अथिति लेख: ‘आहार के सात सूत्र’


आयुर्वेद की संहिताओं में में आहार पर विशाल वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध है।आहार, रसायन और औषधियों का संयोजन हमें स्वस्थ रखने और रोगों का शमन करने के लिये अपरिहार्य है।

आधुनिक वैज्ञानिक शोध द्वारा भी प्रमाणित हो चुका है कि मानव-शरीर में फ्री-रेडिकल्स के बढ़ने से होने वाला ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, और शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द या इन्फ्ल्मेशन, दो ऐसे मूल कारक हैं जो मानव शरीर के क्षय और अंततः मृत्यु का कारण बनते हैं। यदि इन दोनों कारकों को नियंत्रित कर लिया जाये तो जरा-व्याधि या ऐज-रिलेटेड पैथोजेनेसिस को टाला जा सकता है।

वैज्ञानिक शोध से यह भी सिद्ध हो चुका है कि आयुर्वेद-सम्मत भोजन और रसायन एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटीइन्फ्लेमेटोरी भूमिका मज़बूती से निभाते हैं। आज की चर्चा पुनः भोजन के नित्य उपयोग में ली जा सकने वाली बातों पर केन्द्रित है।

आहार का कार्य क्या है? आहार से संतुष्टि, तत्क्षण शक्ति, और संबल मिलता है, तथा आयु, तेज, उत्साह, याददाश्त, ओज, एवं पाचन में वृद्धि होती है। भोजन से प्राप्त होने वाला ओज जीने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। 

ओजस के क्षय हो जाने से भय, दुर्बलता, चिंता, अकर्मण्यता, पीड़ा, निरुत्साह, निस्तेज इन्द्रियाँ, शरीर की चमक में फीकापन, मन में दुःख, चेहरे में शुष्कता, और दमदार आवाज में कमी आ जाती है।

ओजस हृदय में पाया जाता है और ओजस का नाश होने से शरीर विनष्ट हो जाता है। इस दिशा में सात बातें हमें प्रतिदिन ध्यान में रखना आवश्यक है।

1. शरीर की स्थिति को देखते हुये समुचित मात्रा में ही आहार लेना चाहिये। पूर्व में खाया हुये भोजन के पच जाने पर, समुचित मात्रा में, ताजा और स्निग्ध भोजन, न बहुत तेज गति से और न बहुत धीमी गति से, तन्मयतापूर्वक भोजन करना चाहिये। 

भोजन का समय और माहौल का ध्यान रखना जरूरी है। भोजन करने के पूर्व शरीर के समस्त आवेग शान्त होना चाहिये। मन प्रसन्न व निर्मल हो। अपने स्वाभाविक भोजन-समय से बहुत पहले या बाद में भोजन अनुचित है।

रात में भोजन नहीं करना चाहिये। आधुनिक विज्ञान में हुये शोध, अनुभवजन्य ज्ञान एवं शास्त्रोक्त विचारों को एकीकृत करते हुये वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह मान लेना उचित होगा कि ग्रीष्मकाल में रात्रि 8.00 बजे, शरदऋतु में 7.00 बजे एवं वर्षा ऋतु में सूर्यास्त के पूर्व ही भोजन करना हितकारी होगा।

यथासंभव जमीन पर सुखासन या पालथी लगा कर, अपनों के साथ, प्रसन्न मन से संतुलित, पोषक और स्वादिष्ट और मात्रापूर्वक भोजन ही स्वास्थ्यकर है।

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2. आहार की मात्रा व प्रकार, और इन दोनों के संदर्भ में शरीर की तत्क्षण और दीर्घकालिक क्षमता, ये चारों बहुत महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

भोजन हितकारी, पोषक और संतुलित होना जरूरी है पर अपनी पाचन शक्ति को देखते हुये ही ग्रहण किया जाये।

भोजन में छः रसों—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, व कसाय—का होना आवश्यक है। उदाहरण के लिये, शालि व साठी चावल, मूंग आदि भले ही शीघ्र पचने वाले होते हैं परंतु इन्हें भी ठूँस-ठूँस कर खा लिया जाये तो पाचन में कठिनाई होती है।

इसके विपरीत रोटी, पूड़ी, हलवा, गुड़, चीनी, दूध से बनी रबड़ी, खोवा, तिल, उड़द आदि स्वभाव से गरिष्ठ होते हैं, किन्तु समुचित या अल्प मात्रा में ग्रहण करने पर यह भी पच जाते हैं।

लघु या हलके तथा सुपाच्य खाद्य पदार्थ वायु व अग्नि गुण प्रधान होने के कारण पाचकाग्नि को प्रदीप्त करने वाले स्वभाव के होते हैं और इन्हें तृप्तिपूर्वक खा लेने पर भी बहुत अधिक दोष उत्पन्न नहीं होते।

किंतु गुरू या गरिष्ठ द्रव्य पृथ्वी तथा सोम गुण की अधिकता होने के कारण अग्नि को उदीप्त नहीं कर पाते, अतः जब तक कठोर व्यायाम से अग्नि-बल बढ़ा न लिया गया हो, तब तक इन्हें तृप्तिपूर्वक खाते ही दोष खड़े होने लगते हैं।

अतः गरिष्ठ भोजन खाने से पूर्व अपने अग्नि-बल की हैसियत का खयाल रख लेना चाहिये।

आचार्य चरक ने कहा है कि गरिष्ठ भोजन को पेट के आधे भाग की तृप्ति तक ही लेना चाहिये।

लघु पदार्थों को भी उचित मात्रा में ही खाना चाहिये, क्योंकि समुचित मात्रा में किया गया भोजन ही हमें बल, वर्ण, सुख तथा आयु प्रदान करता है।

पीठी की तरह गूंथे गये आटे व उड़द आदि की पीठी से बना हुआ भोजन भी गरिष्ठ होता है।

अतः भोजन करने के पश्चात् पीठी से निर्मित व्यंजन, चावल या चेवड़ा आदि को अत्यल्प मात्रा में ही खाना चाहिये। असल में बहुत तेज भूखे होने पर ही इस प्रकार के खाद्य पदार्थों का लेना उचित रहता है।

सुखाई हुई सब्जियाँ, कमल की जड़, कमल की नाल आदि भी गुरू द्रव्य हैं, अतः इनका सेवन भी निरंतर नहीं करना चाहिये।

दही या छाछ के साथ दूध को पका कर या फटे हुये दूध से बनाये गये बनाये गये व्यंजन, एवं छैना, दही, उड़द, ज़ई आदि को भी लगातार प्रतिदिन नहीं खाना चाहिये।

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3. आयुर्वेद में भोजन व्यक्ति-व्यक्ति की स्थिति, प्रकृति, एवं ऋतुओं के आधार पर तय होता है।

उदाहरण के लिये, सूखे मेवे, आलू, टमाटर, सेब, मटर, चना आदि वात को कुपित करते हैं, इसलिये वात प्रकृति के लोगों को इन पदार्थों को कभी-कभार ही लेना चाहये।

जबकि मीठे फल, जैसे अंगूर, केला, संतरा, नारियल, व लाल चावल वात प्रकृति के लोगों के लिये लाभकारी हैं।

इसी प्रकार अधिक मसालेदार भोजन, मूंगफली का तेल, खट्टे फल, केला, पपीता, टमाटर, लहसुन आदि पित्त दोष को कुपित करते हैं।

जबकि, आम, संतरा, नाशपाती, हरी सलाद आदि पित्त दोष को शान्त करते हैं।

इसी प्रकार केला, नारियल, खजूर, पपीता, अनन्नास व विभिन्न दुग्ध-उत्पाद कफ को कुपित करते हैं, जबकि सूखे मेवे, अनार, सफ़ेद चावल, अंकुरित अनाज आदि कफ प्रकृति के लोगों के लिये उपयोगी रहते हैं।

4. शालिधान्य, गेहूं, जौ, साठी चावल, वनों में मिलने वाले खाद्य, हरड़, आमला, दाख-मुनक्का, परवल, मूंग, खांड, घी, वर्षा का स्वच्छ जल, दूध, मधु, अनार, सैन्धव लवण, और आँखों की ताक़त बढ़ाने के लिये रात में मधु और घी के साथ त्रिफला का सेवन किया जाना चाहिये।

इसके साथ ही स्वास्थ्य की रक्षा के लिये या रोगों से मुक्ति के लिये जो भी उपयोगी आहार हो उसे लिया जा सकता है। 

अनुभव के अनुसार जिन पदार्थों के सेवन से स्वास्थ्य ना बिगड़े या कोई नया रोग उत्पन्न नहीं हो, उन्हें खाया जा सकता है।

नियमित भोजन में ऐसे द्रव्यों को भी थोड़ी मात्रा में शामिल किया जा सकता है जो आहार, रसायन और औषधि, तीनों ही प्रकारों में वर्गीकृत हैं।

विविध प्रकार व विविध रंगों के स्थानीय मौसमी फल, अनार, खजूर, द्राक्षा या मुनक्का, बादाम, तिल, आँवला, लहसुन, सोंठ, कालीमिर्च, पिपली, हल्दी, केसर, जीरा, धनिया, शहद, गुड़, एवं त्रिफला आदि ऐसे द्रव्य हैं जिनका थोड़ा सेवन उपयोगी रहता है। 

वर्षा से संग्रहित किया हुआ साफ जल ही सबसे उत्तम माना जाता है। भोजन के अंत में पानी पीना हानिकारक है। जरूरी हो तो अत्यल्प मात्रा में ही लेना चाहिये।

5. कुछ खाद्य पदार्थ पकाने के बाद देर तक रख देने पर, बासी हो जाने पर या स्वरुप बदल जाने के बाद नहीं खाये जाने चाहिये। 

हालाँकि इनकी सूची लम्बी है, पर सारांश में देखें तो ठंडा होने पर पुनः गर्म किया हुआ भोजन, सूख जाने के बाद पानी मिलाकर पुनः गीला किया हुआ भोजन, व कांसे के पात्र में कई दिनों तक रखा हुआ घी नहीं खाना चाहिये। 

अधपका, दुर्गन्धयुक्त, जला हुआ, स्वाभाविक रंग से भिन्न, पानी छोड़ चुके, बहुत नमक-युक्त, या बार बार गरम किया हुआ बासी भोजन खाना हानिकारक है।

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गरम की हुई शहद, या शहद लेने के बाद गरम पानी पीना, रात्रि में दही या अधिक मिठाई, भोजन के अंत में मीठा और शुरुआत में तिक्त और कटु पदार्थ, या गर्म पेय के तुरंत बाद ठंडा जल वर्जित हैं।

6. कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे भी हैं जो प्रायः एक दूसरे के साथ नहीं खाये जा सकते। 

दही व छाछ के साथ केला, नमक के साथ दूध, गुड, पिप्पली, शहद व कालीमिर्च के साथ पूड़ी, उड़द की दाल के साथ मूली, दही व दूध के साथ मूली, बासी या सूखी मूली, खट्टे फलों के साथ दूध, खीर, खोया, मलाई, या दूध के साथ खिचड़ी और अल्कोहल, खीर के साथ छाछ, दही के साथ खजूर, कमल-ककड़ी के साथ अंकुरित अनाज, शहद के साथ खजूर और अल्कोहल नहीं लेना चाहिये।

बराबर मात्रा में घी को शहद के साथ, या शहद, घी, वसा, तेल और जल को एक साथ मिलाकर नहीं खाना चाहिये।

वैज्ञानिक शोध में पाया गया है कि ग्रीन चाय के साथ दूध, चाय के साथ लहसुन, अनार-रस के साथ अंगूर-रस, हरे टमाटर और आलू के साथ अल्कोहल बिलकुल नहीं लेना चाहिये।

7. आयुर्वेद के इतिहास में 5000 वर्षों के दौरान लिखे किये गये अनेकानेक ग्रंथों को खंगाल डालने पर कहीं भी पिज्ज़ादिवर्ग, बर्गरादिवर्ग, कुर्कुरादिवर्ग, फिंगरचिप्सादिवर्ग, या मैग्यादिवर्ग जैसे आहार द्रव्यों का वर्णन नहीं प्राप्त होता।

अतः आयुर्वेद के जन्मदाता समाज के मध्य इनका उपयोग वर्ष में एकाध दो बार स्वाद बदलने के लिये ही किया जाना हितकारी हो सकता है। 

तथाकथित-व्यंजनों के नाम पर बाज़ार में उपलब्ध कचरा-भोजन या जंक-फूड के भरोसे ओजस का सत्यानाश हो रहा है।

यदि हम आयुर्वेद में दी गयी सलाह के अनुसार अपना भोजन लें तो ओजस और शरीर को नष्ट होने से बचा सकते हैं। 

युक्तिपूर्वक तय किये गये आहार व विहार अपने आप में औषधि एवं रसायन भी हैं।

उदहारण के लिये, जब हमारा भोजन पथ्य-अपथ्य, हिताहार-अहिताहार, जठराग्नि की अनुकूलता, प्रकृति, विकृति, ऋतु, काल, स्थान और रस के पैमाने पर सघन परीक्षण के पश्चात शरीर में जाता है तो आहार, रसायन और औषधि के मध्य सैद्धांतिक अंतर की खाईं पट जाती है।

आत्म-नियंत्रित रहकर हितकारी खायें, नपा-तुला खायें, समय पर खायें और व्यायाम करें। स्वस्थ रहेंगे।
 
डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)