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मंगलवार, जनवरी 26, 2021

जब सिंधिया राज्य का सामंत बना मुख्यमंत्री तो माधवराव ने छोड़ दी थी कांग्रेस…

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—माधवराव सिंधिया ने अटलजी से 101 रुपए की रशीद कटवाकर जनसंघ की सदस्यता ली थी…

रामगोपाल जाट
मध्य प्रदेश की राजनीति में मंगलवार को जो अमंगल कार्य हुआ, ना तो वह नया है, और ना ही उस कार्य को अंजाम देने वाले नए हैं। यहां की राजनीति हमेशा ही उतार चढ़ाव से भरी हुई रही है। राज्य की राजनीति में जितना दखल अन्य नेताओं का रहा है, उतना ही यहां के ग्वालियर राजपरिवार का रहा है।

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ग्वालियर राजपरिवार का आज भी चंबल ग्वालियर क्षेत्र की 29 सीटों पर खासा दबदबा है। इन 29 सीटों में से 20 सीटें कांग्रेस के पास हैं। हालांकि, गुना की सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए थे, लेकिन उससे पहले पांच साल तक संघर्ष कर 2018 के वक्त राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने में सिंधिया का बड़ा हाथ है।

ठीक ऐसे ही, जैसे राजस्थान में पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट का हाथ रहा है। हालांकि, दोनों ही नेताओं को करीब करीब एक ही तरह से ट्रीट किया गया। जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ तो और भी बुरी तरह से सियासत हुई। अब वो दम घुटने की बात कहकर कांग्रेस छोड़ गए हैं।

सबसे पहले यह जानना जरुरी है कि सिंधिया परिवार मूल रुप से राजनीतिक तौर पर कांग्रेस का है, या फिर भाजपा का है? क्योंकि इसको समझे बिना सिंधिया खानदान को समझना मुश्किल है। माधवराव सिंधिया की मां और भाजपा की संस्थापक सदस्यों में से एक विजयाराजे सिंधिया हमेशा भाजपा में रहीं।

भाजपा की स्थापना से पहले वो जनसंघ में रहीं। साल 1982 में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अन्य समेत विजयाराजे ने मिलकर भाजपा की स्थापना की थी। बाद में उन्होंने अपनी बेटी वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे को भाजपा में शामिल कर दिया, लेकिन बेटे माधवराव सिंधिया को भाजपा में नहीं ला सकीं।जब सिंधिया राज्य का सामंत बना मुख्यमंत्री तो माधवराव ने छोड़ दी थी कांग्रेस... 1

उससे भी पहले माधवराव जनसंघ के सदस्य रहे थे। उनको साल 1971 के दौरान 23 फरवरी को अटल बिहारी वाजपेयी ने 101 रुपये की रशीद काटकर सदस्यता दी थी। उन्होंने ग्वालियर जिले में ही मुरार मंडल में सदस्यता ली थी। वह रशीद मध्य प्रदेश में सियासी ड्रामे के साथ फिर से सामने आ गई है।

बाद में कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। यह बात 17 अगस्त 2018 की है, जब अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उसी दिन मंच पर वसुंधरा राजे ने माधवराव सिंधिया के बेटे और खुद को भतीते ज्योतिरादित्य सिंधिया को दुलारा तो लोगों के जहन में यह सवाल उठा कि आखिर एक ही परिवार के दो सदस्य अलग अलग राजनीतिक दलों में कैसे हैं?

30 सितंबर 2001 में माधवराव सिंधिया का निधन हो गया था। उससे पहले 1993 में तब कांग्रेस छोड़ दी थी, जब उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था। उसके बाद दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री का पद अगले 10 साल तक सुशोभित किया। अब ठीक वैसे ही, जैसे आज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी पार्टी छोड़ दी है, जिसके कारण कमलनाथ का मुख्यमंत्री पद जा रहा है।

यह भी एक संयोग ही है कि पार्टी में तब दिक्कत पैदा हुई थी, जब माधवराव सिंधिया ने पार्टी छोड़ी थी, और अब ​दिक्कत पैदा हो रही है, जब उनके बेटे ज्योतिरादित्य ने पार्टी छोड़ी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब कांग्रेस के पास 320 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में 174 सीटें थीं, और अब 230 सीटों में से भाजपा के पास 107 और कांग्रेस के पास 114 विधायक हैं।

इनमें से 30 से ज्यादा विधायकों के इस्तीफे हो चुके हैं। इसके चलते कांग्रेस के पास अब करीब 84 विधायक बचे हैं। इधर, सदन में सीटों की संख्या कम होने के कारण भाजपा बहुमत में आ गई है। जिन सीटों पर इस्तीफे हुए हैं, उनपर अगले 6 माह में दुबारा चुनाव होंगे।

यह भी संयोग ही है कि आज ही माधवराव सिंधिया की 75वीं जयंति है और आज ही 18 साल की राजनीति के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी है। उनको मोदी कैबिनेट में जगह दी जा रही है, उनके करीबी किसी को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

सबसे जरुरी बात यह है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में हमेशा ही राजे रजवाड़ों और सामंतों का ही शासन रहा है। साल 1993 के वक्त जब कांग्रेस सत्ता में आई थी, तब अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, दिग्विजय सिंह समेत कई नेता थे, जो मुख्यमंत्री बनने की फिराक में थे, लेकिन बने सिंधिया राज्य के सामंत दिग्विजय सिंह।

जी, हां! दिग्विजय सिंह उस सामंती परिवार से आते हैं, जो ग्वालियर राज्य के अधीन राघोगढ़ कहा जाता था। आजादी के बाद सामंतों के पास भी खूब धन था। जिस तरह से कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह का परिवार धनवान था, उसी तरह से अर्जुन सिंह का परिवार भी सामंती था।

कई दशकों तक सामंती राघोगढ़ परिवार ग्वालियर राज्य के अधीन था, लेकिन जब 1993 के वक्त मुख्यमंत्री बनकर पूरे मध्य प्रदेश का शासन करने की बारी आई तो अपने राजा माधवराव सिंधिया को पछाड़कर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बन गए थे।

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Ram Gopal Jathttps://nationaldunia.com
नेशनल दुनिआ संपादक .

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