वसुंधरा से दूरियां, डॉ. सतीश पूनियां से नजदीकियां, आखिर क्या मंत्र है राठौड़ का?

जयपुर।
राजस्थान विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष और पिछली वसुंधरा राजे सरकार में पंचायती राज मंत्री रहे चूरू के विधायक राजेंद्र सिंह राठौड़ आजकल वसुंधरा राजे से दूरियां और भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां से नजदीकियां बनाने के  प्रयास के कारण चर्चा में बने हुए हैं।

पिछले साल दिसंबर से लेकर अब तक राजेंद्र राठौड़ की जितनी भी राजनीतिक गतिविधियां हुई हैं, उन सब में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमेशा कहीं न कहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां शामिल रहे हैं।

दोनों नेताओं के बीच लंबी मुलाकातें और लगातार राजस्थान से बाहर रहने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से राठौड़ की बढ़ती दूरियां भाजपा के कार्यकर्ताओं में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

हालांकि, तकरीबन फरवरी 2020 के बाद वसुंधरा राजे राजस्थान में जून महीने में ही वापस आई थीं, लेकिन उससे पहले करीब सवा साल तक भी वसुंधरा राजे राजस्थान में कम ही रहीं, किंतु इससे इतर खास बात यह है कि कभी वसुंधरा राजे सरकार के नंबर एक मंत्री रहे राजेंद्र राठौड़ लगातार उनसे दूर होते जा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि इतना ही नहीं, अपितु भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के साथ हर मंच पर नजर आने वाले राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने कोरोनाकाल के दौरान लॉक डाउन में भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से डॉ. पूनियां के सम्पर्क में रहने का प्रयास ही किया है।

संघ पृष्टभूमि से न होने के कारण हमेशा संघनिष्ठ नेताओं के साथ कदमताल करने का प्रयास आरएसएस की ‘गुड लिस्ट’ में स्थान बनाने का आतुर रहने वाले राठौड़ 1990 से अब तक लगातार 7 बार विधायक रह चुके हैं।

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पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व उपराष्ट्रपति भैंरोसिंह शेखावत से लेकर वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री रह चुके राठौड़ कभी दिवराला सती प्रकरण में तो कभी धारा सिंह उर्फ दारिया एनकाउंटर मामले के चलते जेल की हवा खा चुके हैं।

जब 2013 में वसुंधरा राजे की दूसरी सरकार का गठन हुआ, तब राठौड़ राजे के सबसे करीबी मंत्री बने थे। बाद में सरकार के लगभग आधे कार्यकाल के दोरान दोनों के बीच गलतफमियां होने के बाद दोनों में दूरियां हो गईं और एक तरह से राठौड़ का डिमोशन करते हुए उनको चिकित्सा मंत्री से पंचायत राज में भेज दिया गया। इसके बाद पूरे कार्यकाल में यूनुस खान ही वसुंधरा राजे के सबसे भरोसेमंद और सरकार में नंबर एक मंत्री रहे।

दिसंबर 2018 में सत्ता से बेदखल होते ही वसुंधरा राजे हमेशा की तरह प्रदेश से अधिक दूर तो नहीं गईं, किंतु अपने पसंदीदा अध्यक्ष अशोक परनामी का अध्यक्ष पद जाने और राज्य में मदनलाल सैनी के द्वारा भाजपा द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं को तवज्जो दिए जाने पर राठौड़ को अगले पांच साल का सारा गणित समझ आ गया।

पहले से ही वसुंधरा राजे के द्वारा दूर कर दिए गए राठौड़ ने इस अवसर को अपनी सफलता में बदलने का निश्चय किया और वसुंधरा राजे के बजाए संगठन में अधिक रुचि लेनी शुरू कर दी। विधानसभा में भी वसुंधरा राजे की लगभग अनुपस्थित, खुद के उपनेता प्रतिपक्ष होने और वसुंधरा राजे द्वारा वहां रहने के दौरान भी सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलने का फायदा राठौड़ ने उठाया। नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया के कम सक्रिय रहने और कुछ अस्वस्थ रहने का लाभ भी राठौड़ को मिला।

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इसके बाद सितंबर 2019 में भाजपा ने आमेर से विधायक डॉ. सतीश पूनियां को संगठन की बागडौर सौंप दी। तभी से राठौड़ ने धीरे—धीरे अपना पूरा झुकाव डॉ. पूनियां की तरफ कर लिया। दिसंबर 2019 में डॉ. पूनियां के पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने के बाद तो मानों राठौड़ ने वसुंधरा राजे से दूरी बनाने की कसम ही खा ली।

इस बीच मार्च में कोरोना वायरस के कारण देशभर में लॉक डाउन लग गया। हालांकि, तब राज्य की तीन राज्यसभा सीटों के लिए नामांकन पत्र दाखिल कर दिये गए थे और टिकट को लेकर भी केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे की सभी पसंद दरकिनार कर डॉ. पूनियां और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह की पसंद माने जाने वाले राजेंद्र गहलोत को उम्मीदवार बना दिया।

राजनीति के पक्के जानकार राठौड़ को अब अच्छे से समझ आ गया था कि वसुंधरा राजे युग का तकरीबन अंत हो गया है। लॉक डाउन के दौरान भी जब-तब मौका मिला तो राठौड़ ने भाजपा कार्यालय में या फिर डॉ. पूनियां के घर पहुंचकर लंगी-लंबी मंत्रणाएं कीं।

इतना ही नहीं, जब पिछले माह राज्यसभा के लिए चुनाव हो रहे थे, तब वसुंधरा राजे करीब 3 माह बाद जयपुर आई थीं, राठौड़ ने वसुंधरा राजे का स्वागत करने के बजाए संगठन की मीटिंग को प्राथमिकता दी और अपने इरादे साफ कर दिए।

राठौड़ लगातार वसुंधरा राजे की छाया से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं और किसी भी सूरत में डॉ. सतीश पूनियां के पक्के सलाहकार बनने का प्रयास कर रहे हैं। जब सीतापुरा के एक निजी होटल से राज्यसभा चुनाव के लिए सभी विधायक 19 जून को वोट देने के लिए विधानसभा पहुंचे, तब भी राठौड़ अपनी अलग गाड़ी के बजाए डॉ. पूनियां के साथ ही सफर करना पसंद किया था। यहां तक कि वसुंधरा राजे के बजाए विधानसभा में भी पूरे समय डॉ. पूनियां के साथ ही रहे।

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उसके बाद से भी राठौड़ का चाहे वर्चुअल रैलियों का मामला हो, या फिर अन्य किसी तरह से मंच साझा करने का मौका हो, राठौड़ ज्यादातर समय डॉ. पूनियां के करीबी नजर आए हैं। अब, जबकि डॉ. पूनियां की कार्यकारिणी का गठन होने जा रहा है तो राठौड़ तकरीबन हर दिन किसी न किसी बहाने डॉ. पूनियां से मुलाकात करने या फिर संपर्क में रहने का ही प्रयास करते हैं।

बहरहाल, डॉ. पूनियां को जिस तरह से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अहमियत दे रहे हैं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सीधा डॉ. पूनियां से ही संपर्क कर संगठन की तमाम गतिविधियों की जानकारी लेते हैं, उससे राठौड़ को भी शायद अपने अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां की बढ़ती राजनीतिक ताकत का अंदाजा हो गया है।

यही कारण है कि राठौड़ खुद को वसुंधरा से दूरियां और अध्यक्ष डॉ. पूनियां से नजदीकियां बनाने का भरकस प्रयास कर रहे हैं। सियासत में दूरियां-नजदीकियां वैसे भी काफी कुछ मायने रखती हैं।

ऐसे में राठौड़ का वसुंधरा से दूर होना और डॉ. पूनियां के नजदीक होना भविष्य में न केवल भाजपा के लिए लाभकारी हो सकता है, बल्कि राठौड़ के राजनीतिक भविष्य के लिए भी फायदेमंद हो सकता है।