सतीश पूनियां, वसुंधरा राजे, गजेंद्र सिंह शेखावत, दीया कुमारी (फाइल फोटो)
सतीश पूनियां, वसुंधरा राजे, गजेंद्र सिंह शेखावत, दीया कुमारी (फाइल फोटो)

जयपुर।
राजस्थान में भाजपा (BJP) को सत्ता खोये अभी महज 14 महीनें ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह से भाजपा (BJP) की कद्दावर नेता रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) अपने को असुरक्षित महसूस कर रहीं हैं और प्रदेशभर में भागम-भाग मचाए हुए हैं, उससे साफतौर पर नजर आ रहा है कि उनके मन में इस बार ‘शांति’ नहीं है।

वर्ष 2008 में सत्ता के बाहर होने के बाद निश्चिंत होकर अगले चार साल, 2008 से लेकर 2012 तक, लंदन बसने वाली वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) इस बार बमुश्किल एक माह भी लंदन नहीं गईं हैं। ऐसा भी कहा जा रहा है कि, चूंकि इस बार उनकी तथाकथित ‘मित्रता’ ललित मोदी के साथ नहीं रही, इसलिए भी वो भारत से बाहर अधिक समय नहीं रुक पा रहीं हैं।

भाजपा (BJP) के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो एक चीज और वसुंधरा राज के दिमाग में घर कर चुकी है, और वो है हर पांच साल में राजस्थान की बदलती सत्ता। राजस्थान में 1993 से लेकर आज तक, भाजपा (BJP) या कांग्रेस (Congress), लगातार दो कार्यकाल में राज नहीं कर पाई है। जबकि इन दोनों दलों के सिवाए दूसरा कोई राजस्थान की राजनीति में घुस भी नहीं पाया है।

वर्ष 1993 से 1998 तक भाजपा (BJP) के भैंरोसिंह शेखावत, 1998 से 2003 तक कांग्रेस (Congress) पार्टी के अशोक गहलोत (Ashok Gehlot), 2003 से 2008 तक भाजपा (BJP) की वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje), 2008 से 2013 तक कांग्रेस (Congress) पार्टी के अशोक गहलोत (Ashok Gehlot), 2013 से 2018 तक भाजपा (BJP) की वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) और अब 2018 से लेकर अब तक कांग्रेस (Congress) पार्टी के अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) मुख्यमंत्री हैं।

जो हालत राजस्थान में राजनीति की रही है, उससे भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) के कई नेताओं की उस सोच को पुख्ता होती है, जो यह मानती है कि राजस्थान में पांच साल बाद सत्ता तो फिर से मिल ही जाएगी। इस स्थिति में विपक्ष से लड़ने के बजाए अधिकांश समय नेताओं का अपने दल के दूसरे नेताओं से निपटना ही रह जाता है।

1993 से लेकर 1998 तक राज करने वाले भैंरोसिंह शेखावत को यह करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि उनको आराम से शासन करने को मिल गया था, बल्कि तब भी भाजपा (BJP) में भंवरलाल शर्मा और उनके कद के अन्य नेता मौका मिलते ही मुख्यमंत्री बनने के सपने को छोड़ नहीं पा रहे थे, किंतु तब आलाकमान इतना ताकतवर नहीं होने के कारण शेखावत को अधिक चुनौती नहीं मिली।

वर्ष 1998 से 2003 तक भले ही कांग्रेस (Congress) पार्टी के मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने पांच साल मजे के साथ निकाल दिए हों, किंतु उससे पहले मुख्यमंत्री बनना बेहद दिलचस्प था, जिसको राजस्थान की राजनीति को जानने वाले अच्छे से जानते हैं। कांग्रेस (Congress) ने भले ही परसराम मदेरणा का नाम लेकर चुनाव नहीं लड़ा हो, किंतु यह भी पता है कि मदेरणा के नाम पर ही सारा चुनाव लड़ा गया था। बाद में क्या हुआ, वह सबको पता है।

मदेरणा को ‘छेककर’ सांसद अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने सोनिया गांधी के सहारे जो मैदान मारा, वो राजनीति में काबिले तारीफ था, लेकिन इसका फायदा लंबे समय में भाजपा (BJP) को हुआ। पहले मुख्यमंत्री पद पर हक जमाया और फिर राजस्थान की राजनीति में भीष्म पितामह कहे जाने वाले परसराम मदेरणा को विधानसभा अध्यक्ष बनाकर उनका पूरा राजनीतिक करियर खत्म करने का श्रेय भी अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को ही दिया जाना चाहिए।

जिस किसान समुदाय के कारण मदेरणा के सहारे कांग्रेस (Congress) ने सत्ता हासिल की थी, उसको अशोक गहलोत (Ashok Gehlot)​ अपने पास थाम नहीं पाए और 2003 में नये उदय के साथ राजस्थान की राजनीति में आने वाली वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) प्रचंड़ बहुमत के साथ छा गईं। वंसुधरा राजे ने वह कमाल किया, जो भाजपा (BJP) को राजस्थान में खड़ी करने वाले भैंरोसिंह शेखावत भी नहीं कर पाए। राज्य की 200 विधानसभा सीटों वाले सदन में पहली बार भाजपा (BJP) 100 के आंकड़े को क्रॉस कर गई।

पहला कार्यकाल वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) का सपनों जैसा रहा। राजस्थान में चार साल बाद पानी बरसा और प्रदेश अकाल की चपेट से बाहर निकल पाया। किंतु इसी कार्यकाल में वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) को ‘8पीएम, नो सीएम’ के जुमले से भी नवाजा गया। चुनाव के पहले भाजपा (BJP) अध्यक्ष ओम माथुर और वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) के बीच चली कलह ने भाजपा (BJP) को 2008 में सत्ता से बाहर कर दिया।

बसपा के 6 विधायकों को साथ लेकर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) फिर से मुख्यमंत्री बनकर पांच साल निकालने में कामयाब हो गये। फिर आया नरेंद्र मोदी के तूफान का दौर। 2013 तक गुजरात से उठे मोदी तूफान और अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) सरकार की खराब छवि ने भाजपा (BJP) को कीर्तिमान स्थापित करने पर मजबूर कर दिया। भाजपा (BJP) ने फिर से वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) के नेतृत्व में 163 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में सफलता पाई।

इस दौरान वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी बन चुके घनश्याम तिवाड़ी को निपटाया। तिवाड़ी के साथ अलग-अलग तरह से गुलाबचंद कटारिया, राव राजेंद्र सिंह, नरपत सिंह राजवी, कैलाश चंद मेघवाल और किरोड़ीलाल मीणा सरीखे नेताओं को भी वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) ने राजनीतिक धूल चटा दी।

वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) ने मुख्यमंत्री रहते हुए ‘सबकुछ’ किया, किंतु फिर भी वो राजस्थान का सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड खत्म नहीं कर पाईं। 2018 में किस्मत केवल वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) से नहीं रुठी, बल्कि कांग्रेस (Congress) के अध्यक्ष बनकर पांच साल दिनरात मेहनत करने वाले सचिन पायलट (Sachin Pilot) से भी रुठ गई। जिस तरह से अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने 1998 के दौरान सत्ता हासिल की थी, लगभग उसी ‘स्टाइल’ में उन्होंने दिसंबर 2018 में भी सत्ता पाई।

बीते 14 माह की कांग्रेस (Congress) सरकार में जमकर खींचतान सामने आई, किंतु एक बार फिर से अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के लिए संजीवनी बनी बसपा। बसपा के फिर से सभी 6 विधायकों को अपने पाले में लेकर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने अपने ही दल में मुख्यमंत्री बनने को लालायित सचिन पायलट (Sachin Pilot) को पटखनी दी है। लाख कोशिशों के बाद भी सचिन पायलट (Sachin Pilot) सीएम की सीट तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, बल्कि अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ही सचिन पायलट (Sachin Pilot) को उलटा अध्यक्ष की कुर्सी से उतारते हुए नजर आ रहे हैं।

अब बात करते हैं भाजपा (BJP) की। भाजपा (BJP) ने नई राह अपनाते हुए बरसों बाद एक बार फिर से आरएसएस बैकग्राउंड से आए अनुभवी नेता सतीश पूनियां (Satish Poonia) को पार्टी की बागडोर सौंपी है, किंतु इसके साथ ही राज्य में दोनों दलों के नेताओं के ​करियर पर भी नजर गढ़ाना जरुरी हो जाता है।

तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) तीनों बार ही अध्यक्ष नहीं थे। उनके दल में तीनों बार अध्यक्ष रहे नेताओं को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया गया। भाजपा (BJP) में भले ही वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) 2003 में अध्यक्ष रहीं हो, किंतु 2013 में अध्यक्ष नहीं थीं। जो अध्यक्ष थे, वो मुख्यमंत्री नहीं बन सकें। ऐसे में सतीश पूनियां (Satish Poonia) को भी इन बातों से रुबरु होना पड़ सकता है!

अध्यक्ष नियुक्ति होने और अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद दोगुने जोश के साथ सतीश पूनियां (Satish Poonia) ने प्रदेशभर को नाप लिया है। किंतु इसके साथ ही उनको ‘स्मार्ट वर्क’ पर भी फोकस करना होगा, वरना घनश्याम तिवाड़ी, किरोड़ीलाल मीणा, राव राजेंद्र सिंह, गुलाबचंद कटारिया जैसे नेताओं को अपनी राह से कांटों की तरह हटा चुकीं वसुधंरा राजे के लिए सतीश पूनियां (Satish Poonia) भी अतीत का दुश्मन बनकर रह जाएंगे।

अब भाजपा (BJP) नेताओं को नजर आ रहा है कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस (Congress) को सत्ता से बाहर जाना है। और इसलिए भाजपा (BJP) जहां कांग्रेस (Congress) से मुकाबला नहीं कर, अपने ही दल के नेताओं से राजनीतिक युद्ध करती नजर आ रही है। भाजपा (BJP) में वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) की तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा किसी से छुपी नहीं है।

अध्यक्ष बनने के बाद सतीश पूनियां (Satish Poonia) भी मुख्यमंत्री बनने से खुद को रोक लेंगे, यह भी संभव नहीं है। तीसरी ओर केंद्र में एकमात्र कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत अपने कद और आरएसएस के सहारे सीएम बनने के सपने देख रहे हैं। अपने पति से तलाक ले चुकीं दीया कुमारी की सक्रियता ने भी मुख्यमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा को साफ दर्शा दिया है। वो भी ‘अपने स्तर’ पर भविष्य तलाश रहीं हैं।

इसी तरह से राजेंद्र सिंह राठौड़ की मनोभावना समझना इतना मुश्किल नहीं है। अर्जुनराम मेघवाल, ओम बिडला समेत सीपी जोशी भी ब्राह्मण समुदाय और आरएसएस के दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जाने के सपने में हैं। इनके बीच सतीश पूनियां (Satish Poonia), वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje), गजेंद्र सिंह शेखावत प्रमुखता से दिखाई दे रहे हैं।

किसान समुदाय के नाते नैसर्गिक तौर पर सतीश पूनियां (Satish Poonia) सबसे तगड़े दावेदार हैं। आजतक किसान समुदाय से मुख्यमंत्री बनाने की मांग भी दोनों ही दल नहीं कर पाए हैं। ऐसे में सतीश पूनियां (Satish Poonia) का दावा सबसे मजबूत दिखाई दे रहा है, किंतु आजतक किसी दल ने जिस तरह से किसान वर्ग को तवोज्जो नहीं दी है, उससे यह भी साबित होता है कि सतीश पूनियां (Satish Poonia) की राह आसान भी नहीं है।

सतीश पूनिया के पास पूरे 4 साल का समय है। इस 4 साल में अगर उन्होंने खुद को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह बनाकर आगे करने में कामयाबी पाई, तो कुछ संभव है, अन्यथा उनको भी अपना सपना दिल में दबाकर परसराम मदेरणा की तरह करियर पर विराम देना होगा।

72 किलो के सांप, गेट पर पीतल का जुगाड़ समेत जिस तरह से अलग-अलग पंड़ितों और तांत्रिकों द्वारा वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) के लिए तंत्र-मंत्र करने की बातें चर्चाओं में रहती हैं, तो साफ-सुथरे राजनीतिक करियर के धनी डॉ. सतीश पूनिया (Satish Poonia)ं के लिए खतरे की घंटी है, जिसपर उनको ‘हमेशा’ विचार करते हुए आगे बढ़ना होगा।

वैसे भी किसान परिवार से संबंध रखने वाले डॉ. पूनियां और राज परिवार से बिलोंग करने वालीं वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) का मुकाबला कांटे और फूलों जैसा है, किंतु सबसे बड़ी चुनौती आलाकमान को मनाने के साथ ही जनता को और अपने ही दल के मठाधीश पदाधिकरियों, नेताओं को खुद के पाले में रखना डॉ. पूनियां के लिए बहुत बड़ी दिक्कतें पैदा कर सकता है, खासतौर से जब वो एक बेहद सरल व्यक्तित्व के इंसान हैं।

एक बात और है जो डॉ. पूनियां के लिए उनकी राह को आसान और कठिन बना रही है, और वो है उनका स्पष्ट बोलना, स्पष्ट सुनना, सबकी सुनना, हर किसी को बिना किसी भेदभाव के सारी बातें खुलकर करना भी अध्यक्ष से आगे की राह में रोडा बना सकता है।

विपक्ष के साथ जूझना अलग बात है, किंतु जब किसी को पता ही नहीं हो कि उसका दुश्मन उसके बगल में बैठा है और जाने कब छुरा घौंप देगा, ऐसी स्थिति से निपटने के लिए डॉ. पूनियां को अपनी, केवल अपनी, जो उनके प्रति वफादार हो, ऐसी टीम का चुनाव करना होगा।

वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, इस नाते वो पार्टी को मजबूत करने के लिए शहर-शहर घूमने का बहाना निकाल सकती हैं, किंतु जिस तरह से मोदी-शाह के साथ उनका रिश्ता पिछले करीब पांच-छ साल रहा, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि मोदी-शाह ताकतवर रहे, तो उनको 2023 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के ‘अपने’ सपने को दबाकर रखना होगा।

गजेंद्र सिंह शेखावत दूसरी बार सांसद बने हैं और मंत्री भी। ऐसे में उनका कद आलाकमान के समक्ष अच्छा होगा। उपर से आरएसएस के भी हैं। जलशक्ति मंत्रालय में काम की असीम संभावनाएं हैं, जिनको पूरा कर वो खुद को ‘कद से कद्दावर’ नेता बना सकते हैं। इसके साथ ही उनकी समस्या यह है कि प्रदेश का किसान वर्ग उनको ‘लाइक’ कर सकेगा, इसमें भी संदेह ही है।

तीसरे नंबर पर हैं राजेंद्र राठौड़, जो कि आरएसएस जैसे संगठन के चहेते नहीं होने के कारण खुद अपना वजूद तलाश रहे हैं। हालांकि, उन्होंने पिछले कार्यकाल में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी, ​इस बार भी वो अभी से उपनेता प्रतिपक्ष के पद को पूरी तरह से न्यायसंगत बनाने में जुटे हैं, जो उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा सकता है। किंतु राहें बहुत कंटीली हैं।

लोकसभाध्यक्ष बनने के बाद शायद ओम बिडला ने मुख्यमंत्री बनने के लिए सपना पालना शुरु किया होगा, लेकिन यही पद उनके लिए परेशानी भी है। क्योंकि जब विधानसभा चुनाव होंगे, उसके करीब 6 माह बाद लोकसभा का कार्यकाल खत्म होगा, ऐसे में उनके लिए राहत कठिन है, लेकिन नामुनकिन कुछ भी नहीं है।

जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्या और सांसद दीया कुमारी का नाम हाल ही में उछाला गया है। यह भले ही अभी मजाक नजर आए, किंतु इस रणनीति पर काम किया जा रहा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कभी मोहरे इसी तरह के चलाए जाते हैं, जो कोने में छिपे होते हैं। इस तरह के मोहरे मोदी-शाह की जोड़ी हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, झाडखंड़, उत्तराखंड़ समेत कई जगह चला चुकी है।

अंतत:! सतीश पूनियां (Satish Poonia) सबसे तगड़े और नैसर्गिक दावेदार हैं। उनके कुछ ही पीछे या बराबर में वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) हैं। उसके बाद गजेंद्र सिंह शेखावत, राजेंद्र सिंह राठौड़, दीया कुमारी, सीपी जोशी, ओम बिड़ला, अर्जुनराम मेघवाल सरीखे कई नेता हैं, जो मुख्यमंत्री बनने के सपने में हैं और बन भी सकते हैं, और इसका कारण भी अगर बने, तो सतीश पूनियां (Satish Poonia) ही बनेंगे।