58 साल में सरकारी सेवा जॉइन की, 108 साल में स्वेच्छिक सेवानिवृत्त ली, पाक के 1200 सैनिकों पर अकेले भारी पड़े, ऐसे थे हमारे पागी

अहमदाबाद। साल 2015 में पूर्व भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने एक ऐसे भारतीय के नाम पर अपनी बॉर्डर पोस्ट का नामकरण किया है जिसका नाम था रणछोड दास। आपने भारत और पाकिस्तान के कई किस्से सुने होंगे, परन्तु आज आप जो पढेंगे वह कुछ ख़ास है।

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उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है। यह पहली बार है कि किसी आम आदमी के नाम पर किसी पोस्ट का नामकरण किया गया है। इस पोस्ट पर रणछोड़दास की एक प्रतिमा भी लगाई जाएगी।

आइये जानते है कि कौन था यह आम आदमी रणछोड़ दास रबारी ?

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे। पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है। पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे।

वर्ष 1965 में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था। इसको लेकर हुए युद्ध में हमारे 100 सैनिक शहीद हो गए थे अतः सेना की दूसरी टुकड़ी (10 हजार सैनिक) को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ भाई ने सेना का मार्गदर्शन किया था। जिसके परिणामस्वरूप सेना की दूसरी टुकड़ी निर्धारित समय पर मोर्चे पर पहुंच सकी।

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इस क्षेत्र से पूरी तरह परिचित रणछोड़ दास रबारी ने इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों की स्थिति का भी पता लगा लिया था। केवल यही नहीं , रणछोड़ दास के द्वारा पाक सैनिकों की नजर से बचकर यह जानकारी भी भारतीय सेना तक पहुंचाई थी, जो भारतीय सेना के लिए अहम साबित हुई।

रणछोड़ दास के द्वारा मिली जानकारी की सहायता से सेना ने पाकिस्तानी सैनिको पर हमला बोल विजय प्राप्त की थी। जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया। इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

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आखिर क्योँ कहा जाता है रणछोड़दास को “पगी”

‘मार्गदर्शक’ जिसे की आम बोलचाल की भाषा में ‘पागी’ कहा जाता है, वो आम इंसान होते हैं जो दुर्गम क्षेत्र में पुलिस और सेना के लिए पथ प्रर्दशक यानि रास्ता दिखाने का काम करते हैं।

रणछोड़ दास बनासकांठा पुलिस में राह दिखाने वाले (पागी) के रूप में सेवारत रहे ! जुलाई-2009 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी। विभाजन के समय वे एक शरणार्थी के रूप में आए थे। जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी का निधन हो गया था।



जनरल सैम माणेक शॉ मानते थे पागी को अपना असली हीरो, अंतिम समय में भी बार-बार लेते रहे पागी का नाम 

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जनरल सैम माणेक शॉ रणछोड दास पागी को अपना असली ‘हीरो’मानते थे। रणछोड दास पागी जनरल सैम माणेक शॉ के दिल के कितने नजदीक थे इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि ढाका में माणिक शॉ ने रणछोड़भाई पागी को अपने साथ डिनर के लिए आमंत्रित किया था।

ऐसे बहुत ही कम लोग थे, जिनके साथ माणिक शॉ ने डिनर लिया था। वर्ष 2008 में 27 जून को जनरल सैम माणिक शॉ का निधन हो गया। वे अपने अंतिम समय तक रणछोड़ पागी को भूल नहीं पाए थे।

निधन से पहले हॉस्पिटल में वे बार-बार रणछोड़ पागी का नाम लेते रहे। बार-बार पागी का नाम आने से सेना के चेन्नई स्थित वेलिंग्टन अस्पताल के दो चिकित्सक एक साथ बोल उठे थे कि ‘हू इज पागी’। जब पागी के बारे में उन चिकित्सकों को बतलाया गया तो वे भी अचंभित रह गए।

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जब रणछोड़भाई की एक थैली के लिए उतारा गया था हेलिकॉप्टर 

साल 1971 के युद्ध के बाद रणछोड़ पागी एक साल नगरपारकर में रहे थे। ढाका में जनरल माणिक शॉ ने रणछोड़ पागी को डिनर पर आमंत्रित किया था। उनके लिए हेलिकॉप्टर भेजा गया। 

हेलिकॉप्टर पर सवार होते समय उनकी एक थैली नीचे रह गई, जिसे उठाने के लिए हेलिकॉप्टर वापस उतारा गया था। अधिकारियों ने थैली देखी तो दंग रह गए, क्योंकि उसमें दो रोटी, प्याज और बेसन का एक पकवान (गांठिया) भर था।

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