वसुंधरा राजे बचा रही हैं अशोक गहलोत सरकार? इन बिंदुओं से समझें

जयपुर। राजस्थान में चल रहे सियासी तूफान के बीच पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चुप्पी और भाजपा की बैठकों से उनकी दूरी कई गंभीर सवाल खड़ा कर रही है। दूसरी ओर अशोक गहलोत के द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में वसुंधरा राजे की शान में कसीदे गढ़ना और पूरे मामले में राजे की चुप्पी साधे रहने को गहलोत सरकार बचाने के तौर पर देखा जा रहा है।

भाजपा मुख्यालय पर मंगलवार और बुधवार को हुई अहम बैठकों में राजे नहीं आईं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केंद्रीय नेतृत्व यही चाहता है कि राजे इस पूरे मामले से दूर रहें? या फिर माजरा कुछ और ही है? अंदरखाने चर्चा तो यह है कि अगर राजे मामले में आगे बढ़कर अपना ‘शौर्य’ दिखाने का प्रयास करती भी हैं तो उन्हें कुछ नहीं मिलेगा?

राजस्थान में विधानसभा 2018के चुनाव में हार के बाद वसुंधरा राजे को भाजपा ने राज्य की राजनीति से दूर कर दिया है। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने संदेश दे दिया था वह अब केंद्रीय राजनीति का हिस्सा बनें।

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लेकिन जब वसुंधरा राजे के खास विश्वसनीय माने जाने वाले अशोक परनामी को हटाने के बाद नया प्रदेशाध्यक्ष बनाने की बात चली तो केंद्रीय नेतृत्व की पसंद को दरकिनार कर राजे ने गजेंद्र सिंह शेखावत की जगह दोनों की पसंद मदनलाल सैनी को अध्यक्ष बनवा अपनी खुशी जाहिर कर दी।

दुर्भाग्य से एक साल से भी कम समय के कार्यकाल के बाद ही सैनी का निधन हो गया और फिर से राजे व केंद्रीय नेतृत्व के बीच आपसी खींतचान की वजह से नया अध्यक्ष लंबे समय तक नहीं बन पाया।

अंतत: 84 दिन बाद पार्टी ने संघ की पसंद 37 साल के राजनीतिक अनुभवी डॉ. सतीश पूनियां को प्रदेशाध्यक्ष की कमान सौंप दी गई। इसको वसुंधरा राजे ने अपनी हार के तौर देखा और उन्होंने फिर राजस्थान से पूरी तरह दूरी बना ली।

सियासी शल्य क्रिया की जिम्मेदारी भी डॉ. पूनियां को मिल गई

राजस्थान की कांग्रेस में जिस तरह का सियासी तूफान आया हुआ है। इन परिस्थितियों में राजे भी पार्टी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गहलोत सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभा सकती थीं।

भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने राजे की बजाय राजस्थान में ‘ऑपरेशन लोटस’ की जिम्मेदारी भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंप दी। इससे भी साफ संकेत हैं कि राजस्थान की राजनीति से राजे को फिलहाल पार्टी दूर रखना चाहती है।

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क्या गहलोत सरकार बचा रही हैं राजे, इशारा तो यही दिख रहा है?

इससे भी मजेदार बात यह है कि पिछले दिनों राज्य में सियासी संग्राम शुरू होने के दिन गहलोत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा पर तगड़ा हमला बोला।

भाजपा के राज्य में अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ पर खुलकर हमले किये, किंतु जब वसुंधरा राजे का सवाल आया तो गहलोत उनकी शान में कसीदे गढ़ने लग गए।

गहलोत के चेहरे का रंग बदल गया और सारे राज खुल गए

वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आयोजित प्रेसवार्ता में जिस तरह से मंद मुस्कान के साथ शर्माते हुए अशोक गहलोत ने वसुंधरा राजे को भाजपा का चेहरा नहीं बनाए जाने का दुख अपने चेहरे से दुख जाहिर किया, वो सियासत के जानकारों के गले नहीं उतर रहा है।

जो गहलोत प्रेसवार्ता के दौरान पूरे समय भाजपा को कोस रहे थे, वो वसुंधरा राजे का नाम आते ही अचानक सॉफ्ट हो गए और उनकी शान में कसीदे गढ़ने लगे। यह बात जाहिर तौर पर दोनों के बीच गठबंधन को दिखाता है।

धौलपुर आईं, लेकिन जयपुर नहीं पहुंची

नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने मंगलवार को पार्टी कार्यालय पर हुई बैठक के बाद कहा था कि राजे बुधवार को होने वाली बैठक में हिस्सा लेंगी। राजे तय कार्यक्रम के अनुसार धौलपुर पहुंच भी गईं, लेकिन जयपुर नहीं आईं। बताया गया कि धार्मिक अनुष्ठान की वजह से वो जयपुर नहीं आईं।

भाजपा कार्यकार्ताओं और कुछ पदाधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि जब तक वसुंधरा राजे को केंद्र के द्वारा फ्री हैंड देकर राज्य में नहीं भेजा जाएगा, तब तक वो नहीं जाएंगी। क्योंकि वो अध्यक्ष के तौर पर डॉ. सतीश पूनियां के नेतृतव में काम करके खुद को छोटा नहीं बनना चाहती हैं, लेकिन भाजपा नेतृत्व को यह मंजूर नहीं है।

बंगला नं. 13 भी एक सबूत है

राजे और गहलोत के गठबंधन की बात की जाए तो सिविल लाइन स्थित बंगला नं. 13 को हाईकोर्ट द्वारा आदेश देने पर भी सरकार द्वारा खाली नहीं करवाया जाना भी गहलोत-राजे गठबंधन का सबसे बड़ा सबूत है। दूसरी ओर भाजपा के राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा से 17 साल पहले आवंटित घर खाली करवा लिया गया।

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पांच साल एक शब्द नहीं बोले गहलोत

इसके साथ ही राजे और गहलोत के अंदरुनी गठबंधन का सबूत सदन की कार्यवाही भी है, जिसमें तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार की नाकामियों के खिलाफ 2013 से 2018 तक गहलोत का बोला हुआ एक शब्द भी अंकित नहीं है। इससे साबित होता है कि या तो राजे सरकार ने कुछ भी गलत नहीं किया, या फिर गहलोत का उनके साथ गठबंधन है।

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पांच-पांच साल का राज और विपक्ष में चुप्पी

साल 1998 से 2003, 2008 से 2013 और अब 2018 से लेकर वर्तमान तक अशोक गहलोत 3 बार मुख्यमंत्री रहे हैं। इसी तरह से 2003 से 2008 और 2013 से 2018 तक वसुंधरा राजे सीएम रही हैं। इस तरह से देखा जाए तो दोनों ने पांच-पांच साल के टर्न के साथ राज किया है।

मजेदार बात यह है कि जब भी ये दोनों नेता विपक्ष में होते हैं, तब या तो सदन में आते ही नहीं, और आते भी हैं तो मौजूदा सरकार के खिलाफ कुछ बोलते ही नहीं हैं। यही बात दोनों के गठबंधन की तरफ इशारा करती है।

आखिरी छह माह की समीक्षा हर बार धरी ही क्यों रह जाती है?

जब 2013 के चुनाव आए, तब भाजपा ने जनता से वादा किया कि अशोक गहलोत की 2008 से 2013 वाली सरकार के आखिरी छह माह में लिए गए ताबड़तोड़ फैसलों की समीक्षा की जाएगी, किंतु कमेटी का गठन हुआ, कुछ बैठकें हुईं और ‘आखिरी ढाक के तीन पात’, किसी नेता के खिलाफ कुछ नहीं हुआ।

इसी तरह से 2018 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने जनता से फिर वादा किया कि वसुंधरा राजे सरकार के आखिरी छह माह के निर्णयों की समीक्षा करेंगे। शांति धारीवाल की अध्यक्षता में कमेटी बनी, जिसमें रमेश मीणा भी थे। कमेटी को 8 मीटिंग के बाद डिसमिस कर दिया गया। रमेश मीणा ने विरोध किया तो उनको चुप रहने को बोल दिया गया।

जिस वसुंधरा राजे सरकार ने अपने आखिरी छह माह में 1067 फैसले किये, उनमें से 1059 को जायज ठहराकर पास कर दिया गया। कहने का मतलब यह है कि जैसे दो टीमों में मैच फिक्स होता है, वैसे ही दोनों नेता एक दूसरे की सरकारों को बचाने का काम करते हुए पाये जा रहे हैं।

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आईएएस अधिकारी तन्मय कुमार को रिलीव कर दिया

दिसंबर 2018 के चुनाव से पहले वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा वसुंधरा सरकार के समकक्ष ही आईएएस तन्मय कुमार द्वारा दूसरी सरकार चलाई जाने और कांग्रेस की सरकार बनने पर उनको जेल की हवा खिलाने की बातें कही गई थी।

हर 15 दिन, 1 महीने और 2 महीने में अपने सरकारी निवास पर प्रेस कांफ्रेंस करके वसुंधरा राजे सरकार और तन्मय कुमार समेत आईएएस लॉबी पर हमले करने वाले अशोक गहलोत की जब सरकार बनी तो उन्होंने ही रिलीव कर आईएएस तन्मय कुमार को सेंटर में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया।

प्रभारी मंत्रियों ने कार्रवाई की तो उनको घर बैठा दिया

सरकार गठन के बाद अशोक गहलोत सरकार ने मंत्रियों को जिलों का प्रभार दिया। जब रमेश मीणा जैसे मंत्रियों ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए कार्यकर्ताओं के लिए काम करने और ब्यूरोक्रेसी समय हेतु सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी शुरू की तो सभी मंत्रियों को वापस बुला लिया।

वसुंधरा गठबंधन के खिलाफ कार्रवाई करना चाहते थे मंत्री

खाद्य नागरिक आपूर्ति रमेश मीणा और पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह समेत कई मंत्री वसुंधरा राजे की राजनीतिक और ब्यूरोक्रेसी वाले गठबंधन के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा, लेकिन उनको चुप कर दिया गया। इस बात का जवाब खुद रमेश मीणा और विश्वेंद्र सिंह ने किया है।

सबसे बड़ा सबूत आयकर विभाग को मिली डायरी है

सूत्रों का कहना है कि जब पिछले दिनों आयकर की टीम ने गहलोत के करीबी धर्मेंद्र राठौड़ के छापेमारी की थी, तब एक डायरी हाथ लगी है, जिसमें इन चार माह के दौरान ही वसुंधरा राजे और गहलोत की मुलाकात की तारीख और समय अंकित है।

यह डायरी भले ही धर्मेंद्र राठौड़ और उसके समर्थकों द्वारा आयकर अधिकारियों से छीन ली गई हो, किंतु उसके कई पेज आयकर विभाग के पास हैं और व्हाट्सअप के जरिये भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के पास पहुंच चुके हैं।