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बुधवार, जून 3, 2020

‘जननी’ की मौत पर भी नहीं डिगा चिकित्सा सैनिक ‘राम’ का हौसला, मां का अंतिम संस्कार छोड़कर मरीजों की सेवा चुनी

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नेशनल दुनिया डेस्क

करीब 33 साल पहले बने धारावाहिक रामायण का एक बार फिर से दूरदर्शन पर प्रसारण हो रहा है। पुराने लोग एक बार फिर से इसको देख रहे हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के द्वारा अपने पिता के वचनों को निभाने के लिए 14 वर्ष का वनवास भोगने के कठिन कार्य को देख रहे हैं। जिनको पहले रामायण देखने का अवसर नहीं मिला था, वो भी राम के कर्तव्य पथ से सीखने का प्रयास कर रहे हैं।

जिस तरह से राष्ट्र की सेवा करने के लिए हमारी सेनाओं मैं फौजी कर्तव्य पथ पर डटे रहते हैं। उनके घर परिवार में होने वाली अनहोनी घटनाओं के वक्त भी कई बार उनको पहुंचने का अवसर नहीं मिलता है।

ठीक ऐसे ही आज कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ी जा रही इस वैश्विक जंग में कई चिकित्सा सैनिक ऐसे हैं, जिनका हौसला उनके परिवार में हो रही अनहोनी के बावजूद भी नहीं डिग रहा है।

जब किसी के परिवार में कोई दुखद घटना होती है और व्यक्ति अपने सबसे अजीज को खो देता है, तब उसपर किसी भी तरह के ज्ञान असर नहीं होता है, व्यक्ति सारे बंधन तोड़ कर पहले परिजनों के पास पहुंचता है।

किंतु ऐसे सैनिक, जो कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी से लोगों की जान बचाने में जुटे हुए हैं, उनके लिए कोई भी विपरीत परिस्थिति कर्तव्य पथ से डिगने की स्थिति दिखाई नहीं देती है।

देश के कई अस्पतालों में डॉक्टर, नर्सिंगकर्मी, वार्ड बॉय, लैब टेक्नीशियन और दूसरे सभी स्टाफ कई दिनों से अपने घर नहीं गए हैं, अपने परिजनों से नहीं मिले हैं, लगातार 24 घंटे रोगियों की सेवा करने में जुटे हुए हैं।

कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ने वाला सवाई मानसिंह चिकित्सालय का ऐसा ही एक बहादुर चिकित्सा सैनिक है राममूर्ति मीणा। करौली के रानोली गांव का रहने वाले राममूर्ति जयपुर स्थित सवाई मानसिंह चिकित्सालय के आइसोलेशन वार्ड में पिछले 1 साल से कार्यरत हैं।

सवाई मानसिंह चिकित्सालय के आइसोलेशन वार्ड में आईसीयू के नर्सिंग इंचार्ज राममूर्ति मीणा की मां का निधन 30 मार्च को हो गया, बावजूद इसके उन्होंने अपने ड्यूटी नहीं छोड़ी। राममूर्ति ने एक सैनिक की भांति 24 घंटे अस्पताल में मरीजों की सेवा करने में बिता दिए।

ऐसा नहीं है कि राममूर्ति अपनी मां के निधन पर भी उनके अंतिम संस्कार में जाने के इच्छुक नहीं थे। वह बताते हैं उनको इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा कि मां के अंतिम संस्कार में नहीं जा पाया, लेकिन कोरोनावायरस से पॉजिटिव मरीजों की सेवा करना ज्यादा महत्वपूर्ण है, जबकि पूरा देश इस महामारी से लड़ रहा है।”

राममूर्ति कहते हैं कि उनकी पत्नी बच्चे सभी गांव में हैं। उनके भाइयों ने कहा था की कोरोनावायरस से पीड़ित मरीजों की सेवा करना बेहद जरूरी है, गांव में मां के निधन पर अंतिम क्रिया से लेकर सभी कार्य को संभाल लेंगे, सबसे पहले मरीजों की सेवा जरूरी है। राममूर्ति बताते हैं कि परिवार के इसी हौसले के कारण उनकी हिम्मत बढ़ गई। अब राममूर्ति खुद 14 दिन के क्वॉरेंटाइन में हैं।

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Ram Gopal Jathttps://nationaldunia.com
नेशनल दुनिया संपादक .

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