय बढ़ाने एवं सदैव उनके सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण के लिये कार्य करने पर जोर दे रही है। सरकार ने कृषि क्षेत्र के कल्याण के लिये अनेक पहल की हैं।

कृषि क्षेत्र के बजट आवंटन में काफी वृद्धि की गई, वर्ष 2018-19 के दौरान कृषि क्षेत्र का आवंटन 46,700 करोड़ रुपये था, कृषि क्षेत्र के लिये वर्ष 2019-20 के दौरान 1,30,485. 21 करोड़ रुपये का परिव्यय आवंटित किया गया, वर्ष 2020-21 के लिये आवंटन और भी वृद्धि के साथ 1,34,399.77 करोड़ रुपये किया गया है।


केन्द्र सरकार के नये कृषि विधेयकों से किसान की आय में वृद्धि होने से उनके जीवनस्तर में सुधार होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी मजबूत होगी।

अब जो नये बदलाव हुये हैं, उनमें बहुत सी प्रमुख बातें ये हैं कि, पहले तो किसान एपीएमसी एक्ट (Agricultural produce market committee, कृषि उत्पाद बाजार समिति) के तहत किसान अपनी फसल का मूल्य स्वयं तय नहीं कर सकता था, लेकिन अब मोदी सरकार के नये कानून के मुताबिक किसान खरीददार को उचित मूल्य तय कर अपनी फसल बेच सकता है, इससे पूरे दाम किसान को मिलेंगे, कोई टैक्स नहीं लगेगा।

कहीं भी, कभी किसान अपनी मर्जी से फसल के दाम तय कर खरीददार को बेच सकता है।


मोदी सरकार के नये कानून से गांव के युवा किसान एवं महिलायें भी फसल-खरीदने बेचने का खुद का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, गावों में रोजगार के नये रास्ते खुलेंगे।

कम जोत वाले छोटे किसान अपने संगठन बनाकर डिमांड के आधार पर फसल का उत्पादन कर सकेंगे, सीधे खरीददार को बेच सकेंगे। संगठन, एफपीओ, कॉपरेटिव इत्यादि के माध्यम से भी किसान फसल को खरीद एवं बेच सकेंगे।

फसल उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर किसान एवं खरीददार पहले भी एग्रीमेंट कर सकते हैं, जिससे किसान को उसकी फसल के अच्छे दाम मिल सकेंगे।
मोदी सरकार के नये कानून के मुताबिक किसान एवं खरीददार पर कोई टैक्ट एवं सेस नहीं लगेगा।

इन्फ्रास्ट्रक्टर एवं किसानों की मार्केटिंग एबिलिटी को मजबूत करने के लिये समय-समय पर कई तरह की स्कीम एवं ट्रेनिंग प्रोग्राम मोदी सरकार शुरू करने जा रही है, जो किसानों के लिये बहुत लाभकारी साबित होंगे। नये नियम प्रणाली के आधार पर एपीएमसी उद्यमी बाहर भी अपना व्यवसाय शुरू कर सकेंगे।


कांग्रेस ने 2019 के अपने घोषणा पत्र में एपीएमसी सुधार, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 सुधार एवं करार सम्बंधित कानून बनाने का वादा किया था, आज जब मोदी सरकार उन्हीं विषयों पर विधेयकों लेकर आई है तो कांग्रेस विरोध कर रही है, जिससे कांग्रेस का अराजक एवं दोहरा चरित्र सामने आया है।

देशहित में मोदी सरकार द्वारा लिये गये सभी फैसलों का कांग्रेस सिर्फ राजनीतिक विरोध करती है, नागरिकता संशोधन कानून हो, अनुच्छेद 370 खत्म करने की बात हो या तीन तलाक कानून, इत्यादि सभी फैसलों का विरोध कर कांग्रेस ने जनता को गुमराह करने की खूब कोशिश की, लेकिन विफल रही, क्योंकि राष्ट्रवाद के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाते हुये ऐतिहासक कार्य कर रहे मोदी के साथ देश का जनमानस खड़ा है, था और रहेगा।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार 2014 से लेकर अब तक पिछले 6 वर्षों में ‘जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान’ के नारे को जमीन पर उताकर किसान को खुशहाल, एवं समृद्ध बनाने के प्रति दृढ़ संकल्पित है, जिसके हम सभी साक्षी हैं।

बीज, उत्पादन, बाजार, विपणन इत्यादि से कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव कर मोदी अन्नदाता को उन्नत, प्रसन्न एवं सशक्त बनाने की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम तो शुरुआत से ही आने लगे हैं और अब भारत के कृषि क्षेत्र में एक नये युग की शुरुआत हो चुकी है।


लेखक: डॉ. सतीश पूनियां (प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा, राजस्थान)

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Ram Gopal Jathttps://nationaldunia.com
नेशनल दुनिआ संपादक .

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