पार्टी अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां को फ्लॉप करने में जुटे हैं भाजपा के कई दिग्गज

satish poonia bjp
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—राजस्थान से दिल्ली तक आलाकमान द्वारा पूरी तरह से हाशिए पर ड़ाली जा चुकीं हैं वसुंधरा राजे, अब उनकी राजनीतिक छटपटाहट साफ दिखाई दे रही है।
रामगोपाल जाट
बीते साल की 14 सितंबर को नियुक्त और दिसंबर महीने की 27 तारीख को निवार्चित होकर संगठन को पुन: मजबूत करने के लिए रात—दिन भागदौड़ करने में जुटे भाजपा के राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां को उनकी पार्टी के कई दिग्गज कहे जाने वाले नेता किसी भी तरह से फ्लॉप साबित करने में जुटे हुए हैं।

चर्चा है कि कई पुराने ताकतवर नेताओं के दबाव के कारण ही भाजपा अध्यक्ष पूनियां अपनी नई टीम भी घोषित नहीं कर पा रहे हैं। हालात ये हैं कि पार्टी में राज्य के 3 पूर्व मंत्री जहां अपनी ढपली बजाकर अध्यक्ष पूनियां को सीधे चुनौती देने की हिमाकत कर रहे हैं, तो वहीं राजस्थान से दिल्ली तक आलाकमान के द्वारा पूरी तरह हाशिए पर धकेल दी गईं वसुंधरा राजे की सियासी छटपटाहट भी साफ दिखाई दे रही है।

भाजपा के एक वर्तमान विधायक और पूर्व मंत्री के द्वारा बीते दिनों पार्टी मुख्यालय में कई कार्यकर्ताओं के सामने जिस तरह से भाजपा अध्यक्ष पूनियां को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गईं थीं, उससे साफ जाहिर है कि सतीश पूनियां जैसे आम कार्यकर्ता का अध्यक्ष बनना पार्टी के पूर्व दिग्गजों को अब तक भी पच नहीं रहा है।

उससे पहले निकाय चुनाव में भाजपा को आशानुकूल सफलता नहीं मिलने के बाद विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष भीलवाड़ा जिले की शाहपुरा विधानसभा सीट से विधायक कैलाश चंद मेघवाल के द्वारा नेतृत्व को चुनौती देने का दुस्साहस किया गया था, जो भी पार्टी लाइन के हिसाब से अपने आप में अक्ष्मय अपराध है, किंतु आलाकमान के निर्देश के कारण मेघवाल आजतक सुरक्षित हैं।

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जब विधानसभा का बजट सत्र शुरु हुआ और सदन में भाजपा ने वॉकआउट करने का फैसला किया, तब भी सभी भाजपा विधायकों के सदन से बाहर निकलने पर भी कैलाश चंद मेघवाल का अपनी सीट पर बैठे रहना साबित करता है कि उनको नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और पार्टी अध्यक्ष सतीश पूनियां की बात के बजाए कहीं और से मिल रहे निर्देश अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं।

ना पक्ष लॉबी में जिस तरह से इस मामले को लेकर एक गुट में गुलाबचंद कटारिया, राजेंद्र सिंह राठौड़ और सतीश पूनियां खड़े दिखाई दिए, वहीं दूसरी तरफ वसुंधरा राजे और कैलाश मेघवाल ने पाला बना लिया था। तब भी उसी जगह पर पूनियां, मेघवाल और राजे के बीच कुछ ‘हॉट टॉक’ हुई बताई जाती है।

हमेशा खुद को सबसे आगे दिखाने का प्रयास करने वाले सांगानेर विधायक अशोक लाहोटी द्वारा बीते दिनों मानसरोवर में जिस तरह से सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की शान में कसीदे पढ़े गए, वह भी पार्टी की लाइन से बाहर की बातें थीं। परंतु लाहोटी पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं होना भी पार्टी में कई नेताओं द्वारा अध्यक्ष सतीश पूनियां की घेरेबंदी करने के तौर पर देखा जा रहा है।

डॉ. सतीश पूनियां के इरादों को इस फेसबुक पोस्ट से समझा जा सकता है।
डॉ. सतीश पूनियां के इरादों को इस फेसबुक पोस्ट से समझा जा सकता है।

पार्टी में चर्चा तो यहां तक है कि बीते दिनों विधायक कालीचरण सराफ, पूर्व अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, पूर्व विधायक राजपाल सिंह शेखावत समेत कुछ अन्य नेताओं के द्वारा पार्टी मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी गई थी, वो भी सतीश पूनियां के बजाए किसी और के निर्देश पर आयोजित की गई थी। इस मामले में भी कुछ नेता सत्तापक्ष के द्वारा ‘मैनेज’ होना बताए जाते हैं।

सबसे पहले, जब बीते साल सितंबर में सतीश पूनियां को अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, और उनके द्वारा निकाय चुनाव के वक्त पार्टी से गद्दारी करते हुए पाए जाने पर पूर्व विधायक विजय बंसल समेत तीन नेताओं को भाजपा से बाहर किया गया था, तब यह संदेश गया था कि पूनियां ‘कड़क’ अध्यक्ष के तौर पर पहचान बना सकते हैं, किंतु कैलाश मेघवाल और अशोक लाहोटी पर कार्यवाही नहीं होने के कारण कार्यकर्ताओं में गलत मैसेज जा रहा है।

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सवाल ये भी हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर के राजस्थान में अचानक अति सक्रिय होने के पीछे कौनसी शक्ति है, जो इनको पार्टी लाइन से उपर उठ काम करने और अध्यक्ष के तौर पूनियां को मिली हुईं शक्तियों को चुनौती देने के लिए उत्साहित कर रही हैं।

याद रहे, वसुंधरा राजे की राज्य में सत्ता जाने के बाद जिस तरह से पार्टी ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर केंद्र में बुलाया था, उसी से यह साबित हो गया था कि भाजपा आलाकमान राज्य में नेतृत्व के तौर पर अब नए युग में प्रवेश करने को आतुर है। आलाकमान की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए जिस तेजी से अध्यक्ष सतीश पूनियां ने प्रदेशभर में दौरे कर अपने संगठनीय कौशल के साथ भविष्य के उद्देश्य का परिचय दिया है, वह भी कहीं न कहीं पार्टी के कुछ नेताओं को पच नहीं रहा है।

पूर्व अध्यक्ष अशोक परनामी के द्वारा नियु​क्त किए गए कुछ पार्टी पदाधिकारियों को सतीश पूनियां फूटी आंख नहीं सुहाते हैं, किंतु पार्टी में बने रहने लिए सार्वजनिक कार्यकर्मों में उनके साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया और मीडिया के संपर्की लोगों में वायरल करते रहते हैं।

बहरहाल, संघनिष्ठ सतीश पूनियां के नेतृत्व में राजस्थान में भाजपा फिर से मजबूत होती रही है। इनके नेतृत्व में पार्टी गहलोत सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में कामयाब होती दिखाई दे रही है। साथ ही प्रदेशभर के सरल, सौम्य व्यवहार के चलते कार्यकर्तायों में लोकप्रिय होते सतीश पूनियां का कद राजस्थान से लेकर दिल्ली स्थित केन्द्रीय आलाकमान की नजरों में बढ़ भी रहा है। प्रदेश के तमाम मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से हर बात के लिए बराबर सम्पर्क में हैं। वसुंधरा राजे के बिलकुल उलट आरएसएस से भी बराबर संवाद रखते हैं और संघ पदाधिकारियों से मार्गदर्शन लेते हैं।

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जैसा कि पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा पार्टी में 75 साल से उपर जाने के बाद अपने नेताओं को सक्रिय राजनीति से बाहर बिठाने की लकीर खींच दी है, उसके कारण 2023 के चुनाव में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कैलाश चंद मेघवाल और नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया स्वत: ही ‘सुप्रीम’ रेस से बाहर हो जाएंगे।

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे, राजेंद्र राठौड़ समेत राजे गुट के माने जाने वाले कई नेताओं पर परोक्ष रुप से नकेल कसकर रखना ही अध्यक्ष सतीश पूनियां की आगे की राजनीति की दिशा को तय करेगा। यदि पूनियां ने समय रहते बेलगाम होते कुछ स्वयंभू दिग्गज नेताओं पर नकेल नहीं ड़ाली, तो आने वाले 3 साल उनके लिए बहुत मुश्किल साबित हो सकते हैं।

और अब जिस तरह की परिपाटी राजनीतिक दलों में शुरु हो गई, उससे साफ है कि विपक्ष से लड़ने के बजाए अपने ही दल के नेताओं से पार पाना सबसे टेढ़ी खीर होता जा रहा है। सीएम अशोक गहलोत खुद पीसीसी चीफ सचिन पायलट के साथ बीते 2-3 साल से शीतयुद्ध में उलझे पड़े हैं।