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राजस्थान और कांग्रेस……

1952 से राजस्थान मे कांग्रेस ने ही अधिकतर समय शासन किया है। फिर भी पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से राजस्थान मे कांग्रेस दिनों दिन कमजोर होती जा रही है। क्या आपने इसका मूल कारण सोचा है? इसमे अशोक गहलोत गाँधी परीवार और तुष्टिकरण की राजनीति मुख्य कारण है।

अशोक गहलोत का नाम मैंने इसलिए लिया है, क्योंकि जब से राजस्थान की कांग्रेस की कमान पूरी तरह गहलोत के हाथ मे आई है, तभी से प्रदेश मे कांग्रेस का वोट प्रतिशत दिनों दिन गिर रहा है।

1998 के बाद में जितने भी विधानसभा चुनाव हुऐ है, कांग्रेस बहुमत का जादुई आकडा भी नहीं छु पाई है। कांग्रेस का मूल वोटर बहुत निराश और असमंजस मे है, क्योंकि वोटर जिसको मुख्यमंत्री बनाना चाहता है, गाँधी परीवार उसको दरकिनार करके अपनी पसंद के गहलोत को थोप देता है।

1998 में कांग्रेस के वोटर ने परसराम मदेरणा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिया ल, 153 सीटों से कांग्रेस की झोली भर दी, पर जब मुख्यमंत्री का निर्णय हुआ तो विधायकों की राय के विपरीत जाकर पर्यवेक्षकों ने गांधी परिवार के आदेश का हवाला देकर गहलोत को थोप दिया।

फिर आया 2008 का चुनाव तो कर्मचारी वर्ग और किसान वर्ग ने गहलोत का चुनाव से पहले ही विरोध शुरू कर दिया, तो गाँधी परीवार ने चालाकी से गहलोत को भूमिगत रखकर सी.पी. जोशी को मुख्य भूमिका मे रखकर चुनाव लडा और कांग्रेसियों मे ऐसा मैसेज दिया की सरकार आने पर सी.पी. जौशी ही मुख्यमंत्री होंगे।

इन परिस्थितियों को भापकर चतुर गहलोत साहब ने सी. पी. जोशी को विधायक के चुनाव में ही एक अदने से उम्मीदवार से हरवा दिया और पूर्व की तरह मुख्यमंत्री की बारी आई तो गाँधी परिवार की दादागिरी के कारण मुख्यमंत्री बन गये, जबकि विधायक का चुनाव हारा हुआ भी मुख्यमंत्री बन सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि वहां तो एक परिवार का मर्जीदान होना ही सबसे बडी योग्यता और लोकप्रियता का पैमाना है।
             

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अब आते हैं 2018 के चुनाव पर। अबकी बार चुनौती तगडी थी, क्योंकि सचिन पायलेट के रूप मे एक योग्य, लोकप्रिय, आकर्षक युवा, और आलाकमान की नजर मे ( गाँधी परिवार) में भी अपना महत्व और स्थान रखने वाले सचिन पायलट के रूप मे सम्भावनामय नेतृत्व था और प्रदेशाध्यक्ष रहते हुऐ पायलट ने राजस्थान मे अपनी खुद के लोगों की भी टीम खडी कर ली थी।

गहलोत 2013 से 2018 के बीच में अधिकतर समय मे राजस्थान से बाहर दिल्ली और गुजरात ही रहे थे, यहां तक की विधानसभा में भी उनकी उपस्थिति नाममात्र की रहती थी। फिर भी जब मुख्यमंत्री के निर्णय का समय आया तो 10 दिनों की भारी गहमागहमी के बीच में भी आखिर मुख्यमंत्री के नाम का फैसला गहलोत के ही फेवर मे आया।

37 कांग्रेस के विधायकों के सचिन पायलट के खुलकर पक्ष मे आने, कांग्रेस के ही महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के पक्ष में होने और गुर्जर समाज की दबंगता से दवाब मे आकर गाँधी परिवार ने सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया और प्रदेशाध्यक्ष पद पर यथावत रखा।

लेकिन गहलोत को तो खुद के अलावा कोई ऐसा नेता मंजूर ही नहीं है, जो आलाकमान के सीधा सम्पर्क मे हो। बहुत शातिर तरिके से सचिन पायलट को परेशान किया गया। उनके विभाग के अधिकारियों को मुख्यमंत्री ने पायलट का आदेश नहीं मानने के लिए निर्देशित किया गया। फाइलों को उनके पास नहीं भेजा गया और अब तो हद ही हो गई जब एसओजी से नोटिस दिलवाकर गिरफ्तार करवाने का प्लान तैयार किया गया, जिसको पायलेट ने भाँप लिया और यह सब जो हम लोग देख रहे हैं, वो परिस्थिति बन गयी।

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इतना लिख दिया तो अब नवनियुक्त कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के बारे में भी लिखना आवश्यक हो गया। कांग्रेस का पिछले 25 वर्षों का इतिहास उठाकर देख लो, जो भी प्रदेशाध्यक्ष बने हैं, उन सभी की राजनीतिक यात्रा का अध्ययन कर लो, जो भी प्रदेशाध्यक्ष बना है वो न केवल अगला चुनाव हारा है, बल्कि उसकी राजनीति ही खत्म हो गयी!

चन्दभान बहुत कदावर नैता थे। लगातार तीन चुनाव हार गये और आज गुमनामी मे है। नारायण सिंह प्रदेशाध्यक्ष बनते ही लगातार दो चुनाव हारे और आज गुमनामी मे हैं। ताजा उदाहरण सचिन पायलट का ही देख लो, प्रदेशाध्यक्ष बनते ही अजमेर का लोकसभा चुनाव हार गये और आज राजनीतिक भविष्य अधरझूल में है।

डोटासरा जेसे व्यक्ति को जो विवादित भी हो गये और प्रदेश स्तर के नेता नहीं होते हुऐ भी प्रदेशाध्यक्ष क्यों बनाया? इसके मूल मे जाट राजनीति है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां, सांसद और आरएलपी अध्यक्ष हनुमान बेनिवाल और भरतपुर महाराजा विश्वेन्द्र सिंह की राजस्थान में बढती लोकप्रियता और गहलोत विरोधी रवेये से घबराकर अशोक गहलोत ने विवादित और साधारण से डोटासरा को, जिन्होंने अभी तक पूरा राजस्थान देखा ही नहीं, जो शिक्षा मन्त्री रहते हुऐ बहुत विवादित हो गये थे, फिर भी इनको इसलिए बनाया, ताकि जाट वोटरों को भ्रमित किया जाये।

लेकिन जाट वोटर बहुत चतुर हैं। सब समझते हैं, इसलिए डोटासरा के लिए प्रदेशाध्यक्ष का पद न केवल घाटे का सौदा रहेगा, किन्तु इस पद के साथ जुडे अपशकुन भी पीछा नहीं छुड़ा पाएंगे।     

लेख को लम्बा नहीं करते हुए इतना कहना ही नहीं चाहूंगा, लेकिन भविष्य में आप इसको महसूस भी करोगे, कि राजस्थान में कांग्रेस की यह सरकार अंतिम सरकार होगी और इतिहास में यह बात चर्चा में रहेगी, कि 2018 में अंतिम बार राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी थी।

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याद रहेगा कांग्रेस की ओर से आखिरी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे। उतर प्रदेश, बिहार, बंगाल, और गुजरात की तरह कांग्रेस राजस्थान में भी अब से अप्रासंगिक हो जायेगी, क्योंकि जाट, राजपूत, गुर्जर, मीणा, और ब्राह्मण, कभी भी कांग्रेस को वोट नहीं देने वाले हैं।