वीर सावरकर: भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले पहले अंतरराष्ट्रीय भारतीय नायक थे

    वीर सावरकर एक अकेले ऐसे मनुष्य थे, जिन्हें आजीवन कारावास की दो बार सजा सुनाई गई थी और उनके द्वारा रचित पुस्तक “स्वतंत्रता समर-1857” एकमात्र ऐसी पुस्तक थी, जिसका शीर्षक इत्यादि पता ना होने के बाद भी उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

    अंग्रेजी सरकार में उनका खौफ़ सा छा गया था। इतनी उच्च कोटि की रचना थी, जिसे मात्र पढ़कर ही मनुष्य या कोई भी व्यक्ति क्रांतिकारी हो सकता था और आजादी के लिए मर मिटने तक को तैयार हो सकता था।

    वह अपनी बातों से ही लोगों में जोश भर दिया करते थे। उनकी जब पुस्तक लिखी गई तो वह मराठी में लिखी गई थी। जिसका पांडुलिपि विदेशों में ले जाकर फिर उसके प्रति लिपियां छपाई गई थी।

    अंग्रेज सरकार ने कहा थी कि जो भी उसके लेखक का पता करता उसे बड़ा ईनाम देने तक की घोषणा कर चुकी थी कि वह कहां छप रही है।

    उन्होंने बहुत सी संभावनाएं लगाई थी कि वह वहां छप रही है, वहां छप रही है, परंतु उसे गुप्त रूप में छापा गया और वह गुप्त रूप में भारत लाई गई जो भी व्यक्ति विदेश से भारत आता था, जलमार्ग से उसके बक्से में नीचे यह छुपा कर लाई जाती थी और क्रांतिकारी से रातों-रात  पढ़ लेते थे।

    भगत सिंह ने भी इसके पढ़ने का वर्णन किया है और जब उनकी गिरफ्तारी हुई थी तो उनके पास इसका एक बहुत बड़ा स्टॉक मिला था। यह पुस्तक क्रांतिकारियों की गीता बताई गई है।

    1857 में हुए सारे अत्याचारों और डलहौजी द्वारा किए गए अकल्पनीय अत्याचारों के बारे में इसमें साफ शब्दों में लिखा गया है, जो कि वीर सावरकर विदेश में जाकर ब्रिटिश म्यूजियम ऑफ लाइब्रेरीज में अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा लिखित सत्य लिखे हैं।

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    उन्होंने लगभग 2 वर्ष तक वहां अध्ययन किया और सभी जानकारियां जुटाकर उस पर पुस्तक लिख डाली। जब इन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई तो वहां भी इन्होंने अंडमान और निकोबार की जेल में जिसे काला पानी की सजा काटते हुए भी। वहां पर इन्होंने दीवारों पर अपने नाखूनों नाखूनों से दीवार पर कविताएं और बहुत सी रचनाएं लिखी, जो भी प्रसिद्ध हैं।

    बीजेपी और आरएसएस ने इस अबको बहुत ही अच्छा मानती है। इसी कारण कांग्रेस और अन्य इसका विरोध करते हैं।

    वह उग्र स्वभाव के थे और उनका मानना यह था कि आजादी भीख में नहीं मिलती, उसे छीन लिया जाता है और कांग्रेस उनपर लांछन लगाती है कि यह हिंदू मुस्लिमों भाईचारे के खिलाफ थे।

    वह बिल्कुल गलत है। वह ऐसा मानते थे कि दोनों धर्मों को एक साथ आकर एक समान हो कर किसी के भी नेतृत्व में यह लड़ाई लड़नी चाहिए और आजादी छीन लेनी चाहिए बस।

    इन्होंने एक बार काला पानी की सजा में अंग्रेज सरकार ने यह प्रस्ताव दिया कि अगर वह माफी मांग लेते हैं तो उनकी सजा खत्म कर दी जाएगी।

    उन्होंने जेल से निकलने के लिए माफी मांगी थी, जिसे कि कांग्रेसी जैसा कि सब जानते हैं, एक छोटी सी बात को बहुत बड़ी बना देते हैं, उसी के पीछे उन्हें गलत साबित करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने जो भी अच्छे कार्य किए आजादी के लिए जो लड़ाई लड़ी क्रांतिकारियों की तरह जिए अपने जीवन में संघर्ष किया उस सब को भुला देते हैं।

    वह सिर्फ अपना आइडियल पंडित जवाहरलाल नेहरु इत्यादि को ही मानते हैं, जिन्होंने इन सब में बहुत ही कम सहयोग दिया जो बैठे बैठे और उसे कार्य करवाते थे और आप आराम किया करते थे।

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    वह विदेशों विदेशों में मौज मस्ती किया करते थे और जब बारी आई प्रधानमंत्री बनने की तो स्वयं प्रधानमंत्री बन गए। जब उन्हें सावरकर की छवि खराब करनी होती है वामपंथी और कांग्रेसियों को तो उन पर गांधी की हत्या का आरोप भी लगा देते हैं।

    वो कह देते हैं कि सबूतों की कमी के कारण उन्हें कोर्ट ने बरी कर दिया था, जब कांग्रेसी और वामपंथियों के पास कोई चारा नहीं रहता तो वह ऐसे ही बहाने बहाने बनाने लगते हैं।

    जैसा कि अटल बिहारी वाजपेई ने कहा है कि वह बहुत ही बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वह एकदम सही प्रतिफलित होती है, उनकी पुस्तक में उनके विचारों को पढ़कर ऐसा बिल्कुल अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह ऐसे कार्य कर सकते हैं।

    वह एक बहुत ही बड़े देश प्रेमी व्यक्ति थे और वह जो भी करते थे देश के हित के लिए करते थे, देश के लिए करते थे, अपना एजेंडा चलाने के लिए कुछ लोगों ने बदनाम किया करते हैं और झूठे लांछन लगाते हैं।

    वे प्रथम भारतीय थे, जिन पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में मुकदमा चला था। उनकी अकेली किताब ने पूरी अंग्रेज सरकार को हिला कर रख दिया था।

    वो बहुत ही उच्च कोटि के रचनाकार भी थे। इन्होंने बहुत सी रचनाएं की हैं, जिन रचनाओं को कागज और पेन की कमी भी नहीं रोक पाई। इन्होंने अपने नाखूनों से दीवारों पर रचनाएं की है, वह अंडमान और निकोबार की जेल में मजूद हैं।

    इन्होंने 1857 की क्रांति को, जिसे एक मामूली सिपाही विद्रोह बताया गया था, उसे उसकी छवि से बाहर निकालकर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य युद्ध के आसन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

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    इन्हीं की पुस्तक से अंग्रेजों को अपने ही घर में भारतीय राष्ट्रवाद के उग्र रूप का साक्षात्कार हुआ था। आजाद हिंद फौज में इनकी पुस्तक की भारी भूमिका रही।

    आजाद हिंद फौज के मूल संस्थापक रामबिहारी बॉस क्रांति पथ पर सावरकर को अपना गुरु मानते थे। सुभाष चंद्र बोस वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे और स्वतंत्रता प्राप्ति की उनकी रणनीति से सहमत थे।

    द्वितीय विश्वयुद्ध द्वारा उत्पन्न स्थिति का लाभ उठाने के लिए जनवरी 1941 में ब्रिटिश सरकार की आंखों में धूल झोंक कर भारत से विदेश पलायन के 6 महीने पूर्व 22 जून 1940 को इन्होंने मुंबई में सावरकर के निवास स्थान पर उनसे गुप्त मंत्रणा की थी।

    अतः यह भी कहा जा सकता है कि आजाद हिंद फौज के गठन और ब्रिटिश विरोधी रणनीति की प्रेरणा राम बिहारी बोस में सुभाष चंद्र बोस को सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक से ही प्राप्त हुए थे।

    उसी को आदर्श रूप में मानकर नेताजी ने रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया था। आजाद हिंद फौज के सेना अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस पुस्तक का एक संस्करण विशेष रूप से छपवा कर सैनिकों को पढ़ने के लिए दिया जाता था।

    अंत में उनके विचार जो थे, वह बताना चाहूंगा “स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार भले हो पराजय यदा-कदा पर मिले विजय हर बार”

    अमित चौधरी, उभरते हुए युवा लेखक