राज्यसभा चुनाव से किसको हुआ फायदा? गहलोत, पायलट, डॉ. पूनियां को? गहलोत-वसुंधरा गठबंधन फिर उजागर हुआ!

रामगोपाल जाट

राजस्थान में 19 जून को संपन्न हुई तीन राज्यसभा सीटों के चुनाव के बाद यह चर्चा एक बार फिर से चल पड़ी है कि कांग्रेस और खास तौर से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा जो लगातार 10 दिन तक बाड़ेबंदी की गई और हाई प्रोफाइल पॉलीटिकल ड्रामा किया गया, उसका फायदा किसको हुआ और नुकसान किसको हुआ?

इससे पहले कि आपको लगातार 10 दिन के राजनीतिक नौटंकी के बारे में विस्तार से बताएं, उससे पहले आपको जानना जरूरी है कि राज्य में राज्यसभा चुनाव को लेकर वोटिंग का गणित क्या रहा?

कांग्रेस पार्टी की तरफ से केसी वेणुगोपाल और नीरज डांगी के रूप में दो उम्मीदवार उतारे गए थे। संख्या बल के आधार पर कांग्रेस के पास खुद के 107 विधायक, 13 विधायक निर्दलीय कांग्रेस को समर्थन कर रहे थे। दो विधायक बीटीपी और दो विधायक माकपा के भी कांग्रेस को ही समर्थन कर रहे थे।

इसी तरह से भारतीय जनता पार्टी की तरफ से राजेंद्र गहलोत के रूप में पहला उम्मीदवार और एक रणनीति के तहत ओंकार सिंह लखावत के रूप में दूसरा उम्मीदवार मैदान में उतारा गया था। बताया गया कि कांग्रेस के अंदर की फूट को दुनिया के सामने लाने के लिए एक खास रणनीति के तहत चौथा उम्मीदवार मैदान में उतारकर चुनाव को निर्विरोध होने से बचाया गया।

भाजपा के बेहतर विधायक और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के 3 विधायकों ने भाजपा के समर्थन में मतदान किया। एक भी कांग्रेसी या फिर निर्दलीय विधायक ने क्रॉस वोटिंग नहीं की, जो लोग जिन को समर्थन दे रहे थे, वहीं पर मतदान किया गया केवल स्याही खराब होने के कारण भाजपा के एक विधायक का मत रद्द करना पड़ा।

आशा के अनुकूल परिणाम आया और कांग्रेस के दो उम्मीदवार राज्यसभा पहुंचे। इसी तरह से संख्या के आधार पर भाजपा के राजेंद्र गहलोत भी राज्यसभा पहुंचने में कामयाब हुए हैं। दूसरे उम्मीदवारों का सिंह लखावत को केवल 20 वोट हासिल हुए।

अब सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अगुवाई में कांग्रेस के विधायकों निर्दलीय विधायकों और दो अन्य छोटी पार्टियों के विधायकों को 9 जून को दिल्ली रोड स्थित एक रिसोर्ट में ठहराया गया, उसका फायदा किसको हुआ और नुकसान किस को उठाना पड़ा।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी राजनीतिक चतुराई का इस्तेमाल करते हुए 9 जून से पहले ही राज्य में बयानबाजी कर ऐसा माहौल बनाया, मानों भारतीय जनता पार्टी उनके विधायकों को खरीदने का प्रयास कर रही है और उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। इसके सबूत के तौर पर उन्होंने कहा कि उनके विधायकों को 35 करोड़ में खरीदने के लिए भारतीय जनता पार्टी ऑफर कर चुकी है।

भारतीय जनता पार्टी की तरफ से अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया के द्वारा इसका स्पष्ट शब्दों में पहली ही बार में खंडन कर दिया गया। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने एक बात जरूर कायम रखी।

उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से किसी भी पार्टी में तोड़फोड़ करने या अस्थिर करने का प्रयास नहीं किया जा रहा है, केवल अंतरात्मा की आवाज पर सभी को उनके उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने के लिए अपील की जा रही है। अपनी इस बात पर अध्यक्ष पूनिया अंतिम दिन तक कायम रहे।

इस राजनीतिक ड्रामे को हाई लेवल पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तब पहुंचाने में कामयाबी हासिल की, जब वो अपने सभी विधायकों को निर्दलीयों के साथ दिल्ली रोड पर स्थित एक निजी रिसोर्ट में ले गए। उससे पहले मुख्यमंत्री निवास पर विधायक दल की बैठक बुलाई गई। बैठक के तुरंत बाद सभी विधायकों को बस में भरकर रिसोर्ट ले गए।

देश और दुनिया के सभी पत्रकारों का ध्यान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा रचे गए इस ड्रामे पर गया। लगातार बयानबाजी की गई। मुख्यमंत्री गहलोत की तरफ से ट्वीट किए गए आलाकमान तक बातें पहुंचाई गई और ऐसा माहौल क्रिएट किया गया, मानो कांग्रेस के भीतर कोई भी विभीषण बैठा है और वह पार्टी को तोड़कर सरकार को गिराने का प्रयास कर रहा है।

उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के द्वारा यथासंभव सफाई दी गई और यहां तक की आलाकमान के साथ उनकी बातचीत भी हुई है। इस बीच अपनी मां के पैर में फ्रेक्चर के कारण उपचार के लिए जब सचिन पायलट दिल्ली गए तो इसको गहलोत भक्त मीडिया के द्वारा इस तरह से प्रचारित किया गया मानो आलाकमान ने उनको तलब किया।

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इसी दौरान कांग्रेस के विधायक भरत सिंह के द्वारा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे और कांग्रेस अध्यक्ष के नाते सचिन पायलट को पत्र लिखकर इस बात पर गहरी नाराजगी जाहिर की गई कि जिन राज्यसभा उम्मीदवारों को वो लोग वोट करते हैं, वही लोग जीतने के बाद उनको पहचानते भी नहीं हैं।

प्रदेश के खाद्य नागरिक आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा की नाराजगी ने कांग्रेस के भीतर दो ध्रुव होने की बात को बहुत साफ तरीके से स्पष्ट कर दिया। उससे पहले पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह के द्वारा शिविर में नहीं पहुंचना और उनको मनाने के लिए केंद्रीय स्तर के आधा दर्जन नेताओं को राजस्थान बुलाना, यह है भी अशोक गहलोत की रणनीति का एक हिस्सा था।

लगातार 10 दिन तक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस करने आरोप-प्रत्यारोप करने और तमाम तरह के हथकंडे अपनाने के काम किए गए पूरे राजस्थान और देशभर के राजनीतिक लोगों के द्वारा यहां पर ध्यान दिया गया। खुद राज्य सरकार के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने एसओजी के महानिदेशक को पत्र लिखकर राज्य से बाहर से आने वाले धन की रोकथाम और अपराधियों को पकड़ने के लिए अपील की गई।

मजेदार बात यह है कि कॉविड 19 की वैश्विक महामारी का सहारा लेते हुए राज्य सरकार की तरफ से बिना वजह राज्य की सीमाएं सील करने के आदेश दे दिए गए। हालांकि महज 1 घंटे के बाद ही आदेशों में संशोधन किया गया और सीमाएं सील करने के बजाय पास धारकों को बाहर जाने की अनुमति देने की बात कही गई।

राज्य सरकार की इस नौटंकी को लेकर भी अच्छी खासी मजाक उड़ाई गई। लोगों ने स्पष्ट तौर पर माना के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और उनके खास 40 विधायकों के राज्य से बाहर जाने और हरियाणा में किसी रिजोर्ट में ठहरने की राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अफवाह उड़ा कर मामले को और ज्यादा नौटंकी में तब्दील करने का प्रयास किया गया।

अलबत्ता, सचिन पायलट की तरफ से कहीं पर भी इस तरह की बयानबाजी या फिर इशारा नहीं किया गया कि वह अपने समर्थक विधायकों के साथ क्रॉस वोटिंग करने या फिर सरकार को गिराने के लिए प्रयास कर रहे हैं। फिर भी आलाकमान के समक्ष हमेशा की भांति अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को विलेन बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के द्वारा कांग्रेस की इस नौटंकी को उनकी घरेलू उपचार करार देते हुए कहा गया कि “आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों” राज्य की सरकार अपने आप गिर जाएगी।

भले ही भाजपा को इस चुनाव में कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई हो, लेकिन यह बात तो साफ है की पार्टी ने कांग्रेस के भीतर मौजूद दो धड़ों को प्रदेश के सामने लाने में जरूर सफलता हासिल की है।

2013 के विधानसभा चुनाव के बाद जब हारने के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राजनीतिक रसातल में जाना पड़ा और कांग्रेस आलाकमान के द्वारा 2014 में सचिन पायलट को राज्य की बागडोर सौंपी गई, तभी से धीरे-धीरे दोनों नेताओं के बीच राजनैतिक प्रतियोगिता बढ़ती जा रही थी।

जैसे-जैसे 2018 के विधानसभा चुनाव नजदीक है वैसे वैसे हमेशा की तरह अशोक गहलोत एक बार फिर से बयान बाजी करते और आपने भक्ति करने वाले मीडिया के द्वारा उल्टी-सीधी ख़बरें प्रकाशित करवाने का काम करने लगे थे। सचिन पायलट उम्र के तजुर्बे में भी और राजनीतिक तौर पर भी अशोक गहलोत से काफी छोटे हैं।

भले ही सचिन पायलट दो बार सांसद रह चुके थे और केंद्र में मंत्री भी रह चुके थे, लेकिन फिर भी जितनी उनकी उम्र है। उतना अशोक गहलोत का राजनीतिक तजुर्बा है। साथ ही राज्य और केंद्र के मीडिया में भी अशोक गहलोत के चाहने वालों और भक्ति करने वालों की कमी नहीं है।

इसका फायदा उठाते हुए केंद्रीय पदाधिकारी होने के बावजूद अशोक गहलोत में दिसंबर 2018 के राज्य विधानसभा चुनाव के वक्त खुद को मुख्यमंत्री के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत करने में बड़ी कामयाबी हासिल की। अध्यक्ष के तौर पर सचिन पायलट ने 5 बरस तक जो मेहनत की उस के दम पर उन्होंने भी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा बना ली थी।

चुनाव नजदीक आने के साथ ही दोनों नेताओं के बीच खुद को मुख्यमंत्री उम्मीदवार साबित करने के लिए खुलकर बयानबाजी की गई। तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी थे और उनके द्वारा दोनों को जयपुर के रामलीला मैदान में हुई रैली के दौरान सार्वजनिक रूप से गले मिलाकर गिले-शिकवे दूर करने का प्रयास किया गया, किंतु इसका कोई खास फायदा नहीं हुआ।

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राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ युवाओं में रोष किसानों और मजदूरों में गुस्सा सातवें आसमान पर था। “मोदी तुझसे बैर नहीं वसुंधरा तेरी खेर नहीं” के नारे को अमलीजामा पहनाने के लिए राज्य की जनता कमर कस चुकी थी। जिसको भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व पहचान नहीं पाया (मजबूरी भी हो सकती है) और वसुंधरा को ही मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया।

लोगों का मन कांग्रेस के लिए नहीं होने के बावजूद वसुंधरा राजे से बदला लेने और उनको सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता ने सचिन पायलट के रूप में मुख्यमंत्री देखते हुए कांग्रेस पार्टी को मतदान किया। राज्य की 200 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के हिस्से बहुमत से दो कदम दूर, 99 सीटों पर जीत हासिल हुई।

अब लड़ाई सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री बनने को लेकर हो गई। राज्य के राज्यपाल के द्वारा कांग्रेस को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया गया, लेकिन कांग्रेस पार्टी के द्वारा मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में 7 दिन का समय लगा दिया गया।

जयपुर और दिल्ली के बीच दोनों नेताओं की दौड़ दिन रात चली और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका वाड्रा की मैराथन बैठकों के बाद आखिरकार पूर्व की भांति अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ कर लिया। सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री पद पर संतोष करना पड़ा।

अशोक गहलोत के द्वारा सचिन पायलट को दी गई यह पहली राजनीतिक मात थी। उसके तुरंत बाद मंत्री पदों को लेकर भी एक बार फिर से अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को करारी शिकस्त देते हुए अपने पसंदीदा लोगों को मंत्री बनाने में कामयाबी हासिल की।

गहलोत ने खुद के पास गृह और वित्त विभाग जैसे पावरफुल विभाग रखें और सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री होने के बावजूद पंचायती राज विभाग देकर केवल मंत्री पद तक सीमित कर दिया गया।

इस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी राजनीतिक चतुराई और लंबे अनुभव का फायदा उठाते हुए राजनीति में बच्चे के समान सचिन पायलट को 1 महीने के भीतर लगातार तीसरी बार पराजय का स्वाद चखाया।

सरकार गठन के करीब डेढ़ साल के बाद हुए इस राज्यसभा चुनाव से पहले ही कई बार, चाहे कोटा में बच्चों की मौत का मामला हो, राज्य में विभिन्न गैंगरेप हो या फिर लोगों के काम नहीं होने के कारण परसादी लाल मीणा जैसी मंत्री को जनसुनवाई में पीड़ित बनकर पहुंचने का मामला हो, सचिन पायलट ने गहलोत को घेरने का प्रयास तो किया, किंतु सफलता हासिल नहीं हुई।

कहा जाता है कि उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कांग्रेस आलाकमान के वादे के मुताबिक मई 2019 के लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में सभी 25 सीटों पर मिली करारी हार के बाद भी खुद को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए मांग की गई थी, लेकिन तब तक महज 6 महीने के भीतर तमाम असफलताओं के बावजूद अशोक गहलोत आलाकमान पर हावी हो चुके थे।

सियासी चतुराई से लबरेज मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोई भी मौका अपने दुश्मन के लिए छोड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए डेढ़ साल के दौरान उनकी सरकार के खिलाफ प्रदेश में जो माहौल बना और उसके कारण संभावित तौर पर उनके मुख्यमंत्री पद जाने की चर्चा हुई, उसको खत्म करने के लिए उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी सचिन पायलट को राज्यसभा चुनाव में हाईप्रोफाइल ड्रामा करते हुए जमींदोज कर दिया।

इस दौरान कुछ मजेदार वाकय को भी उल्लेखित किया जाना बेहद जरूरी है, जो दो बार मुख्यमंत्री रहे वसुंधरा राजे और तीसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत के बीच अप्रत्यक्ष रूप से घटित हुआ है।

2020 04

साल 1998 के दौरान जब अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने और उनके कार्यकाल को बहुत बुरा बताया गया। तब 2003 में भाजपा के द्वारा राष्ट्रीय स्तर से राज्य में नेतृत्व के तौर पर वसुंधरा राजे को भेजा गया। उन्होंने गहलोत की असफलताओं का फायदा उठाया और परिवर्तन यात्रा के द्वारा प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया।

अशोक गहलोत सरकार की असफलताओं के कारण वसुंधरा राजे ने आसानी से सरकार बनाने का काम किया। 2003 में पहली बार राजस्थान में पूर्ण बहुमत की भाजपा वाली सरकार बनी। हालांकि उसके बाद इन दोनों नेताओं के बीच जो अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीतिक गठबंधन बना, वह आज तक बदस्तूर जारी है।

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वर्ष 1998 से लेकर आज तक लगातार 22 साल से एक बार अशोक गहलोत, एक बार वसुंधरा राजे, फिर से एक बार अशोक गहलोत, फिर से एक बार वसुंधरा राजे और अब 2018 में फिर से एक बार अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं, किंतु कभी भी सीधे तौर पर दोनों नेताओं ने एक दूसरे पर हमला नहीं किया।

यहां तक कि 2003 में वसुंधरा राजे के द्वारा, 2008 में अशोक गहलोत के द्वारा, 2013 में वसुंधरा राजे के द्वारा और 2018 में फिर से अशोक गहलोत के द्वारा प्रतिद्वंदी मुख्यमंत्री और सरकार के ऊपर भ्रष्टाचार के जमकर आरोप लगाए गए, लेकिन दोनों नेताओं ने एक भी मामले में एक दूसरे की जांच नहीं करवाई।

राजस्थान की राजनीति को गहराई से और लंबे समय से जानने वाले कहते हैं कि इन दोनों नेताओं के बीच पर्दे के पीछे गठबंधन है और राजनीतिक तौर पर दोनों नेता एक दूसरे के प्रति सगे भाई बहन की तरह व्यवहार करते हैं। शायद यही कारण है कि दोनों ने आज तक बीते 22 साल में कभी भी एक दूसरे की सरकार कि उच्च स्तरीय जांच करवाने का फैसला नहीं लिया है।

अब बात करते हैं राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के दौरान किसको फायदा हुआ और किस को नुकसान हुआ? मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जो राजनीतिक नौटंकी शुरू की थी, उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को आलाकमान की नजर में अविश्वसनीय, गद्दार और बागी नेता के तौर पर परिभाषित करते हुए अपने पूरे प्लान से उन्होंने 100% लाभ लिया।

सचिन पायलट, जो कि पिछले 6 साल से राज्य कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं, उनकी इन 6 साल के दौरान यह है छठी बड़ी हार है। अब तक उन्होंने सभी पराजय को स्वीकार करते हुए अशोक गहलोत से जीतने के लिए कोई राजनीतिक ब्रह्मास्त्र चलाने का प्रयास भी नहीं किया है।

करीब 7 महीने पहले पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले डॉ सतीश पूनिया को राज्य भाजपा की कमान सौंपी गई थी। पिछले 17 साल के दौरान यह पहला अवसर है जब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक ओरे से बाहर निकलते हुए भाजपा ने किसी ऐसे व्यक्ति को पार्टी का नेतृत्व सौंपा है, जो पूरी तरह से आरएसएस माइंडेड हैं और संगठन के प्रति डेडीकेट हैं।

भले ही आज दिन तक सतीश पूनिया ने अपने कार्यकारिणी का गठन नहीं किया, लेकिन जिस तरह से कोविड-19 की वैश्विक महामारी के दौरान पिछले 3 महीने की तालाबंदी के बावजूद प्रदेश के एक लाख कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क करके अध्यक्ष के तौर पर खुद को मजबूत संगठनकर्ता के रूप में परिभाषित और केंद्रीय नेतृत्व के सामने साबित करने में कामयाबी हासिल की है।

बताया जाता है कि राज्यसभा के पहले उम्मीदवार के तौर पर राजेंद्र गहलोत केंद्रीय नेतृत्व की पसंद थी। लेकिन प्रदेश की कथित तौर पर खंडित सरकार की कमजोरी को सार्वजनिक करने के लिए ओंकार सिंह लखावत के रूप में पार्टी का दूसरा उम्मीदवार उतारने की रणनीति डॉ सतीश पूनिया की ही थी।

जिसका नीति के साथ सतीश पूनिया ने ओंकार सिंह लखावत को उम्मीदवार बनाया और पूरे चुनाव को निर्विरोध होने से बचाने के साथ ही राज्य के अशोक गहलोत सरकार व कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे दो धड़ों को सार्वजनिक करके अपनी रणनीति को अमलीजामा पहनाया, उससे साफ तौर पर डॉ सतीश पूनिया की यह 100% जीत कही जा सकती है।

इस चुनाव के दौरान वरिष्ठ राजनीतिज्ञ होने के बावजूद जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को एक तरफा खेलने के लिए छोड़ा और पूरी रणनीति से खुद को दूर रखा, उससे सम्भवतः भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट तौर पर समझ लिया है कि अब वसुंधरा राजे पर राजनीतिक रुप से विश्वास नहीं किया जा सकता है।

राजनीतिक विशेषज्ञों की बात पर भरोसा करें तो आने वाले 2023 से पहले भले ही अशोक गहलोत की सरकार सत्ता से बेदखल नहीं हो, लेकिन यह तो स्पष्ट हो गया है कि पहली बार बात तो कांग्रेस को जीत हासिल नहीं होगी और दूसरी बात राजस्थान में नेतृत्व पूरी तरह से बदलकर वसुंधरा राजे के बजाए अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के हाथ में जाने वाला है।