आयुर्वेद में है कोरोना का उपचार, भारत में शुरू होगा आयुर्वेद का नया युग!

-कोविड-19 से बचाव व चिकित्सा हेतु आयुर्वेद में क्लिनिकल ट्रायल भारत का ऐतिहासिक निर्णय है

वर्ष 2019 के अंत में चीन के वुहान में कोरोनोवायरस रोग-2019 या कोविड-19 नामक एक नया रोग उत्पन्न हुआ। कोविड-19, सार्स-कोव-2 नामक वायरस के कारण होता है।

कोविड-19 को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एक महामारी घोषित किया गया है और यह दुनिया भर में तेज गति से फैल रहा है।

वैसे तो अधिकतर रोगी 1 से 3 सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। पर उनमें से लगभग 5 प्रतिशत लोग गंभीर स्थिति में पहुँच जाते हैं जो अंततः तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम (एआरडीएस) की स्थिति लाती है|

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प्रेरक तस्वीर।

इस स्थिति में मृत्यु भी संभव है। अभी दुनिया की किसी चिकित्सा पद्धति में इस बीमारी की कोई प्रमाण-आधारित औषधि नहीं खोजी जा सकी है; केवल सहायक देखभाल उपलब्ध है|

लेकिन जब तक किसी औषधि और वैक्सीन की खोज न हो जाये तब तक हाथ पर धरे तो नहीं बैठा जा सकता|

अतः आयुर्वेद सहित विश्व की सभी चिकित्सा पद्धतियों में पूर्व से उपलब्ध ऐसी औषधियों की पहचान आवश्यक है जो अन्य उपयोगों के लिये उपलब्ध, विकसित और अनुमोदित हैं पर कोविड-19 में भी उपयोगी हो सकती हैं। यह कार्य उतना आसान नहीं है जितना प्रतीत होता है|

एक रोचक बात साझा करने की इच्छा है| मार्च 2020 की बात है| मेरा मन एक बात को लेकर बड़ा खिन्न था|

उद्विग्नता इसलिये भी थी कि आज से 51 वर्ष पहले छः साल की उम्र में आयुर्वेद से हम दिल लगा बैठे और यह स्नेह आज तक छूट नहीं पाया|

बात यह थी कि हालांकि कोविड-19 की अभी तक आधुनिक चिकित्सा पद्धति में कोई औषधि नहीं खोजी जा सकी है|

परन्तु जब बात कोविड-19 से बचाव और चिकित्सा की आई तो आयुर्वेद को यह कहकर किनारे कर दिया गया कि इस पद्धति में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है|

मेरे मन में एक तर्क बार बार आया कि प्रमाण तो आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी नहीं है, फिर आयुर्वेद के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? इस चिंता को मैंने अपने साथी और देश के प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्य प्रोफेसर संजीव रस्तोगी से साझा किया|

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प्रेरक तस्वीर।

डॉ. रस्तोगी राजकीय आयुर्वेद कॉलेज, लखनऊ में कायचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर हैं| उन्होंने आगे अपने गुरु और आयुर्वेद के धुरंधर विद्वान पद्मश्री प्रोफेसर राम हर्ष सिंह जी विचार-विमर्श किया|

पद्मश्री प्रोफेसर राम हर्ष सिंह जी वर्तमान में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ईमेरिटस हैं। हमारा निष्कर्ष था कि कोविड-19 जैसी बीमारी जिसमें अभी तक कोई औषधि ज्ञात नहीं है उसमें एलोपैथी को तो मौका दिया गया कि वह चिकित्सा करें किंतु आयुर्वेद को बिल्कुल किनारे कर दिया गया।

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जिस पद्धति ने भारत को 5000 साल तक स्वस्थ रखा, उस पद्धति को एक ऐसी पद्धति के सामने नीचा देखना पड़ रहा था जिसका इतिहास डेढ़ सौ साल पुराना भी नहीं है।

हम तीनों ने संहिताओं, साइंस और अनुभव को एकीकृत करते हुये कोविड-19 से बचाव के साथ उपचार हेतु आयुर्वेद का एक प्रोटोकॉल तैयार किया|

प्रस्ताव में लोगों को संक्रमण और पैथोजेनेसिस की अवस्था के अनुसार वर्गीकृत करते हुये चिकित्सा व्यवस्था प्रस्तावित की गई।

शीघ्र ही यह शोध-विश्लेषण आयुर्वेद के क्षेत्र में सर्वाधिक प्रतिष्ठित शोध-पत्रिका “जर्नल ऑफ़ आयुर्वेदा एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन” में प्रकाशित हुआ।

ध्यान दीजिये, अब भारत में कोविड-19 और आयुर्वेद को लेकर कुछ और भी पेपर्स प्रकाशित हुये हैं, लेकिन वे सभी कोविड-19 से बचाव पर हैं|

चिकित्सा पर हमारा सबसे पहला और अभी भी अकेला विश्लेषण है| प्रकाशन के बाद इस शोध-विश्लेषण को भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा गठित टास्क फ़ोर्स को भी प्रस्तुत किया गया|

आज हमें यह कहते हुये बड़ी प्रसन्नता है कि कोविड-19 से बचाव एवं चिकित्सा हेतु भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के सचिव और देश के प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्य पद्मश्री वैद्य राजेश कोटेचा के नेतृत्व में, भारत के प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों के सहयोग से, आयुर्वेद में क्लिनिकल ट्रायल्स का प्रारंभ किया जाना भारत का ऐतिहासिक निर्णय है|

यह स्वाभाविक है कि हमारे जैसे बहुत लोग, विशेषकर भारत के पांच लाख वैद्य, आयुर्वेद की उपेक्षा से चिंतित थे| पर इस विषय को लेकर आयुष मंत्रालय में भी गहन चिंतन-मनन चल रहा था|

यह इस बात से स्पष्ट होता है कि आयुष मंत्रालय ने लोगों को अपना व्याधिक्षमत्व या इम्यूनिटी बढ़ाने के लिये उच्चकोटि के सुझाव प्रकाशित किया है।

इन सुझावों को देश के 16 प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्यों ने प्रस्तावित किया था। लेकिन स्वस्थ लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा एक बात है, और जो लोग इस बीमारी में फंस चुके हैं उनकी चिकित्सा दूसरी बात है।

इस परिप्रेक्ष्य में कोविड-19 की प्रोफायलैक्सिस तथा थेराप्यूटिक दोनों पहलुओं पर क्लिनिकल ट्रायल्स का प्रारंभ होना महत्वपूर्ण बात है|

हमें प्रसन्नता इस बात की भी है कि हमारे शोध-विश्लेषण में सुझायी गयी चार औषधियों को क्लिनिकल ट्रायल में शामिल किया गया है|

ये क्लिनिकल ट्रायल्स उच्चकोटि के वैज्ञानिक समन्वय का भी उदाहरण हैं| इनमें आयुष मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की संयुक्त पहल बहुत उपयोगी है|

अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत के सबसे बड़े निकाय, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और भारत के सर्वोच्च स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ आयुष मंत्रालय शामिल है|

इसके लिये टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जिसने अध्ययनों के लिये प्रोटोकॉल तैयार किये हैं| देश के विभिन्न अग्रणी संगठनों के वैज्ञानिकों द्वारा सभी प्रकाशित और प्रस्तुत स्रोतों का गहन अध्ययन और समीक्षा कर अश्वगंधा, यष्टिमधु, गुडुची, पिप्पली और एक पॉली हर्बल फॉर्मूला (आयुष -64) पर क्लिनिकल ट्रायल किया जा रहा है|

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यहाँ मेरे लिये व्यक्तिगत प्रसन्नता की बात यह भी है कि मेरे द्वारा 40 वर्षों की निरंतर शोध के पश्चात विकसित की गयी औषधियों में अश्वगंधा, यष्टिमधु, गुडुची, पिप्पली आदि का प्रमुखता से उपयोग किया गया है|

उदाहरण के लिये जेरलाइफ-एम तथा जेरलाइफ-डब्लू में अन्य द्रव्यों के साथ ये चारों भी प्रयुक्त की गयी हैं|

क्लिनिकल ट्रायल्स में कुछ की संक्षेप में चर्चा उपयोगी रहेगी| कोविड-19 महामारी के दौरान वैद्यों, डॉक्टरों और नर्सिंगकर्मियों में संक्रमण का जोखिम बहुत बढ़ जाता है|

इस सभी में सार्स-कोव-2 के खिलाफ प्रोफाईलैक्सिस के लिये हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और अश्वगंधा के मध्य तुलनात्मक प्रभाविता का परीक्षण किया जायेगा|

इसके साथ ही आयुर्वेद-आधारित रोगप्रतिरोधी द्रव्यों के लोगों के मध्य पारंपरिक प्रयोगों को समझने हेतु जनसंख्या आधारित पारंपरिक अध्ययन भी किया जा रहा है|

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इससे उच्च जोखिम वाली आबादी में कोविड-19 संक्रमण की रोकथाम में आयुर्वेदिक औषधियों, द्रव्यों और दखल के प्रभाव का अध्ययन होगा।

देश भर में 25 राज्यों में आयुष मंत्रालय के अधीन चार अनुसंधान परिषदों और राष्ट्रीय संस्थानों और कई राज्यों के माध्यम से यह अध्ययन किया जायेगा|

इस अध्ययन में लगभग पांच लाख लोगों के आंकड़े प्राप्त किया जाना प्रस्तावित है|

इस अध्ययन से कोविड-19 जैसी महामारी के उपचार में आयुर्वेद की क्षमताओं के आंकलन और वैज्ञानिक प्रमाण-आधार को सुदृढ़ करने में सहायता मिलेगी।

आयुष संजीवनी एप्लिकेशन के माध्यम से कोविड के उपचार में आयुष स्वीकार्यता के प्रभाव का आकलन भी होगा|

आयुष मंत्रालय द्वारा विकसित इस ऐप के जरिए 50 लाख लोगों का आंकड़ा एकत्रीकरण का लक्ष्य रखा गया है।

यह डेटा कोविड-19 की रोकथाम के लिये आयुष चिकित्सा प्रणालियों के उपयोग की स्वीकृति तथा जनसंख्या के बीच इसके प्रभावों के आकलन में काफी उपयोगी साबित होगा।

यहाँ कुछ बातें समझना आवश्यक है| कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि आयुर्वेद की संहिताओं में लिखी गयी बातें स्वयंसिद्ध हैं और किसी क्लिनिकल ट्रायल की आवश्यकता नहीं है|

यहाँ हमें समझना होगा कि ज्ञान की सीमायें अनंत हैं| दुनिया की प्रत्येक विधा की भाँति आयुर्वेद में भी देश, काल और वातावरण में हुये परिवर्तनों के अनुरूप निरंतर वैज्ञानिक शोध के द्वारा नवीन ज्ञान के उत्पादन और उपयोग की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक ज्ञान की व्यापकता को तिलाञ्जलि देकर आयुर्वेद का विकास संभव नहीं है। व्यापक वैज्ञानिक प्रमाणों की उपेक्षा किसी विषय को कालांतर में अप्रासंगिक बना सकती है। वस्तुतः संहिताओं, शोध और अनुभव की त्रिवेणी के संगम में उपजा ज्ञान ही समकालीन आयुर्वेद को वैश्विक परिदृश्य में दृढ़तापूर्वक सुस्थापित करने में सक्षम है|

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हाँ, यह बात अवश्य है कि यहाँ हम उस शोध की बात नहीं कर रहे हैं जो रिडक्शनिस्ट एप्रोच के अनुसार की जाये| हम यहाँ उस शोध की बात कर रहे हैं जो आयुर्वेद की समग्रता को अक्षुण्ण रखते हुये की जाये|

एक बात और है| अभी तक आयुर्वेद में प्रकाशित शोधपत्रों का लेखा-जोखा ध्यान में रखते हुये हमारा यह मानना है आयुर्वेद में जहाँ एक ओर उच्चकोटि के क्लिनिकल ट्रायल्स की आवश्यकता है वहीं यह भी सही है कि समकालीन परिदृश्य में आयुर्वेद के प्रति नकारात्मकता के मूल कारक विज्ञान से सम्बंधित न होकर आर्थिक और वित्तीय अधिक हैं।

आज सम्पूर्ण विश्व में तथाकथित आधुनिक औषधियों और क्लिनिकल जाँच-पड़ताल का व्यापार व बाज़ार नैतिकता-अनैतिकता की सीमाओं को तिलांजलि दे चुका है।

एक चेतावनी वैद्यों के लिये भी है| अब शुरुआत हो चुकी है| लेकिन, आयुर्वेदाचार्यों को समकालीन समाज के स्वास्थ्य-परिदृश्यों और चुनौतियों को स्वीकार करने के लिये स्वयं को सक्षम बनाना होगा|

हमें एक ऐसी प्रमाण-आधारित चिकित्सा प्रणाली प्रस्तुत करने के लिये स्वयं को तैयार करना होगा जो वैश्विक समाज को स्वस्थ रख सके|

संहिताओं की उपादेयता अक्षुण्ण है, किन्तु जब तक हम आधुनिक शोध के प्रकाश में सिद्धांतों और औषधियों को जांचने-परखने के लिये तैयार नहीं होते तब तक हम किनारे किये जाते रहेंगे|

इस बात को गाँठ बैठाने का समय आ गया है| विश्व की हर चिकित्सा पद्धति और उसमें निहित यथार्थ ज्ञान का सम्मान कीजिये। सभी पद्धतियों का जन्म मानवता के सेवार्थ ही हुआ है।

आयुर्वेद आज ऐसे मोड़ पर है जहाँ विश्व भर में बॉयो-मेडिकल पद्धतियों द्वारा संचारी व गैर-संचारी रोगों को रोक पाने में निरंतर और व्यापक असफलता के कारण वैश्विक समाज को एक बार पुनः आयुर्वेद की ओर गंभीरतापूर्वक देखने का अवसर प्राप्त हुआ है।

दरअसल, आधुनिक चिकित्सा पद्धति की इस असफलता ने आयुर्वेद को दुनिया भर में पुनर्प्रतिष्ठापन का एक विशेष अवसर दिया है। सार्थक शोध से मुंह मोड़कर इस अवसर को गवां देना भारत की ऐतिहासिक भूल होगी|

इस दृष्टि से भारत सरकार के आयुष मंत्रालय और विशेष रूप से आयुष मंत्रालय में सचिव पद्मश्री डॉ. राजेश कोटेचा के नेतृत्त्व में कोविड-19 से बचाव व चिकित्सा हेतु आयुर्वेद में क्लिनिकल ट्रायल का प्रारंभ भारत का ऐतिहासिक निर्णय है|

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)