केजरीवाल-ने-मुफ्त-योजनाओं-पर-उठे-सवालों-का-दिया-भावुकतापूर्ण-जवाब

नई दिल्ली।
अब तक का इतिहास है! जो भी ब्रांड नरेंद्र मोदी से टकराया है, वह राजनीति में शून्य हो गया है, चाहें तो आप भूतकाल के कितने ही उदाहरण देख सकते हैं!

अब तक सिर्फ एक ही व्यक्ति है, जिसने सबसे पहले इस बात को पहचानकर उलट कदम उठा दिया है। मुझे इसमें बड़ी समझदारी तथा भविष्य की राजनीति करने की तरफ संकेत नजर आ रहे हैं।

दिल्ली में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने तीन साल के भीतर खुद में इतना बदलाव किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के खिलाफ अब एक भी शब्द नहीं बोलने की जैसे शपथ ही ले ली है।

आज केजरीवाल ने पीएम नरेंद्र मोदी से आर्शीवाद मांगकर सहयोग का बहाना ढूंढ़ा है, किंतु स्पष्ट मानना है कि वो मोदी के साथ शत्रुता नहीं रखना चाहते हैं, क्योंकि उनको लंबी राजनीति करने की कला में महारथ हासिल होती नजर आ रही है।

उन्होंने समझ लिया है कि दिल्ली में कुछ करके दिखाना है तो पूर्व की तरह रोने से कुछ नहीं होगा, केंद्र के साथ कदम मिलाकर ही पीएम मोदी के बराबर नेता बनने का सपना देखा जा सकता है।

भले ही लोग मेरी इस बात को अपने अपने तरीके से लें, किंतु अनेक लोगों का दृढ़ विश्वास है कि पीएम मोदी से टकराव करके शायद 5—7 वर्ष तक कोई मुकाबला नहीं कर पाएगा, बल्कि उसका राजनीतिक बलिदान होना ही तय है।

ऐसे में सीएम केजरीवाल ने इस बात को भांपते हुए पीएम मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं। समय की गति कोई नहीं जानता! तीन बार गुजरात के सीएम रहने के बाद नरेंद्र मोदी पीएम बने।

अब केजरीवाल भी तीन बार दिल्ली के सीएम बन चुके हैं, राजनीति में दरवाजे सबके लिए खुले हैं और ऐसी सूरत में यदि भविष्य में केजरीवाल सधे कदम रखते हुए पीएम की कुर्सी तक पहुंच जाए तो बड़ी अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।

किंतु यह तभी होगा, जब वो सकारात्मक राजनीति करेंगे, भाजपा (BJP) भी इस बात को संभवत: भांप गई है। हालांकि, दिल्ली बेहद छोटा राज्य है, किंतु इसका एक सकारात्मक संदेश पूरे देश में गया है।

अपने शपथ ग्रहण में विपक्षी नेताओं को नहीं बुलाकर उन्होंने खुद का कद बड़ा करने का प्रयास भी किया है। यह कोई ऐसी बात नहीं है कि उन्होंने यह कदम वैसे ही कदम उठाया है, बल्कि केजरीवाल ने बहुत सोच समझकर यह कदम उठाया है।

उन्होंने पीएम मोदी और दिल्ली भाजपा (BJP) के सातों सांसदों को आमंत्रित किया। इसका मतलब वो मोदी और भाजपा (BJP) से टकराव कर अपने रास्ते अवरुद्ध नहीं करना चाहते हैं।

लोगों का पूरा विश्वास है कि पूरे देश में वो फिलहाल कांग्रेस (Congress) के वोटर्स पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। खास बात यह है कि दिल्ली में भाजपा (BJP) की हार पर कांग्रेस (Congress) को उतना ही मजा आया, जितना आप को जीतने में आया है।

किंतु कांग्रेस (Congress) के नेता शायद भूल रहे हैं कि वो अपनी सबसे बुरी हार पर खुश हो रहे हैं। भाजपा (BJP) के लिए तो फिर भी मौका है, किंतु कांग्रेस (Congress) का दिल्ली का पूरा वोटर्स आम आदमी पार्टी (AAP) में शिफ्ट हो गया है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Election) में भले ही भाजपा (BJP) को कम सीटें मिलीं हो, किंतु भाजपा (BJP) कमजोर नहीं हुई है, जबकि कांग्रेस (Congress) पूरी तरह से धराशाही हो चुकी है।

यहां चिंता जितनी भाजपा (BJP) की है, उससे हजार गुणा ज्यादा कांग्रेस (Congress) को होनी चाहिए, किंतु संभवत: ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस (Congress) अपनी हार पर ही खुशियां मना रही है।

क्या कांग्रेस (Congress) ने खुद को अब ‘आप’ से छोटा दल मान लिया है? सवाल यह भी है कि क्या आगामी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में आप के साथ छोटे भाई के रुप में गठबंधन कर सकती है?

क्या अब कांग्रेस (Congress) ने दिल्ली से खुद को पूरी तरह से बाहर मान लिया है? भाजपा (BJP) अपनी रफ्तार में चल रही है, किंतु कांग्रेस (Congress) उसी रफ्तार से पीछे जा रही है।

यही हाल रहा तो साफ है कि कांग्रेस (Congress) का स्थान आम आदमी पार्टी (AAP) हासिल कर लेगी। यह बात कांग्रेस (Congress) नेताओं की आज की खुशी में दिखाई  दे भी रहा है।

कमाल की बात यह है कि भाजपा (BJP) आगे बढ़ी है, आम आदमी पार्टी (AAP) दिल्ली में उसी जगह पर है, जहां पर 2015 में पहुंच गई थी, किंतु कांग्रेस (Congress) सफाए की तरफ है और कांग्रेस (Congress) के नेता भाजपा (BJP) की हार पर खुशियां मना रहे हैं।

आप के नेता केजरीवाल ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं कि वह आगे कांग्रेस (Congress) के सामने कमजोर नहीं होंगे, बल्कि उसकी जगह लेंगे। केजरीवाल की पार्टी ने भाजपा (BJP) से लड़ने के बजाए कांग्रेस (Congress) के वोटर पर हाथ साफ करने का फैसला कर लिया है।

वही दलित वोटर्स को लुभाना, वहीं मुस्लिम मतदाताओं को साथ लेना, वही फ्री की स्कीमों को बढ़ाकर गरीब की रसोई में पहुंच बनाना और उसी तरह से वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच के मार्ग पर चलना।

उसी तरह से बिना किसी संविधान या विचारधारा के आगे बढ़ना, मौके के हिसाब से निर्णय बदलना और केवल वोट बैंक को आकर्षित करना, यह सब आम आदमी पार्टी (AAP) के लक्षण कांग्रेस (Congress) को साफ करने के हैं।

निश्चित तौर पर जैसे पिछले पांच साल केजरीवाल के मोदी सरकार के साथ टकरा के रुप में देखे जा रहे हैं, ठीक वैसे ही आगामी पांच साल केजरीवाल के मोदी सरकार के साथ मित्रता रखने के रुप में जाने जाएंगे।

इस बीच कांग्रेस (Congress) ने खुद में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया तो 2024 को लोकसभा चुनाव ‘आप’ के छोटे भाई के रुप में लड़ना होगा।