पिता की जिम्मेदारी निभाएगी बेटी के सर की पगड़ी, चाकसू की मूलनिवासी डॉ. लीना बेनीवाल ने बांधी पिता की पगडी

-दिवंगत पिता को भी दे चुकी हैं मुखाग्नि और कंधा, सामाजिक बदलाव की पेरोकार है दोनों बहने डॉ. लीना और योशिता बेनीवाल, बेटा-बेटी के बराबरी के हक की हिमायती हैं दोनों बहनें।

मदन कोथुनियां
भारतीय समाज में पगड़ी की रस्म से अकसर बेटियों को वंचित रखा जाता है। रस्म है कि पिता के अवसान के बाद पुत्र ही पिता की पगड़ी धारण करता है, लेकिन जयपुर जिले के चाकसू कस्बे की रहने वाली डॉ. लीना बेनीवाल ने पिता के निधन के बाद पगड़ी की रस्म ऐसे निभाई और संपन्न की जैसे कोई बेटा करता है।         

डॉ. लीना ने पिता की पगड़ी अपने सिर पर बाँध कर बदलाव की एक नई इबारत लिखी है। पेशे से डाक्टर लीना कहती हैं, ” मेरा मकसद सिर्फ इतना ही है कि बेटियों को बराबरी का हक़ मिले।

मेरे पिता ने हमेशा मुझे बेटे से भी ज्यादा महत्व दिया। उनके दिल में बेटी-बेटो में कोई फर्क नहीं था। मगर उनके निधन के बाद कंधा देने से लेकर पगड़ी रस्म का सवाल आया तो मुझे लगा, मेरे दिवगंत पिता की ख्वाहिश पूरी होगी, मैं दिवंगत पिता को मुखाग्नि भी दूंगी और सामाजिक परपंरा के अनुसार पगड़ी की रस्म भी अदा करुँगी। ये सभी बेटियों के हकोंं का सम्मान है।”         

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सामाजिक व धार्मिक विधि-विधान के बीच रस्मो-रिवाज के अंधेरो से निकली लीना यूंं प्रकट हुई जैसे वो बेटियों के लिए रोशनी लेकर आई हो। पिछले दिनों लीना के पिता अशोक बेनीवाल का जो कि रेलवे में अधिकारी रहे है का देहांत हो गया था और लीना व योशिता अपने पिता की दो बेटियां है।          

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लिहाज़ा परिवार की ज़िम्मेदारी डॉ. लीना के कंधो पर ही रही है। मगर जब पगड़ी की रस्म का मौका आया तो सामाजिक रस्म आड़े आ गई। क्योंकि रस्मो रिवाज इस मामले में बेटो की हिमायत करते है, लेकिन लीना ने पगड़ी और बेटी के बीच सदियों से बने फासले को मिटा दिया।         

नाते रिश्तेदारों की भीड़ जमा हुई और जब पगड़ी की रस्म का अवसर आया, लीना ने प्रचलित रस्म का प्रतिकार किया और परिवर्तन की प्रतिमा बन कर खड़ी हो गई।

सामाजिक स्वीकृति के बीच लीना के माथे पिता की पगड़ी बंधी तो उसका चेहरा बदलाव की रोशनी से दमक उठा।         

डॉ. लीना कहती है कि जब मेरे पिता ने कभी भेद नहीं किया तो समाज में ये बेटियों के साथ भेदभाव होने का सवाल ही नहीं उठता ?

इनका कहना है
“अब समय भी बदल गया है। बेटिया भी घर की जिम्मेदारी निभा सकती है। पहले बेटों को ही पगड़ी रस्म का दस्तूर था, क्योंकि पगड़ी की रस्म का अर्थ है परिवार के मुखिया के निधन के बाद पगड़ी के जरिये जिम्मेदारी का अंतरण। पहले बेटियांं घर से बाहर नहीं निकलती थी, अब वे बेटो के जैसे सभी जिमेदारियो का निर्वहन करने में सक्षम है”
रूपनारायण सांवरिया, वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता
         

” मेरे पिता ने हमेशा मुझे बेटे से भी ज्यादा महत्व दिया। उन्होंने बेटी-बेटो में कोई फर्क नहीं किया। मगर उनके निधन के बाद पगड़ी दस्तूर का सवाल आया तो मुझे लगा मेरे दिवगंत पिता की ख्वाहिश पूरी होगी, मैं ही पगड़ी की रस्म अदा करुँगी। ये सभी बेटियों के हको का सम्मान है और इस इस रस्म में मेरा समाज मेरे साथ खडा है।”
डॉ.. लीना बेनीवाल (दिवंगत अशोक बेनीवाल की बेटी)

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