विचार: क्या 130 करोड़ आबादी वाले देश को 20 लाख करोड़ के इस पैकेज से उबार पाएंगे हम?

कोविड-19 से उपजे आर्थिक हालातों से उबरने के लिए 12 मई को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में “आत्मनिर्भर भारत अभियान” के तहत 20 लाख करोड़ के एक बड़े आर्थिक पैकेज (जीडीपी का लगभग 10%) का ऐलान किया।

प्रधानमंत्री ने इस पैकेज में 4 एल- लैंड, लेबर, लिक्विडिटी तथा ला ( कानून) पर विशेष बल दिए जाने का संकल्प जताया था।

साथ ही यह भी संकल्प जताया कि इस आर्थिक पैकेज के माध्यम से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के पुनर्जीवन के माध्यम से रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाएंगे।

जिससे कोविड संकट में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले श्रमिकों एवं किसानों को एक बड़ी राहत मिलेगी।

इसके उपरांत वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार 5 लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके 20.97 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज में 4 दर्जन से भी अधिक घोषणा की तथा इस आर्थिक पैकेज को आपदा को अवसर में बदलने वाला करार दिया।

किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व इस बड़े आर्थिक पैकेज के विभिन्न पक्षों का बारीकी से विवेचन करना आवश्यक हो जाता है।       

इस लंबे चौड़े आर्थिक पैकेज कि 5 किस्तों को संक्षेप में इस प्रकार से समझा जा सकता है।

इसकी पहली किस्त में कुल 5.94 लाख करोड़ के पैकेज में मुख्यतः सूक्ष्म,लघु व मध्यम उद्योगों को तीन लाख करोड़ का ऋण तथा बिजली कंपनियों को ₹90000 करोड की राज्यों द्वारा ऋण गारंटी का प्रावधान किया गया।

साथ ही एमएसएमई क्षेत्र के सुधार की कई नीतिगत घोषणाऐं की गई।

दूसरी किस्त में कुल 3.1 लाख करोड़ रुपए के पैकेज में प्रवासी श्रमिकों को 2 माह का मुफ्त राशन तथा किसानों के लिए 2.30 लाख करोड रूपए के ऋण पैकेज की घोषणा की गई।

तीसरी किस्त में लगभग 1.5 लाख करोड़ के पैकेज में कुल 11 घोषणाऐं हुई।

जिसमें से 8 का संबंध कृषि व पशुपालन क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में सुधार से तथा शेष तीन प्रशासनिक सुधार से संबंधित थी। इसमें एक लाख करोड़ का एग्रोटेक फंड का प्रावधान किया गया।

चौथी व पांचवीं किस्त में कोयला, खनन विमानन, अंतरिक्ष से लेकर शिक्षा एवं सार्वजनिक उपक्रमों से संबंधित बुनियादी नीतिगत सुधारों की घोषणा की गई।

साथ ही इसमें मनरेगा के लिए 40000 करोड रुपए के अतिरिक्त बजट की घोषणा की गई।

इस प्रकार लगभग 20 लाख करोड़ के इस पैकेज में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पूर्व में लगभग 8 लाख करोड़ की तरलता बनाए जाने के संदर्भ में उठाए गए कदमों को एवं भारत सरकार द्वारा पूर्व घोषित 1.71 लाख करोड़ के पैकेज को भी सम्मिलित माना गया।     

भारत सरकार द्वारा घोषित इस आर्थिक पैकेज सही प्रकार से समझने हेतु विश्व के अन्य देशों में कोविड संकट के दौरान घोषित आर्थिक पैकेजो पर दृष्टिपात करना बेहतर होगा।

इस संकट से उबरने के अमेरिका ने अपनी कुल जीडीपी का लगभग 10% अर्थात 2.7 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। जो भारत की कुल जीडीपी के लगभग बराबर है।

जिसके तहत वहां के वयस्कों को $1200 ( ₹92000) तथा बच्चों को $500 ( ₹38000)एकमुश्त दिया गया है। जापान ने अपनी जीडीपी का लगभग 21 प्रतिशत आर्थिक पैकेज दिया है।

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जिसके तहत प्रत्येक नागरिक को लगभग एकमुश्त $930 (₹71000) रुपए दिए गए हैं साथ ही छोटे व मझोले उद्योगों में कार्य करने वाले श्रमिकों के वेतन का दो तिहाई भार जापान सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।

ब्रिटेन में कोविड-19 से प्रभावित उद्योग धंधो को विगत 3 वर्षों के औसत लाभ का 80% सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी गई है जो ब्रिटेन की जीडीपी कि 10% से अधिक है।

लगभग इसी प्रकार की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता अधिकांश राष्ट्रों द्वारा अपने नागरिकों को उपलब्ध करवाई गई है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में कोविड-19 के आर्थिक पैकेजो में 30.7% केस ट्रांसफर वाली योजनाएं हैं। ये सभी आर्थिक पैकेज बजटीय खर्चों से अतिरिक्त हैं।

इन सब का मुख्य उद्देश्य कोविड से प्रभावित नागरिको को तात्काल आर्थिक राहत उपलब्ध करवाना एवं नगदी के प्रवाह को बढ़ाकर मांग को सृजित करना है। जिससे कि अर्थव्यवस्था की मंद हुई गति को पुनः पटरी पर लाया जा सके।       

भारत सरकार द्वारा आर्थिक पैकेज को सरल भाषा में चार वर्गों में वर्गीकृत करके समझा जा सकता है।

पहला– कुल आर्थिक पैकेज का लगभग तीन चौथाई हिस्सा मौद्रिक उपायों के माध्यम से अलग-अलग क्षेत्रों में ऋण उपलब्ध करवाकर तरलता बढ़ाने से संबंधित है।

उल्लेखनीय है कि अभी तक भारत में रिजर्व बैंक द्वारा तरलता नियंत्रित करने हेतु किए जाने वाले मौद्रिक नीति के उपायों को इस आर्थिक पैकेज में राजकोषीय नीति के रूप में घोषित किए जाने की नई परंपरा प्रारंभ की है।

दूसरा– आर्थिक पैकेज कि अधिकांश घोषणाऐं सरकार के दीर्घकालिक नीतिगत निर्णय से संबंधित है।

जैसे कृषि के बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करना, कृषि में e- मार्केटिंग व कॉन्ट्रैक्ट खेती को प्रोत्साहन देना, कृषि उत्पादों के अंतर्राज्य व्यापार को बढ़ाना, अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित कोल,रक्षा एवं अंतरिक्ष आदि क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोलना, सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार से संबंधित नीति की घोषणा, एमएसएमई की परिभाषा को परिवर्तित करना आदि।

तीसरा– इस पैकेज की बहुत सारी घोषणाएं पूर्व में बजट घोषणाओं की पुनरावृति के रूप में की गई है जैसे- एक राष्ट्र एक राशन कार्ड योजना को जून 2019 केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान द्वारा घोषणा की जा चुकी थी।

मत्स्य संपदा योजना के तहत 20000 करोड रुपए की घोषणा इस वर्ष के बजट में नीली उत्पादन क्रांति के नाम से की जा चुकी थी।

इसी वर्ष के बजट में टमाटर, प्याज एवं आलू आदि को मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिए 500 करोड़ रुपए की घोषित टॉप योजना को नए नाम टॉप टू टोटल योजना के नाम से घोषित किया गया है।

इसी प्रकार पूर्व में बजट में घोषित कृषि भंडारण व खाद्य प्रसंस्करण को सुदृढ़ करने, हर्बल खेती के प्रोत्साहन अथवा पशु टीकाकरण योजना को पुनः इस आर्थिक पैकेज में घोषित किया गया है। यद्यपि उपर्युक्त किसी भी योजना में बजट की राशि में वृद्धि नहीं की गई है । इ

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स पैकेज में आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 संशोधन का प्रावधान किया गया है। वस्तुतः यह घोषणा भी लोकसभा चुनाव से पूर्व स्ट्रेटजी फॉर न्यू इंडिया नामक दस्तावेज में की जा चुकी थी।

चौथा- इस वर्ग में उन घोषणाओं को रखा जा सकता है जिनका प्रत्यक्ष संबंध प्रभावित श्रमिकों व किसानों से है।

जिसके अंतर्गत प्रवासी श्रमिकों को बिना राशन कार्ड आगामी 2 माह तक प्रतिमाह 5 किलोग्राम अनाज पर 1 किलोग्राम दाल प्राप्त होगी।

मनरेगा के बजट आवंटन में 40000 करोड रुपए की वृद्धि से ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अतिरिक्त कार्य दिवस सृजित किए जा सकेंगे।

₹50000 तक शिशु लोन के ब्याज पर 2% की छूट दी गई है जिस पर कुल 1500 करोड रुपए का खर्चा आएगा।

निश्चित रूप से ही इस वर्ग में आने वाली घोषणाऐं शहरी प्रवासी श्रमिकों एवं ग्रामीण गरीब वर्ग को जरूर आंशिक रूप से राहत प्रदान करेगी।

इस प्रकार इस 20.97 लाख करोड़ के इस आर्थिक पैकेज के संदर्भ में आर्थिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि पूर्व की बजटीय घोषणाओं को निकाल दिया जाए तो यह भारत सरकार की संचित निधि से भारत की जीडीपी के 1% से भी कम खर्च हो रहा है।

जो अलग-अलग आकलनों में 1.5 से 2 लाख करोड़ के बीच अनुमानित किया जा रहा है।         

उपरोक्त तथ्यात्मक रूप से विश्लेषण से यह निगमित होता है कि सरकार के इस आर्थिक पैकेज में मुख्य बल कई वर्षों से लंबित दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों लागू करना एवं कई प्रकार के ऋणों के माध्यम से अर्थव्यवस्था में तरलता को बढ़ाकर मांग सृजित करने पर है जिससे कि आर्थिक विकास की गति को पटरी पर लाया जा सके।

लेकिन सरकार की इस रणनीति पर विशेषज्ञों द्वारा गहरी आपत्ति दर्ज की जा रही है।

विशेषज्ञों का यह मानना है कि इस कोविड़ संकट से पूर्व ही भारतीय अर्थव्यवस्था रसातल में पहुंच चुकी थी।

जहां आर्थिक गतिविधियों में विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं के बावजूद ऋण लिए जाने की प्रवृत्ति निरंतर कम हो रही थी।

यही कारण है कि आरबीआई के तरलता बढ़ाने के विभिन्न प्रयासों के बावजूद भी बैंकों द्वारा लोगों को ऋण वितरित किए जाने के स्थान पर, बैंक अपनी गैर निष्पादित अतिरिक्त धन को पुनः आरबीआई में ही रिवर्स रेपो रेट के तहत जमा करवा रहे थे।

वर्तमान संकट में जब लोगों के हाथों में नगदी नहीं होगी, तो ऐसी स्थिति में छोटे व मझोले उद्योग के उत्पादन की खपत कैसे होगी।

ऐसी स्थिति में आखिर कैसे इस क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों के लिए अधिक ऋण लिए जाने की कल्पना की जा सकती है ?

गौरतलब है कि बैंकिंग व्यवस्था पहले से ही अत्यधिक एनपीए से ग्रसित है।

सरकार की अतिरिक्त जोखिम भरी ऋण योजनाओं से बैंकिंग क्षेत्र में और अधिक एनपीए बढ़ने कि संभावना रहेगी।

अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से ही पहले से ही दबाव में चल रहा बैंकिंग सेक्टर और अधिक संकट से घिर जाएगा।      

दूसरी ओर इस पैकेज में घोषित किए गए  दीर्घकालिक लंबित आर्थिक सुधारों व आरक्षित क्षेत्रों के निजीकरण के लिए वर्तमान कोविड संकट का समय बिल्कुल भी उचित नहीं कहा जा सकता।

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क्योंकि अपर्याप्त तैयारी एवं बिना पर्याप्त बहस एवं आम सहमति के आर्थिक सुधारों के परिणाम अनियंत्रित व अनपेक्षित भी हो सकते हैं।

जिसके नकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को कई वर्षों तक प्रभावित कर सकते हैं।

इस समय भारत सरकार का पूरा ध्यान कोविड संकट से उबारने पर होना चाहिए ना की दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों पर।

आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए अर्थव्यवस्था को एक बार पटरी पर आने का इंतजार किया जाना बेहतर होगा।

इस पैकेज में औद्योगिक घरानों को एक साल तक दिवालिया घोषित नहीं करने एवं अपनी डिफॉल्ट की सूचना देने वालो को डिफॉल्टर घोषित नहीं करने जैसे प्रावधान भी किए गए हैं जिनका संदेश निश्चित रूप से ही अच्छा नहीं जाएगा।

इस प्रकार की घोषणाओं का यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कोविड संकट की आड़ में सरकार औद्योगिक घरानों को अत्यधिक रियायत देने व उनकी अवैध गतिविधियों को वैधानिकता प्रदान करने की कोशिश कर रही है।           

कोविड संकट न केवल अर्थव्यवस्था के समक्ष एक गंभीर संकट है बल्कि यह एक मानवीय त्रासदी भी है।

इस समय भारत सरकार को आर्थिक नफा नुकसान के स्थान पर मानवीय दृष्टिकोण से अधिक सोचने की आवश्यकता है।

निश्चित रूप से ही सरकार को इस समय इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित किसान ,श्रमिकों व छोटे व्यापारियों को इस प्रकार से आर्थिक सहायता दिए जाने की आवश्यकता है जिससे तात्कालिक रूप से उन्हें इस संकट से राहत प्राप्त हो।

जिससे एक ओर उनकी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो व दूसरी ओर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो।

कई अन्य देशों के समान छोटी औद्योगिक इकाइयों के श्रमिकों के वेतन का यथासंभव भार सरकार को वहन करना चाहिए। समाज के इस बड़े वर्ग के हाथों में नगदी देकर मांग को सृजित किया जा सकता है।

इसके लिए मनरेगा योजनाओं में प्रति परिवार कार्य दिवसों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर क्रियान्वयन पर भी निगरानी रखनी होगी।

कोविड संकट में गिरती हुई खपत के कारण दूध, फल सब्जी अंडे इत्यादि में हो रहे आर्थिक घाटे की भरपाई तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करने जैसे छोटे प्रयास ही किसानों के लिए तात्कालिक रूप से संकट से उबरने में अधिक मददगार साबित होंगे।

कमजोर आर्थिक स्थितियों से जुझ रहे राज्यों को इस आर्थिक पैकेज में एक बड़े आर्थिक सहयोग की अपेक्षा थी जिसे पूरा नहीं किया गया।

कोरोना संकट से फ्रंट लाइन पर लड़ रहे राज्यों के संदर्भ में भी भारत सरकार को गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

उस मध्यम वर्ग के बारे में भी सोचना होगा जो कोविड संकट में अपना रोजगार खो चुका है लेकिन जो न तो किसी सरकारी योजना के लाभार्थी के रूप में सम्मिलित है तथा न हीं अपनी मजबूरी का प्रदर्शन कर सकता है।

सी.बी. यादव, सहायक प्रोफेसर, राजस्थान विश्वविद्यालय

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