राजस्थान की सियासी वेब सीरीज में अंतिम एपिसोड का रोमांच चरम पर

विनोद पाठक
यंग बनाम ओल्ड के बीच टसल से राजस्थान में कांग्रेस की सांसें अटक गई हैं। प्रदेश में जो कुछ हो रहा है, उसकी वेब सीरीज दिसंबर 2018 में लिख दी गई थी।

बस फाइनल एपिसोड अभी रिलीज हुआ है। जब 2018 की सर्दियों में कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में आई थी, तब जीत का श्रेय पीसीसी चीफ सचिन पायलट के सिर बंधा था, लेकिन दस जनपद के पुराने वफादार अशोक गहलोत को कुर्सी मिल गई।

कांग्रेस सूत्रों ने तब कहा था कि गहलोत ने यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोका है कि वो लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा सीटें दिला सकते हैं।

केंद्र की कुर्सी की आस में बैठे राहुल गांधी ने इसे स्वीकार कर लिया। सचिन को समय आने पर बड़ा पद देने का आश्वासन देकर शांत करे रखा।

सचिन पीसीसी चीफ बने रहे और उन्हें उप मुख्यमंत्री का लॉलीपॉप थमा दिया गया। मुख्यमंत्री न बनने की टिस पहले से सचिन के मन को कचोट रही थी।

ऊपर से गहलोत अंदर ही अंदर उन्हें निपटाने में लगे रहे। मई 2019 में लोकसभा चुनाव में भारी हार के बावजूद कांग्रेस आलाकामन ने प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन से आंखें मूदें रखीं।

खुद के बेटे की हार के बावजूद गहलोत कमजोर होने के बावजूद मजबूत होते चले गए।

सचिन अपनी ही सरकार और पार्टी में बेगाने हो गए। गृह और वित्त जैसे विभाग गहलोत ने स्वयं अपने पास रखे हुए हैं।

बैर इतना अधिक था कि दोनों नेता बामुश्किल मंच साझा करते हुए दिखते। धीरे-धीरे अविश्वास की खाई बढ़ी चली गई।

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जब राज्य का पिछला बजट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पढ़ रहे थे, तब पायलट मेज थपथपाने की औपचारिकताएं पूरी करते देखे गए थे।

बजट के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में वो नहीं आए थे। शायद सचिन के अंदर लावा उबल रहा था। गहलोत की व्यूह रचना भी बढ़ती जा रही थी।

जहां आलाकमान सचिन की नहीं सुन रहा था, वहीं गहलोत हर बार माइलेज लेते चले आ रहे थे। हताशा- निराशा ने सचिन को बागी बनने पर मजबूर किया।

राजनीति की चतुर चालों में माहिर अशोक गहलोत ने राज्यसभा चुनाव से पहले सचिन को ठीकाने लगाने का पहला बड़ा दांव खेला। स्क्रिप्ट लिखी कि विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही है।

नाम वो भाजपा का ले रहे थे, लेकिन निशाने पर सचिन ही थे। पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर कहीं सचिन समर्थक विधायकों के साथ शक्ति प्रदर्शन न कर दें, गहलोत ने विधायकों को घर बुलाकर बाड़ेबंदी में भेज दिया।

मीडिया में प्रचारित हुआ कि दौसा से तीन दर्जन विधायक मानेसर जाने वाले थे। राज्यसभा चुनाव तो किसी तरह शांति से निकल गया, लेकिन गहलोत पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

विधायकों की खरीद-फरोख्त की जांच जिस एसओजी को दी गई थी, वो तीन दिन पहले एकाएक सक्रिय हुई। गहलोत मीडिया के आगे आए और फिर भाजपा पर निशाना साधा, लेकिन इस बार भी टारगेट पर सचिन पायलट थे।

सचिन को एसओजी ने नोटिस भेज दिया। वो पूछताछ करना चाहती है। गृह विभाग चूंकि मुख्यमंत्री के पास स्वयं है तो डेढ़ साल से सचिन के अंदर उबल रहा लावा फूट पड़ा।

बौखलाए सचिन अपने समर्थक विधायकों को लेकर उड़ चले।
राजस्थान में राजनीतिक भूचाल आ गया। सचिन और कुछ विधायकों के गायब रहने पर गहलोत कैंप सक्रिय हुआ।

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उन्हें इससे सुनहरा मौका नहीं मिल सकता था। मुख्यमंत्री ने अपने घर पर विधायकों की हाजिरी लगाकर शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। दिल्ली के कांग्रेसी नेता भी सक्रिय हुए। सब कुछ गहलोत की लिखी स्क्रिप्ट के अनुसार चल रहा है।

जयपुर में गहलोत कैंप बहुमत का दावा कर रहा है तो दिल्ली से सचिन कैंप उस दावे को खारिज कर रहा है। सांप-सीढ़ी के खेल में सचिन के तेवर भी सख्त हैं।

हालांकि, आलाकमान अब समझौते के मूड में है। उसे बड़े राज्य की सत्ता जाने का भय सता रहा है। सचिन के साथ बैकडोर बातचीत जारी है। लेकिन बात अभी बनती नहीं दिख रही।

अविश्वास की खाई को शायद अब पाटा नहीं जा सकता। कांग्रेस की स्थिति आगे कुआं-पीछे खाई वाली हो गई है। ओल्ड गार्ड और यंग लीडर के बीच किसी एक का तो बलि चढ़ना निश्चित है।

यदि पायलट कांग्रेस की कॉकपिट से बाहर होते हैं तो पार्टी को भारी क्षति होगी। यदि पायलट अपनी शर्तों पर कांग्रेस के जहाज में बने रहते हैं तो गहलोत की इमेज गिरेगी।

वेब सीरीज के अंतिम एपिसोड का रोमांच अब चरम पर है और अगले 72 घंटे पार्टी और सरकार, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।