जयपुर जेल में बरपा कोरोना कहर जिम्मेदार कौन?

    प्रताड़ना के डर से दब जाये,सत्यता उजागर करने की अपनी चिर-परिचित शैली से हट जाये,कहर जितना ढहे वो अंधकार नहीं आ सकता। जो मानवीयता के वाहक आलोक को दबा सकता।

    आज पूरा विश्व एक ही बात से थर्रा रहा है। अमेरिका से लेकर युगांडा तक इस समय केवल कोरोना को ही राष्ट्र के अस्तित्व के समक्ष चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।


    हमारा भारत भी इससे अछूता नहीं है, केन्द्र सरकार से लेकर सभी राज्य सरकारें अपनी अपनी गाइडलाईनें ला रही हैं, और देश तथा अपने अपने राज्य के निवासियों को बचाव के तरीके सुझा रही है।

    लेकिन फिर भी अदूरदर्शिता के कारण घट रही कुछ अनचाही घटनाऐं संवेदनशील भारतीय मस्तिष्क में प्रश्न भी उठा रही हैं कि जिम्मेदार कौन?

    बड़े ही कटु शब्दों में साहस के साथ यह कह रहा हूं कि बात लोकतंत्र और मानवता की होती है, लेकिन कभी कभी कार्यशैली निरंकुश और स्वतंत्र हो जाती है।

    और जिस मानवता की बात सभी करते हैं वही मानवता इस वैश्विक आपदा के समय कानून के सामने बौनी नजर आती है।

    हाल ही में एक ऐसा ही
    बहुत संवेदनशील विषय सभी के संज्ञान में आया है कि कोरोना का कहर राजस्थान की राजधानी जयपुर के जिला जेल और केंद्रीय कारागृह में एकदम से बरपा है जयपुर जिला जेल में 423 कुल कैदियों में से 124 कोरोनापॉजिटिव आ चुके हैं।


    जनमानस के दिमाग में प्रश्न यही है कि जब बन्द जेल का यह हाल हो सकता है तो हमारा क्या होगा?


    राजस्थान के मुख्यमंत्री अपनी संवेदनशीलता को हमेशा अभिव्यक्त करते नजर आते हैं, लेकिन इस तरह के दुखद घटनाक्रम या तो कार्यशैली पर या फिर नीतियों के क्रियान्वयन पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

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    एक जागरूक नागरिक और सामाजिक विश्लेषक होने के आधार पर यही है मेरा मुख्यमंत्री और राजस्थान सरकार से सवाल कि क्या उक्त घटना के जिम्मेदारों पर भी होगी कोई कार्यवाही या फिर कर दे जनता भी नजरंदाज??


    श्रीराम से लेकर सम्राट अशोक, महात्मा बुद्ध तक के उदाहरण बताते हैं कि मानवतावादी दृष्टिकोण के मद्देनजर राजपाट त्याग दिये जाते हैं लेकिन आज की परिस्थितियों में शासक और प्रशासक शायद मानवता की परिभाषा ही बदलना चाहते हैं।

    इसी वजह से इस तरह के हादसे हो जाते हैं, जो हमेशा के लिये प्रश्नचिन्ह छोड़ जाते हैं, लेकिन ना जाने क्यूं फिर भी इग्नोर किये जाते हैं।


    आज चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो, प्रिंट मीडिया हो या सोशल मीडिया हो, सूचना तंत्र इतना प्रखर हो चुका है कि समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी यह पता तो चल जाता है कि एक कैदी के कारण 124 लोगों के जीवन पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है, लेकिन फिर भी जिम्मेदार कौन यह बात कोई नहीं करना चाहता है आखिर क्यों?


    मैं यही कह पाऊंगा की इस तरह की विश्वव्यापी विडंबना में आम जनमानस में स्वमेव मानवीयता सबसे पहले नजर आती है, लेकिन शायद कभी कभी निर्लज्जता उस पर भारी हो जाती है और ऐसा ही नजर आया जब जयपुर जेल में कोरोना विस्फोट का समाचार सुर्खियों में आया।


    बात जिम्मेदारी की हो रही है हम सभी विचार करें तो जिम्मेदार भी मिल जायेगें लेकिन सरकार की दृष्टि में आ पायेंगे या फिर जैसी सड़क वैसी चाल की तर्ज पर इग्नोर कर दिये जायेगें ? यही है एक आम नागरिक का प्रश्न।

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    प्रोजेक्ट सृजन


    सभी को विदित है कि पांच दिन पहले ही जिला जेल में भेजे गये एक अवैध शराबबेचान के आरोपी से पूरा कारागृह संक्रमित हुआ है।

    लेकिन फिर मेरा प्रश्न वही है कि जहां एक तरफ जन जागरूकता के नाम पर सरकार करोड़ों रुपया खर्च कर मास्क लगाने, आम जनता से अपनी जांच कराने, दूसरे राज्य से आने वाले प्रवासी मजदूरों की कोरोना जांच करने की बात कर रही है।

    राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री 6 करोड़ लोगों की जांच पूरी किए जाने की बात करते हैं। ऐसे समय में क्या वह न्यायाधीश सजा सुनाते समय यह भी तय नहीं कर सकते थे कि कैदी को जेल में स्थानांतरित करने से पहले उसकी स्वास्थ्य जांच के दौरान कोरोना टेस्टिंग भी की जाए?


    इतना ही नहीं राजस्थान सरकार के अटार्नी जनरल क्या यह महसूस नहीं कर सकते थे कि एक नए कैदी को जब उस परिसर में भेजा जाए तो सावधानी के मद्देनजर ही कोरोना की जांच भी करवाई जाए?


    हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि अपराधी अगर अपराध करता है तो अपराध की सजा पाता है लेकिन सजा पूरी होने के बाद अगर सुधर जाता है तो फिर से समाज में स्थान पाता है यानी कि जेल में बंद कैदी भी मानव ही कहलाता है।

    माना किसी दानवी प्रवृत्ति के आगोश में आकर वह अगर कोई कुकृत्य करता है तो उसकी भी सजा पाता है और इसीलिए मानव होने के बाद भी वो निश्चित अवधि के लिए जेल में जाता है।

    जो 128 कैदी संक्रमित पाए गए हैं, उन्होंने अपनी सजा सुनते समय कभी यह सोचा नहीं था कि यह सजा उन्हें मौत से रूबरू कराएगी और फांसी ना होने के बाद भी जीवन खोने का दर्द दे जाएगी।

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    लेकिन अगर जेल में सुधार हेतु बंद उन लोगों के प्रति नीतिनिर्धारकों और क्रियान्यवयनकर्ताओं का ऐसा नजरिया सामने आता है तो यह जरूर आम जनता का प्रश्न बन जाता है जिसका जवाब पूरा राजस्थान अपनी राज्यसरकार से चाहता है।


    क्या मुख्यमंत्री इस पर संज्ञान लेंगे और जिम्मेदारों पर कार्रवाई कर जननायक होने का अपना प्रमाण जनता के समक्ष पेश करेंगे?


    कभी कभी असावधानी में जो हादसे घट जाते हैं उनकी यादें भले धुंधली हो जाएं पर उनका असर ताउम्र बना रहता है। यह असर इतना गहरा होता है कि आपकी सोच और समझ को प्रभावित करता है और आपके निर्णय लेने की क्षमता को भी।


    मुख्यमंत्री और सरकार के जवाब की प्रतीक्षा में है राजस्थान की जनता लेकिन कब तक??


    (डॉक्टर आलोक भारद्वाज )
    स्वतंत्र राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक जयपुर राजस्थान